राष्ट्र की सुरक्षा में अपने जीवन के लगभग चार दशक समर्पित करने वाले एक पूर्व वायुवीर को आखिरकार लंबी कानूनी लड़ाई के बाद न्याय मिल गया है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले फैसले में भारत सरकार के रक्षा मंत्रालय की याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। अदालत ने अपने इस कड़े फैसले में स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि पूर्व वायुवीर इन्द्रेश कुमार को तत्काल प्रभाव से नियमानुसार दिव्यांगता पेंशन और उससे जुड़े सभी वित्तीय व सामाजिक लाभ उपलब्ध कराए जाएं। यह फैसला न केवल एक व्यक्ति की जीत है, बल्कि यह देश के उन हजारों पूर्व सैनिकों के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर सामने आया है जो अक्सर प्रशासनिक और तकनीकी अड़चनों के चलते अपने वाजिब अधिकारों के लिए संघर्ष करते रहते हैं।
फतेहपुर के इन्द्रेश कुमार की करीब चार दशकों की लंबी तपस्या
उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जनपद के बिंदकी तहसील क्षेत्र के रहने वाले इन्द्रेश कुमार ने 9 अक्टूबर 1984 को भारतीय वायुसेना में बतौर एयरमैन अपनी सेवाएं शुरू की थीं। देश के अलग-अलग हिस्सों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में लगभग 38 साल तक पूरी निष्ठा के साथ देश की रक्षा करने के बाद, वे 30 सितंबर 2022 को अधिवर्षता आयु पूर्ण होने पर सेवानिवृत्त हुए। जब कोई जवान इतने लंबे समय तक सेना में रहता है, तो उसके शरीर पर शारीरिक और मानसिक थकान का असर पड़ना स्वाभाविक है।
सेवानिवृत्ति के वक्त जब रिलीज मेडिकल बोर्ड ने उनकी जांच की, तो उन्हें 30 प्रतिशत डायबिटीज, 30 प्रतिशत उच्च रक्तचाप (हाइपरटेंशन) और 15 प्रतिशत दाहिनी आंख में मोतियाबिंद से पीड़ित पाया गया। हालांकि, हैरानी की बात यह रही कि मेडिकल बोर्ड ने इन तमाम बीमारियों को सैन्य सेवा से असंबद्ध यानी सेना की नौकरी के दौरान या उसके तनाव के कारण उत्पन्न न होने वाला मान लिया। इसी आधार पर उनका दिव्यांगता पेंशन का दावा खारिज कर दिया गया, जिसके बाद उनकी मुश्किलें शुरू हुईं।
सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) से मिली थी पहली बड़ी राहत
जब रक्षा मंत्रालय की ओर से दिव्यांगता पेंशन देने से इनकार कर दिया गया, तो इन्द्रेश कुमार ने हार नहीं मानी। उन्होंने न्याय की उम्मीद में सशस्त्र बल अधिकरण (AFT), क्षेत्रीय पीठ, लखनऊ का दरवाजा खटखटाया। अधिकरण ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने और तमाम दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद पूर्व वायुवीर के पक्ष में फैसला सुनाया। AFT ने स्पष्ट किया कि उन्हें नियमानुसार दिव्यांगता पेंशन दी जानी चाहिए। लेकिन भारत सरकार और रक्षा मंत्रालय ने इस आदेश को मानने के बजाय इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में एक रिट याचिका दायर कर इसे चुनौती दे दी, जिससे मामले में कानूनी खींचतान और लंबी हो गई।
हाईकोर्ट की दो टूक: मेडिकल बोर्ड के पास नहीं थे ठोस आधार
इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति आलोक माथुर और न्यायमूर्ति अमिताभ कुमार राय की खंडपीठ ने इस पूरे मामले पर बेहद गंभीर रुख अपनाया। अदालत ने मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट, सैनिक के सेवा अभिलेखों, रक्षा सेवा नियमों और AFT के पिछले आदेश का गहन विश्लेषण किया। सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि मेडिकल बोर्ड ने जिन आधारों पर बीमारियों को सैन्य सेवा से असंबद्ध बताया था, उनके समर्थन में कोई भी पुख्ता या वैज्ञानिक कारण दर्ज नहीं किए गए थे।
न्यायालय ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल औपचारिकता निभाते हुए अपनी राय लिख देना और किसी सैनिक को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित कर देना उचित नहीं है। अदालत ने साफ किया कि यदि किसी सैनिक की पेंशन रोकी जा रही है, तो मेडिकल बोर्ड का यह प्राथमिक दायित्व बनता है कि वह अपने निष्कर्षों के पीछे ठोस चिकित्सकीय और वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत करे।
"केवल निष्कर्ष लिख देना पर्याप्त नहीं है। यदि किसी सैनिक को उसके वैधानिक अधिकारों से वंचित किया जा रहा है, तो मेडिकल बोर्ड का यह दायित्व है कि वह अपने निष्कर्षों के पीछे वैज्ञानिक और चिकित्सकीय आधार भी स्पष्ट रूप से प्रस्तुत करे।" - इलाहाबाद उच्च न्यायालय
38 वर्षों की बेदाग सेवा को बनाया गया मुख्य आधार
अडालती प्रक्रिया के दौरान इस बात को विशेष रूप से रेखांकित किया गया कि इन्द्रेश कुमार ने लगभग 38 वर्षों तक भारतीय वायुसेना में अपनी सेवाएं दीं। जब उन्होंने सेना ज्वॉइन की थी, तब उनके मेडिकल रिकॉर्ड में ऐसी कोई गंभीर बीमारी दर्ज नहीं थी, यानी वे पूरी तरह स्वस्थ थे। डायबिटीज, उच्च रक्तचाप और मोतियाबिंद जैसी समस्याएं सेवा के दौरान और उम्र बढ़ने के साथ सामने आईं। अदालत ने सवाल उठाया कि यदि सैनिक भर्ती के समय पूरी तरह फिट था, तो बाद में उत्पन्न हुई इन बीमारियों को सैन्य सेवा की परिस्थितियों से किस आधार पर अलग मान लिया गया? इस मोर्चे पर मेडिकल बोर्ड अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी तरह विफल रहा।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक फैसलों का दिया गया हवाला
अपने इस फैसले को पुख्ता करने के लिए उच्च न्यायालय ने देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के कई ऐतिहासिक फैसलों का जिक्र किया। इसमें मुख्य रूप से 'धर्मवीर सिंह बनाम भारत संघ' और 'राजूमोन टी.एम. बनाम भारत संघ' जैसे चर्चित मामलों का हवाला दिया गया। अदालत ने दोहराया कि:
- यदि सेवा में भर्ती के समय किसी बीमारी का कोई जिक्र नहीं है, तो यह कानूनी रूप से माना जाएगा कि सैनिक बिल्कुल स्वस्थ था।
- सेवाकाल के दौरान यदि कोई बीमारी या विकलांगता उत्पन्न होती है, तो उसका संदेह का लाभ हमेशा सैनिक को ही मिलना चाहिए।
- दिव्यांगता पेंशन से जुड़े नियम मुख्य रूप से कल्याणकारी और सामाजिक सुरक्षा के उद्देश्य से बनाए गए हैं, इसलिए इनकी व्याख्या हमेशा सैनिकों के पक्ष में उदारतापूर्वक की जानी चाहिए।
रक्षा मंत्रालय की याचिका खारिज, तत्काल भुगतान के निर्देश
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और रिकॉर्ड्स की जांच करने के बाद हाईकोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि सशस्त्र बल अधिकरण (AFT) के आदेश में किसी भी प्रकार की कानूनी भूल नहीं है। नतीजतन, अदालत ने भारत सरकार की याचिका को खारिज कर दिया। साथ ही, रक्षा मंत्रालय को यह निर्देश दिया कि वे पूर्व वायुवीर इन्द्रेश कुमार को अविलंब दिव्यांगता पेंशन और उससे जुड़े सभी एरियर व अन्य वैधानिक लाभ जारी करें।
पूर्व सैनिकों के लिए एक बड़ी और ऐतिहासिक नजीर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आने वाले समय में देश के लाखों पूर्व सैनिकों के लिए एक मजबूत ढाल साबित होगा। अक्सर देखा जाता है कि सेना से रिटायर होने वाले जवानों को मेडिकल बोर्ड की कमजोर या तर्कहीन रिपोर्ट के कारण पेंशन के लिए सालों-साल अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। यह फैसला यह साफ संदेश देता है कि सैनिकों के अधिकारों के मामले में मनमानी नहीं चल सकती और न्यायपालिका उनके साथ खड़ी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में क्या मुख्य निर्देश दिया है?
Ans. हाईकोर्ट ने रक्षा मंत्रालय की याचिका को खारिज करते हुए पूर्व वायुवीर इन्द्रेश कुमार को तत्काल प्रभाव से दिव्यांगता पेंशन और उससे संबंधित सभी वैधानिक लाभ देने का निर्देश दिया है।
Q2. पूर्व वायुवीर इन्द्रेश कुमार को किस आधार पर पेंशन से वंचित किया गया था?
Ans. रिलीज मेडिकल बोर्ड ने उनकी डायबिटीज, हाइपरटेंशन और मोतियाबिंद की समस्याओं को सैन्य सेवा से असंबद्ध (service-unconnected) बताकर उनका दावा खारिज कर दिया था।
Q3. इस फैसले का अन्य पूर्व सैनिकों पर क्या असर पड़ेगा?
Ans. यह फैसला एक नजीर बनेगा, जिससे उन पूर्व सैनिकों को बड़ी राहत मिलेगी जिनके दिव्यांगता पेंशन के दावे मेडिकल बोर्ड द्वारा बिना ठोस कारणों के अस्वीकार कर दिए जाते हैं।