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महाराष्ट्र के 'सुपर सीएम' बने देवेंद्र फडणवीस, मिला वीटो पावर; बदला 5 दशक पुराना नियम

महाराष्ट्र के 'सुपर सीएम' बने देवेंद्र फडणवीस, मिला वीटो पावर; बदला 5 दशक पुराना नियम

महाराष्ट्र की सियासत में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक बदलाव देखने को मिला है। राज्य की सत्ता के गलियारों में अब मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के पास ऐसी ताकत आ गई है, जिसे राजनीतिक हलकों में 'वीटो पावर' कहा जा रहा है। महाराष्ट्र सरकार ने पूरे 51 साल पुराने प्रशासनिक ढांचे को बदलते हुए एक नया और कड़ा नियम लागू कर दिया है। इस नए बदलाव के बाद अब सीएम फडणवीस के अधिकार पहले से कहीं अधिक व्यापक हो गए हैं, जिससे राज्य प्रशासन में मुख्यमंत्री का कद और सुदृढ़ हो गया है। आइए जानते हैं कि आखिर यह पूरा मामला क्या है और इससे महाराष्ट्र की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा।

क्या है महाराष्ट्र सरकार का नया नियम?

सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा हाल ही में नोटिफाई किए गए ‘महाराष्ट्र सरकार के कामकाज के नियम, 2026’ ने साल 1975 से चले आ रहे पुराने नियमों की जगह ले ली है। इस नए नियम के तहत मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को यह खास अधिकार मिल गया है कि यदि उन्हें किसी भी मंत्री का कोई फैसला जनहित के खिलाफ या राज्य की नीतियों के विपरीत लगता है, तो वे उस फैसले को सीधे तौर पर पलट सकते हैं या उस पर रोक लगा सकते हैं।

सरल शब्दों में कहें तो, अब किसी भी विभाग के मंत्री द्वारा लिया गया निर्णय अंतिम नहीं होगा, बल्कि मुख्यमंत्री की मुहर और समीक्षा के दायरे में रहेगा। जानकारों का मानना है कि यह संशोधन राज्य सरकार के कामकाज में पारदर्शिता और एकरूपता लाने के लिए बेहद अहम कदम है।

क्यों पड़ी इस बदलाव की जरूरत? (बॉम्बे हाईकोर्ट का वो फैसला)

यह पूरा कानूनी फेरबदल रातों-रात नहीं हुआ, बल्कि इसके पीछे तीन साल पुराना एक बड़ा कानूनी मामला जुड़ा है। आइए जानते हैं कि इस संशोधन की पृष्ठभूमि क्या रही है:

  • चंद्रपुर जिला केंद्रीय सहकारी बैंक विवाद: मार्च 2023 में बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच ने एक अहम फैसला सुनाया था। यह मामला बैंक में भर्तियों से जुड़ा हुआ था।
  • मंत्रियों और पूर्व सीएम का टकराव: तत्कालीन सहकारिता मंत्री अतुल सावे ने भर्ती प्रक्रिया को आगे बढ़ाने की अनुमति दी थी। हालांकि, तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने बाद में इस प्रक्रिया पर रोक लगा दी थी।
  • अदालत की टिप्पणी: बॉम्बे हाईकोर्ट ने तत्कालीन सीएम शिंदे के आदेश को यह कहते हुए रद्द कर दिया था कि, पुराने नियमों के मुताबिक मुख्यमंत्री के पास किसी अन्य मंत्री के विभागीय फैसले की समीक्षा करने या उसे पलटने का स्पष्ट कानूनी अधिकार नहीं है।
  • नया संशोधन (नियम 13(5)): अदालत के इसी फैसले के बाद सरकार ने कमियों को दूर करते हुए नए नियमों का मसौदा तैयार किया। संशोधित नियम 13(5) अब मुख्यमंत्री को यह साफ कानूनी अधिकार देता है कि वे जनहित के मामलों में किसी भी मंत्री के फैसले को बदल सकते हैं (हालांकि न्यायिक मामलों में यह लागू नहीं होगा)।

अब और क्या-क्या बदल गया है प्रशासनिक व्यवस्था में?

इस नए नियम के आने से केवल मुख्यमंत्री की शक्तियां ही नहीं बढ़ी हैं, बल्कि पूरी प्रशासनिक मशीनरी के काम करने के तरीके में भी बड़ा बदलाव आया है:

  • दस्तावेजों की मांग: मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अब किसी भी विभाग से सीधे फाइलें और दस्तावेज मंगवा सकते हैं और जरूरत पड़ने पर मामलों को कैबिनेट के पास भेज सकते हैं।
  • सर्कुलेशन के जरिए फैसले: कुछ मामलों में बैठकों के बिना भी 'सर्कुलेशन' के जरिए त्वरित निर्णय लिए जा सकते हैं, बशर्ते संबंधित मंत्री और मुख्यमंत्री इसके लिए सहमत हों।
  • मुख्य सचिव की मजबूत भूमिका: शीर्ष नौकरशाहों (ब्यूरोक्रेट्स) को यह अधिकार और जिम्मेदारी दी गई है कि यदि कोई मंत्री या सीएम ऐसा फैसला ले रहे हैं जो कानून, स्थापित नियमों या सरकारी नीतियों के खिलाफ है, तो वे उन्हें खुलकर सलाह दे सकते हैं।

राज्यपाल की मंजूरी वाले संवेदनशील मामले

हालांकि मुख्यमंत्री को व्यापक शक्तियां दी गई हैं, लेकिन कुछ बेहद संवेदनशील और बड़े नीतिगत मामलों में अभी भी संवैधानिक प्रक्रिया का पालन करना होगा। नियमों के तहत 22 ऐसी खास कैटेगरी तय की गई हैं, जिनके तहत किसी भी तरह का आदेश जारी करने से पहले मामलों को राज्यपाल की मंजूरी के लिए भेजना अनिवार्य होगा। इन श्रेणियों में मुख्य रूप से शामिल हैं:

  • केंद्र-राज्य संबंध से जुड़े मामले
  • कानून और व्यवस्था की स्थिति
  • अध्यादेश (Ordinances) और विधानसभा की कार्यवाही
  • अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST), अन्य पिछड़ा वर्गों (OBC) और अल्पसंख्यकों से जुड़े विशेष मामले

विशेषज्ञों का कहना है कि यह नियम संविधान के अनुच्छेद 166(2) और 166(3) के प्रावधानों के तहत बनाए गए हैं, जो राज्य सरकार के सुचारू संचालन को सुनिश्चित करते हैं।

राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं तेज

इस नए नोटिफिकेशन के सामने आने के बाद से ही महाराष्ट्र की राजनीति में सुगबुगाहट तेज हो गई है। आलोचकों का मानना है कि इससे मंत्रियों की स्वतंत्रता थोड़ी कम हो सकती है, वहीं समर्थकों का तर्क है कि इससे सरकार के भीतर तालमेल बेहतर होगा और नीतिगत फैसलों में एकरूपता आएगी। बहरहाल, इस 'वीटो पावर' के मिलने के बाद अब महाराष्ट्र की राजनीति और प्रशासनिक फैसलों में देवेंद्र फडणवीस की भूमिका सबसे ऊपर और सर्वोपरि हो गई है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

Q1. महाराष्ट्र के नए नियमों के तहत मुख्यमंत्री को कौन सी नई पावर मिली है?

ans: नए नियमों (नियम 13(5)) के तहत, यदि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को लगता है कि जनहित में ऐसा करना जरूरी है, तो वे किसी भी मंत्री के विभागीय फैसले को पलट सकते हैं या रोक लगा सकते हैं। इसे 'वीटो पावर' कहा जा रहा है।

Q2. यह नया नियम कब से और किसके द्वारा लागू किया गया है?

ans: इन नए नियमों को महाराष्ट्र के सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) द्वारा 14 अगस्त को नोटिफाई किया गया है, जिसने 1975 के पुराने नियमों की जगह ली है।

Q3. क्या मुख्यमंत्री हर मामले में किसी मंत्री का फैसला बदल सकते हैं?

ans: नहीं। न्यायिक मामलों में मुख्यमंत्री इस अधिकार का इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा 22 ऐसी कैटेगरी हैं (जैसे कानून-व्यवस्था, केंद्र-राज्य संबंध आदि) जिनमें राज्यपाल की मंजूरी लेना अनिवार्य है।

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ममता पाठक

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Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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