जब भी हरियाणवी संगीत का जिक्र होता है, तो आधुनिक दौर के तेज बीट्स वाले गानों की गूंज सबसे पहले कानों में आती है। आधुनिक चकाचौंध के इस दौर में लोग ठेठ माटी की खुशबू से जुड़े उन पारंपरिक गीतों को भूलते जा रहे हैं जो असल मायनों में ग्रामीण संस्कृति की असली धड़कन हुआ करते थे। मॉडर्न डीजे कल्चर से दूर, हरियाणा के गांवों की गलियों और चौपालों में आज भी एक ऐसा लोकगीत गूंजता है जो पति-पत्नी के रिश्ते की खट्टी-मीठी नोकझोंक और अनूठे प्रेम को बेहद खूबसूरती से बयां करता है। इस पारंपरिक गीत के बोल हैं— 'मेरा दामन सिमा दे ओ ननदी के बीरा…।'
पारंपरिक संस्कृति और ठेठ अंदाज की मिसाल
हरियाणा की लोक संस्कृति अपनी सादगी, आत्मीयता और अनूठे व्यंग्य-विनोद के लिए पूरी दुनिया में पहचानी जाती है। यहां के लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि वे सामाजिक ताने-बाने, रिश्तों की मर्यादा और आपसी स्नेह का जीवंत दस्तावेज होते हैं। 'मेरा दामन सिमा दे' गीत भी इसी समृद्ध परंपरा का एक अनमोल मोती है। शादी-ब्याह के माहौल में जब महिलाओं की टोलियां इस गीत को गाती हैं, तो पूरा परिवेश लोक रंग में रंग जाता है और हर कोई इस पर थिरकने को मजबूर हो जाता है।
पति को सीधे पुकारने की नहीं है परंपरा
इस गीत का सबसे दिलचस्प और सामाजिक रूप से महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इसमें पत्नी अपने पति का सीधा नाम लेकर नहीं पुकारती है। भारतीय और विशेष तौर पर हरियाणवी ग्रामीण संस्कृति में बड़ों का आदर करने और पति का नाम सीधा न लेने की पुरानी परंपरा रही है। इस गीत में पत्नी अपने जीवनसाथी को 'ननदी के बीरा' यानी ननद के भाई के रूप में संबोधित करती है। यही अंदाज इस पूरे गीत को एक अलग ही लोक-रस और चुलबुलापन प्रदान करता है, जो सुनने वाले के चेहरे पर तुरंत मुस्कान ले आता है।
दामन की फरमाइश और अनोखी शर्त
गीत की कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, पत्नी की नटखट फरमाइशें सामने आने लगती हैं। वह सबसे पहले अपने पति से पारंपरिक हरियाणवी पहनावे यानी दामन को सिलवाने की मांग करती है। दामन हरियाणा की महिलाओं का पारंपरिक और बेहद प्रिय घेरदार घाघरा होता है, जो घुटने से थोड़ा नीचे तक पहना जाता है। पत्नी केवल मांग ही नहीं रखती, बल्कि उसके साथ एक मजेदार शर्त भी जोड़ती है कि यदि तुमने मुझे दामन सिलवा दिया, तो मैं तुम्हें अपनी कमर यानी 'डुंगे' पर बैठाकर रखूंगी।
शृंगार की अन्य मांगें और समर्पण का भाव
दामन के बाद पत्नी के अरमान और ऊंचे होते हैं। वह अपने शृंगार को पूरा करने के लिए एक के बाद एक पारंपरिक चीजों की मांग रखती है:
- चूंदर की मांग: हरियाणवी संस्कृति में सिर ढकने के लिए चूंदर का बहुत बड़ा महत्व है। पत्नी कहती है कि अगर तुम मुझे चूंदर दिला दोगे, तो मैं तुम्हें अपने कंधे पर बैठाकर रखूंगी।
- बोरला गढ़वाने की जिद: हरियाणा का पारंपरिक माथे का गहना 'बोरला' महिलाओं के सिंगार की शान होता है। पत्नी बड़ी मासूमियत से कहती है कि मेरे लिए बोरला बनवा दो, तो मैं तुम्हें हमेशा अपने माथे पर सजाकर रखूंगी।
- पायल की छनक: अंत में वह अपने पैरों के लिए पायल की डिमांड करती है और वादा करती है कि जिंदगी भर तुम्हारे साथ उसी पायल की मधुर छनक के साथ चलती रहूंगी।
नटखट तकरार और अधिकार का प्रतीक
इस लोकगीत की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें एक तरफ जहां पत्नी की जिद और अधिकार झलकता है, वहीं दूसरी तरफ उसके भीतर पति के प्रति अटूट प्रेम और समर्पण भी साफ दिखाई देता है। वह सीधे तौर पर आदेश नहीं दे रही है, बल्कि प्यारभरी शर्तों के जरिए अपने हक की मांग कर रही है। यह गीत यह सिखाता है कि कैसे छोटे-छोटे व्यंग्य और शर्ते रिश्तों में ताजगी बनाए रखते हैं।
शादियों में महिलाओं का उत्साह
आज के आधुनिक युग में जब डीजे और रील्स का बोलबाला है, तब भी हरियाणा के गांवों में जब शादियों का मौका आता है, तो ढोलक की थाप पर महिलाओं की आवाज में यह गीत गूंज उठता है। महिलाएं इस गीत पर खुलकर ठुमके लगाती हैं और अपनी लोक विरासत को जीवंत रखती हैं। यह गीत इस बात का प्रमाण है कि हमारी संस्कृति की जड़ें कितनी गहरी हैं और उनमें आज भी वह आकर्षण है जो नई पीढ़ी को अपनी ओर खींच सकता है।