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झांसी: एंबुलेंस के लिए पैसे नहीं, पत्नी की लाश के पास बिलखती रही मासूम

झांसी: एंबुलेंस के लिए पैसे नहीं, पत्नी की लाश के पास बिलखती रही मासूम

झांसी के मेडिकल कॉलेज में मानवता का दम: कड़वी हकीकत

4 सितंबर 2026 की शाम, झांसी के महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज की पार्किंग का मंजर किसी पत्थर दिल इंसान को भी झकझोर देने के लिए काफी है। एक तरफ अस्पताल की चकाचौंध और लंबी-चौड़ी इमारतें हैं, तो दूसरी तरफ जमीन पर बैठा एक ऐसा पति, जिसके पास अपनी पत्नी की अंतिम विदाई के लिए भी चंद सिक्के नहीं हैं। उसके पास एक स्ट्रेचर है, जिस पर उसकी पत्नी का बेजान शरीर पड़ा है और बगल में उसकी मासूम बच्ची भूख और गम से बिलख रही है।

पैसे नहीं तो एंबुलेंस नहीं: सिस्टम की बेरुखी

यह कहानी केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उस बदहाल व्यवस्था की है जो गरीबों के लिए अक्सर क्रूर साबित होती है। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पति के पास इतने पैसे नहीं थे कि वह निजी एंबुलेंस का किराया दे सके। अस्पताल प्रशासन की ओर से सरकारी एंबुलेंस की उपलब्धता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। घंटों बीत गए, सूरज ढल गया, लेकिन उस पिता और पति की सुध लेने वाला कोई नहीं था।

मासूम की चीखें और पिता की खामोशी

स्ट्रेचर के बगल में बैठी बच्ची की रोने की आवाज उस पूरी पार्किंग में गूंज रही थी। उसे शायद यह नहीं पता था कि उसकी मां अब कभी नहीं उठेगी। वह बस भूख और पिता के चेहरे पर छाई मायूसी को देखकर रो रही थी। आसपास से गुजरने वाले लोग तमाशा देखते रहे, वीडियो बनाते रहे, लेकिन किसी ने उस परिवार की मदद के लिए हाथ आगे नहीं बढ़ाया। यह दृश्य आधुनिक भारत के उस चेहरे को उजागर करता है, जहां इंसानियत सिस्टम की फाइलों में कहीं खो गई है।

अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी पर उठे सवाल

झांसी का महारानी लक्ष्मीबाई मेडिकल कॉलेज बुंदेलखंड का सबसे बड़ा सरकारी अस्पताल माना जाता है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या अस्पताल में कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है कि गरीब मरीजों के शव को सम्मानजनक तरीके से उनके घर तक पहुंचाया जा सके? क्या मानवता का तकाजा यह नहीं है कि अंतिम संस्कार के लिए शव वाहन की सुविधा निशुल्क उपलब्ध कराई जाए?

क्या कहता है नियम?

सरकार की ओर से 'महाप्रयाण वाहन' जैसी कई योजनाएं चलाई जाती हैं, जिनका मुख्य उद्देश्य यही है कि गरीब परिवारों को अपने प्रियजनों के शव को ले जाने के लिए दर-दर न भटकना पड़े। लेकिन जमीनी हकीकत इन कागजी दावों से कोसों दूर है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि यहां एंबुलेंस माफियाओं का कब्जा है, जो मनमाना किराया वसूलते हैं। यदि किसी के पास पैसे न हों, तो उन्हें घंटों क्या, पूरे दिन भी इंतजार करना पड़ सकता है।

सोशल मीडिया पर गुस्सा और प्रशासन की चुप्पी

आज दोपहर से ही इस घटना की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं। लोग जमकर अपना गुस्सा जाहिर कर रहे हैं। कोई इसे 'सिस्टम की नाकामी' बता रहा है, तो कोई इसे 'सामाजिक संवेदनहीनता' का प्रतीक मान रहा है। हालांकि, अभी तक अस्पताल प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। इस घटना ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या हम एक ऐसी समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां संवेदनाएं मर चुकी हैं?

आगे की राह: सुधार की सख्त जरूरत

इस हृदयविदारक घटना के बाद अब यह मांग उठ रही है कि अस्पताल के अंदर एंबुलेंस सेवाओं का ऑडिट हो और गरीबों के लिए विशेष सहायता केंद्र बनाए जाएं। केवल जांच के आदेश देना पर्याप्त नहीं है। दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए ताकि भविष्य में किसी अन्य पति को अपनी पत्नी की लाश के साथ पार्किंग में रात न गुजारनी पड़े।

  • गरीब मरीजों के लिए निशुल्क शव वाहन सेवा की उपलब्धता।
  • अस्पताल परिसर में एंबुलेंस माफियाओं पर नकेल।
  • संवेदनशील कर्मचारियों की तैनाती।
  • आपातकालीन स्थिति में त्वरित सहायता के लिए हेल्पलाइन नंबर।

यह घटना 2026 के भारत के लिए एक आईना है। जब तक हम व्यवस्था की कमियों को दूर नहीं करेंगे, ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती रहेंगी। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इस मामले में कोई ठोस कदम उठाता है या फिर यह घटना भी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगी।

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नसीम अहमद

नसीम अहमद

Writer (स्थानीय खबरें)

नसीम अहमद जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं। उन...

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