न्याय की देवी की आंख भले ही पट्टी से ढकी हो, लेकिन अदालत के चक्षु समाज में हो रही हर नाइंसाफी पर पैनी नजर रखते हैं। कानून की किताबों में दर्ज हर एक धारा और नियम का मकसद आम नागरिकों की हिफाजत करना है, न कि उन्हें कानूनी प्रक्रियाओं के जाल में उलझाना। हाल ही में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर कुछ ऐसा ही आईना दिखाया है, जिसके बाद महकमे में हड़कंप मच गया है। अदालत की यह टिप्पणी केवल एक आदेश भर नहीं है, बल्कि उन तमाम मामलों पर एक गहरी चोट है जहां लापरवाही भरी पुलिसिंग के चलते बेकसूर लोग सालों-साल अदालतों के चक्कर काटने को मजबूर होते हैं।
विवेचना के बुनियादी नियमों पर अदालत का कड़ा रुख
मामला तब गंभीर हो गया जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति समीर जैन ने एक सुनवाई के दौरान पुलिस जांच की कार्यप्रणाली की खुलकर आलोचना की। अदालत ने बेहद सख्त लहजे में कहा कि केवल किसी मुखबिर या इनफॉर्मेंट (Informant) के शुरुआती बयानों के आधार पर ही किसी मामले में चार्जशीट दाखिल कर देना पेशेवर जांच नहीं है। एक फौजदारी मुकदमे की विवेचना (Investigation) का दायरा बेहद व्यापक होता है, जिसमें ठोस गवाहों और वैज्ञानिक या दस्तावेजी सबूतों का होना अनिवार्य है।
यह सुनवाई कोई साधारण कानूनी प्रक्रिया नहीं थी। अदालत के इस सत्र में राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) राजीव कृष्ण, प्रयागराज के पुलिस कमिश्नर पीयूष मोर्डिया, अपर पुलिस महानिदेशक (ADG) ज्योति नारायण सहित उत्तर प्रदेश पुलिस के सैकड़ों वरिष्ठ अधिकारी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मौजूद थे। जब इतने बड़े प्रशासनिक और पुलिस नेतृत्व के सामने न्याय के मंदिर से यह बात कही गई, तो महकमे की कार्यशैली पर गंभीर आत्ममंथन की जरूरत महसूस की जाने लगी।
क्या कहती है फौजदारी प्रक्रिया संहिता (CrPC/BNSS)?
कानूनी जानकारों का मानना है कि पुलिस का काम केवल किसी व्यक्ति को आरोपी बनाना नहीं है, बल्कि दूध का दूध और पानी का पानी अलग करना है। विवेचना अधिकारी (IO) की जिम्मेदारी होती है कि वह घटना स्थल का बारीकी से निरीक्षण करे, स्वतंत्र गवाहों के बयान दर्ज करे और परिस्थितियों का मिलान करे।
- स्वतंत्र साक्ष्य: केवल मौखिक बयानों के बजाय भौतिक और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों पर जोर दिया जाना चाहिए।
- निष्पक्षता: जांच किसी पूर्वाग्रह या दबाव से मुक्त होनी चाहिए।
- दस्तावेजी प्रमाण: चार्जशीट में हर एक तथ्य का कानूनी आधार होना चाहिए ताकि अदालत में अभियोजन पक्ष मजबूत रहे।
फर्जी और जल्दबाजी में दाखिल चार्जशीट का आम जनता पर असर
अक्सर यह देखने में आता है कि थानों में मुकदमों के दबाव या किसी अन्य कारणों से जल्दबाजी में चार्जशीट कोर्ट में भेज दी जाती है। इसके परिणाम बेहद घातक होते हैं। एक आम नागरिक, जो अपनी रोजमर्रा की जिंदगी जी रहा होता है, वह रातों-रात आरोपी की श्रेणी में खड़ा कर दिया जाता है। उसे नौकरी खोने का डर, सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल होने का संकट और अंतहीन अदालती तारीखों का सामना करना पड़ता है।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि पुलिसिया जांच का स्तर ऐसा होना चाहिए जिस पर न्यायपालिका आंख मूंदकर भरोसा कर सके। यदि जांच के चरण में ही खामियां छोड़ दी जाएंगी, तो न्याय की पूरी व्यवस्था डगमगा जाएगी।
डीजीपी और शीर्ष अधिकारियों की उपस्थिति और जिम्मेदारी
चूंकि इस महत्वपूर्ण सुनवाई के दौरान राज्य के डीजीपी राजीव कृष्ण और अन्य आला अधिकारी खुद मौजूद थे, इसलिए इस निर्देश के दूरगामी परिणाम होने की पूरी उम्मीद है। अदालत की इस सख्त ताकीद और वैधानिक नसीहत के बाद अब यह जिम्मेदारी शीर्ष नेतृत्व पर आ जाती है कि वे अपने मातहत काम करने वाले विवेचना अधिकारियों (IOs) के लिए प्रशिक्षण और कार्यशैली में सुधार के कड़े निर्देश जारी करें।
अदालत की इस फटकार के बाद डीजीपी को आगे की पेशी से राहत जरूर दे दी गई है, लेकिन यह राहत एक बड़े संदेश के साथ आई है। संदेश साफ है कि पुलिस विभाग को अपनी पारंपरिक और कभी-कभी मनमानी लगने वाली कार्यशैली में आमूल-चूल बदलाव करना होगा।
भविष्य के लिए सुधार की गुंजाइश
उत्तर प्रदेश जैसी घनी आबादी वाले राज्य में कानून-व्यवस्था बनाए रखना और अपराध पर नियंत्रण पाना अपने आप में एक चुनौती है। लेकिन इस चुनौती के नाम पर किसी निर्दोष के अधिकारों का हनन नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह रुख निश्चित रूप से न्याय प्रणाली में आम जनता के विश्वास को और अधिक मजबूत करता है।
उम्मीद की जानी चाहिए कि राज्य के पुलिस महकमे के उच्चाधिकारी इस निर्देश को केवल एक कानूनी औपचारिकता मानकर नहीं छोड़ेंगे, बल्कि इसे जमीनी स्तर पर लागू करेंगे। थानों से लेकर उच्च स्तर तक होने वाली विवेचनाओं की मॉनिटरिंग यदि पारदर्शी और सख्त हो जाए, तो फर्जी चार्जशीट के नाम पर आम बेकसूर जनता को प्रताड़ित किए जाने के इस खेल पर स्थायी विराम लग सकता है।