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हिजाब विवाद पर गरमाई सियासत, सपा नेता एसटी हसन ने कोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल

हिजाब विवाद पर गरमाई सियासत, सपा नेता एसटी हसन ने कोर्ट के फैसले पर उठाए सवाल

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर हिजाब को लेकर बहस छिड़ गई है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक हालिया फैसले पर समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद डॉ. एसटी हसन ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें शैक्षणिक संस्थानों में स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की अनुमति मांगी गई थी। इस फैसले के सामने आने के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में बयानों का दौर शुरू हो गया है।

आखिर क्या था पूरा मामला और कोर्ट का फैसला?

इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष एक याचिका दायर की गई थी, जिसमें मांग की गई थी कि छात्राओं को स्कूल यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की छूट दी जाए। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह उनके धार्मिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हिस्सा है। हालांकि, अदालत ने सभी पक्षों को सुनने के बाद इस याचिका को खारिज कर दिया।

कोर्ट का यह मानना था कि शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन और एकरूपता बनाए रखने के लिए यूनिफॉर्म के नियमों का पालन करना सभी छात्रों के लिए अनिवार्य है। अदालत के इस निर्णय के बाद से ही इस संवेदनशील मुद्दे पर एक बार फिर से पक्ष और विपक्ष के बीच वैचारिक टकराव देखने को मिल रहा है।

एसटी हसन का तीखा बयान: 'हिजाब से किसी को क्या तकलीफ?'

समाजवादी पार्टी के नेता एसटी हसन ने अदालत के इस फैसले पर खुलकर असंतोष जताया है। मीडिया से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा कि देश का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपने धर्म का पालन करने की पूरी स्वतंत्रता देता है। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि कोई छात्रा अपनी आस्था के तहत सिर ढकती है या हिजाब पहनती है, तो इससे किसी को क्या समस्या हो सकती है?

"हमारा संविधान हमें अपने धर्म के अनुसार जीने का अधिकार देता है। अगर कोई बच्ची अपनी मर्जी से और अपनी धार्मिक आस्था के तहत हिजाब पहनती है, तो इससे देश या शिक्षा व्यवस्था को क्या नुकसान पहुँच रहा है? यह शिक्षा हासिल करने में कैसे बाधा बन सकता है?" - एसटी हसन

सपा नेता ने आगे कहा कि इस तरह के मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत अनुशासन के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है, लेकिन केवल प्रतिबंध लगाने से समाज में दूरियां बढ़ती हैं। उनके इस बयान ने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक हलकों तक में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

शिक्षा और यूनिफॉर्म के नियम: विशेषज्ञों की राय

इस पूरे विवाद पर शिक्षाविदों और कानूनी विशेषज्ञों की अलग-अलग राय सामने आ रही है। एक तरफ जहां कई विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल और कॉलेज ज्ञान के मंदिर हैं, जहाँ सभी छात्रों के बीच समानता और अनुशासन बनाए रखने के लिए यूनिफॉर्म बेहद जरूरी है। उनका तर्क है कि यूनिफॉर्म से अमीर-गरीब और धार्मिक पहचान के आधार पर होने वाले भेदभाव को मिटाने में मदद मिलती है।

दूसरी ओर, मानवाधिकार समर्थकों और कुछ राजनीतिक दलों का यह तर्क है कि आधुनिक और समावेशी समाज में विविधता का स्वागत किया जाना चाहिए। उनका मानना है कि यदि कोई ड्रेस कोड में मामूली बदलाव के साथ अपनी धार्मिक पहचान बनाए रखना चाहता है, तो उस पर रोक लगाना उसकी स्वतंत्रता का हनन है।

संवेदनशील मुद्दों पर राजनीति का दौर जारी

भारत में धार्मिक प्रतीकों और ड्रेस कोड से जुड़े विवाद नए नहीं हैं। इससे पहले कर्नाटक में भी हिजाब को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हुआ था, जो देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुँचा था। अब उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद एक बार फिर यह मुद्दा सुर्खियों में आ गया है। आगामी दिनों में इस पर अन्य राजनीतिक दलों की क्या प्रतिक्रिया होगी और क्या इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाएगी, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।


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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

Writer (Local – स्थानीय खबरें)

निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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