देश की राजधानी दिल्ली समेत कई बड़े शहरों में सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। कारण बना है वह विवाद, जिसने चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एसआईआर (SIR) विवाद और मुख्य चुनाव अधिकारियों के बीच कथित अंदरूनी मतभेदों की रिपोर्ट सामने आने के बाद से राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। इसी कड़ी में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने आज देशव्यापी आंदोलन का ऐलान करते हुए चुनाव आयोग के दफ्तरों के बाहर जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया है।
दिल्ली मुख्यालय पर छावनी में तब्दील माहौल
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली स्थित चुनाव आयोग के मुख्य कार्यालय के बाहर आज सुबह से ही तनावपूर्ण लेकिन बेहद सख्त माहौल देखने को मिल रहा है। प्रदर्शन की सुगबुगाहट मिलते ही दिल्ली पुलिस और अर्धसैनिक बलों ने मोर्चा संभाल लिया है। आयोग के दफ्तर के चारों ओर सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। बैरिकेडिंग मजबूत कर दी गई है और पानी की बौछार करने वाली गाड़ियां तथा दंगा नियंत्रण वाहन तैनात कर दिए गए हैं ताकि किसी भी अप्रिय स्थिति से निपटा जा सके।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता, कार्यकर्ता और युवा इकाई के सदस्य हाथों में तख्तियां लेकर आयोग के दफ्तर की ओर कूच करने की कोशिश कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का साफ कहना है कि संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाएगा। सुरक्षाकर्मियों और प्रदर्शनकारियों के बीच कई जगहों पर तीखी नोकझोंक की भी खबरें सामने आ रही हैं।
जयराम रमेश का तीखा हमला: राजीव गांधी और पीएम मोदी की तुलना
इस पूरे घटनाक्रम के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और संचार विभाग के प्रमुख जयराम रमेश ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बेहद तीखा हमला बोला है। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की कार्यशैली के बीच की खाई को उजागर करते हुए एक बड़ा बयान दिया है।
"राजीव गांधी जी के समय में संस्थाओं का जो सम्मान और उनकी गरिमा सुरक्षित रखी जाती थी, आज के दौर में उसका ठीक विपरीत हो रहा है। संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की एक सुनियोजित साजिश रची जा रही है, जिसे देश की जनता और कांग्रेस पार्टी कभी बर्दाश्त नहीं करेगी।" - जयराम रमेश
जयराम रमेश के इस बयान ने राजनीतिक सरगर्मी को और अधिक बढ़ा दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक मुख्य बहस का केंद्र बनने वाला है।
क्यों गरमाया है SIR विवाद?
आखिर यह एसआईआर (SIR) विवाद है क्या और क्यों इसने अचानक इतना तूल पकड़ लिया है, इसे समझना बेहद जरूरी है। पिछले कुछ दिनों से मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जा रहा है कि देश के चुनाव आयोग के भीतर उच्च पद पर बैठे आयुक्तों के बीच महत्वपूर्ण नीतिगत फैसलों को लेकर मतभेद उभर कर सामने आए हैं। इन आंतरिक असहमति की खबरों ने विपक्ष को सरकार और चुनाव निकाय को घेरने का एक बड़ा मौका दे दिया है।
विपक्ष का आरोप है कि लोकतंत्र के सबसे बड़े प्रहरी यानी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर अब सवालिया निशान लगने लगे हैं। कांग्रेस समेत कई अन्य विपक्षी दलों का यह भी कहना है कि चुनाव प्रक्रिया से जुड़े अहम فیصلों में पारदर्शिता की कमी पाई जा रही है, जो भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक खतरनाक संकेत है।
देशभर में विरोध प्रदर्शनों की गूंज
महज दिल्ली तक ही यह विरोध सीमित नहीं है। कांग्रेस पार्टी के रणनीतिकारों के निर्देश पर देश के विभिन्न राज्यों की राजधानियों में स्थित निर्वाचन आयोग के क्षेत्रीय दफ्तरों के बाहर भी विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं।
- उत्तर प्रदेश और बिहार: लखनऊ और पटना स्थित कार्यालयों के बाहर बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं ने प्रदर्शन किया।
- दक्षिण भारत: बेंगलुरु और चेन्नई में भी युवा कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर नारेबाजी की।
- पश्चिम बंगाल: कोलकाता में भी कड़े सुरक्षा पहरे के बीच पार्टी नेताओं ने रोष मार्च निकाला।
इन सभी प्रदर्शनों का मुख्य उद्देश्य देश की जनता का ध्यान इस बात की ओर आकर्षित करना है कि कैसे स्वायत्त संस्थानों पर कथित दबाव बनाया जा रहा है।
सत्तारूढ़ दल का पलटवार
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस के इन आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। बीजेपी के प्रवक्ता का कहना है कि कांग्रेस पार्टी अपनी चुनावी हार और राजनीतिक जमीन खिसकने से बौखला गई है। संवैधानिक संस्थाओं पर इस तरह के बेबुनियाद आरोप लगाना और दबाव की राजनीति करना कांग्रेस की पुरानी फितरत रही है। सरकार का यह भी कहना है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और निष्पक्ष निकाय है जो अपने नियमों के अनुसार पूरी पारदर्शिता के साथ काम कर रहा है।
आगे क्या होगी रणनीति?
सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को यहीं शांत करने के मूड में नहीं है। आने वाले सत्रों और राजनीतिक बैठकों में इस मामले को और जोर-शोर से उठाया जाएगा। विपक्षी दलों के अन्य नेताओं के साथ भी समन्वय बैठाकर एक संयुक्त रणनीति तैयार की जा रही है ताकि चुनाव सुधारों और संस्थागत स्वतंत्रता के मुद्दे पर सरकार को संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह घेरा जा सके।
फिलहाल, दिल्ली में चुनाव आयोग के बाहर मचे इस बवाल और सुरक्षा के भारी पहरे के बीच, सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या चुनाव आयोग की तरफ से इन अंदरूनी मतभेदों और एसआईआर विवाद पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी किया जाता है या नहीं। जैसे-जैसे घटनाक्रम आगे बढ़ेगा, सियासत के तापमान में और अधिक उबाल आने की पूरी संभावना है।