वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मंडराता सबसे बड़ा खतरा
आधुनिक इतिहास में मानव सभ्यता ने तमाम बड़ी महामारियों, युद्धों और आर्थिक मंदी का सामना किया है, लेकिन आज दुनिया एक ऐसे अदृश्य और विशाल संकट के मुहाने पर खड़ी है, जिसकी गूंज आने वाली कई पीढ़ियों तक सुनाई देगी। हम बात कर रहे हैं वैश्विक कर्ज (Global Debt) की, जो अब एक ऐसा दानव बन चुका है जिसे नियंत्रित करना सरकारों के लिए भी नामुमकिन सा होता जा रहा है। ताजा आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर पर कुल कर्ज का यह आंकड़ा बढ़कर हैरान कर देने वाले 365 ट्रिलियन डॉलर (365 Trillion Dollars) के ऐतिहासिक स्तर को पार कर चुका है।
यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं है, बल्कि यह इस बात का प्रमाण है कि पूरी दुनिया उधारी की बैसाखियों पर टिकी हुई है। विकसित देशों से लेकर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं तक, हर कोई इस चक्रव्यूह में फंसता चला जा रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि दुनिया भर की सरकारों को अपनी रोजाना की कमाई और टैक्स से मिलने वाले राजस्व का एक बड़ा हिस्सा केवल इस भारी-भरकम कर्ज का ब्याज चुकाने में खर्च करना पड़ रहा है।
कैसे बना यह 365 ट्रिलियन डॉलर का पहाड़?
इस विकराल वित्तीय स्थिति के पीछे कई दशक की नीतियां, वैश्विक उथल-पुथल और सरकारों की खर्चीली आदतें जिम्मेदार हैं। पिछले कुछ वर्षों में दुनिया ने लगातार झटके झेले हैं। चाहे वह वैश्विक महामारी का दौर हो, जिससे निपटने के लिए सरकारों को बड़े पैमाने पर राहत पैकेज देने पड़े, या फिर दुनिया भर में छिड़े भू-राजनीतिक संघर्ष, जिनके कारण रक्षा बजट में बेतहाशा वृद्धि हुई है।
इन आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए देशों ने बेहिसाब उधार लिया। केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में उतार-चढ़ाव किए, लेकिन अंततः उधारी का यह कल्चर ग्लोबल इकोनॉमी की सबसे बड़ी कमजोरी बन गया। आज आलम यह है कि देश अपने पुराने कर्जों को चुकाने के लिए नए कर्ज ले रहे हैं, जिससे यह 'डेट ट्रैप' (Debt Trap) और गहरा होता जा रहा है।
कमाई का बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में हो रहा स्वाहा
किसी भी देश की सरकार के पास जनता के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य, इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा के लिए धन खर्च करने की जिम्मेदारी होती है। लेकिन जब बजट का एक बड़ा हिस्सा केवल पिछले कर्जों के ब्याज (Interest Payments) को चुकाने में चला जाए, तो विकास कार्यों के लिए क्या बचेगा?
- शिक्षा और स्वास्थ्य पर असर: सरकारों के पास सामाजिक कल्याण योजनाओं के लिए बजट में कटौती करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता है।
- बुनियादी ढांचे का विकास रुका: सड़कें, रेलवे, और ऊर्जा सेक्टर जैसी महत्वपूर्ण परियोजनाएं फंड की कमी के कारण धीमी पड़ जाती हैं।
- आम जनता पर महंगाई का बोझ: जब सरकारी खजाने खाली होने लगते हैं, तो सरकारों को राजकोषीय घाटा पूरा करने के लिए अप्रत्यक्ष करों (Taxes) का सहारा लेना पड़ता है, जिसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ता है।
विकसित और विकासशील देशों पर समान खतरा
यह भ्रम टूटना जरूरी है कि यह संकट केवल गरीब या विकासशील देशों तक सीमित है। अमेरिका, चीन, जापान और यूरोपीय संघ जैसे दुनिया के आर्थिक महाशक्तियां भी इस कर्ज के बोझ तले बुरी तरह दबी हुई हैं। अमेरिका का राष्ट्रीय कर्ज अपने आप में एक अलग रिकॉर्ड बना रहा है, जबकि यूरोपीय देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी सुस्त पड़ी हुई हैं।
जब बड़ी अर्थव्यवस्थाएं इस प्रकार के दबाव में आती हैं, तो इसका असर पूरी दुनिया के शेयर बाजारों, करेंसी मार्केट और ग्लोबल ट्रेड पर पड़ता है। विदेशी निवेशक ऐसे माहौल में अपने पैसे निकालने लगते हैं, जिससे विकासशील देशों की मुद्राएं डॉलर के मुकाबले लगातार कमजोर होने लगती हैं।
आगे का रास्ता क्या है?
अर्थशास्त्रियों और वैश्विक वित्तीय संगठनों का मानना है कि यदि इस दिशा में समय रहते कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो दुनिया एक ऐसी मंदी की तरफ बढ़ सकती है जिससे उबरना असंभव होगा। सरकारों को अब राजकोषीय अनुशासन (Fiscal Discipline) अपनाना होगा। गैर-जरूरी खर्चों पर लगाम लगानी होगी और भ्रष्टाचार पर सख्ती से रोक लगानी होगी ताकि हर एक पाई का सही इस्तेमाल हो सके।
365 ट्रिलियन डॉलर का यह कर्ज सिर्फ एक आर्थिक आंकड़ा नहीं, बल्कि आने वाले कल की सबसे बड़ी चेतावनी है। अगर समय रहते नीतियां नहीं बदली गईं, तो यह कर्ज का बोझ पूरी वैश्विक व्यवस्था को चरमरा कर रख देगा।