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पवित्र नदियों की बदहाली: आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच क्या भूल रहा है समाज?

पवित्र नदियों की बदहाली: आस्था और पर्यावरण संरक्षण के बीच क्या भूल रहा है समाज?

दुनियाभर की विभिन्न संस्कृतियों और धर्मों में जल को केवल जीवन का आधार ही नहीं, बल्कि पवित्रता और आस्था का प्रतीक माना गया है। एक तरफ जहां इस्लाम में जमजम के पानी को अत्यंत पाक और पूजनीय माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ सनातन परंपरा में गंगा, यमुना, सरस्वती, गंडक और कोसी जैसी नदियों को 'मां' का दर्जा देकर मोक्षदायिनी माना गया है। हालांकि, इन पवित्र जल स्रोतों की वर्तमान स्थिति और उनके रख-रखाव को लेकर आज एक बड़ा बहस का विषय छिड़ गया है।

संरक्षण का मॉडल: जमजम बनाम हमारी नदियां

ऐतिहासिक रूप से जमजम के पानी की गुणवत्ता और स्वच्छता को बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक और प्रशासनिक स्तर पर कड़े कदम उठाए गए हैं। यही वजह है कि आज भी इसे बेहद स्वच्छ और सुरक्षित माना जाता है। इसके विपरीत, भारत में अत्यंत पवित्र मानी जाने वाली नदियों की ज़मीनी हकीकत चिंताजनक है।

वाराणसी के ऐतिहासिक घाटों से लेकर दिल्ली में यमुना के तटों तक, कई जगहों पर पानी का प्रदूषण इस स्तर तक पहुंच चुका है कि यह आचमन या पीने के लायक भी नहीं बचा है। यह स्थिति सवाल खड़ा करती है कि क्या हम अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक धरोहरों का सम्मान केवल नारों तक सीमित रख रहे हैं?

अरबों का बजट और सफाई की चुनौतियां

वर्ष 1947 के बाद से देश में सत्ता और संसाधनों की कोई कमी नहीं रही है। गंगा और अन्य नदियों की स्वच्छता के लिए 'नमामि गंगे' जैसी कई महत्वाकांक्षी योजनाएं बनीं और हजारों करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया गया। इसके बावजूद परिणाम अभी भी पूर्णतः संतोषजनक नहीं हैं। इसके पीछे प्रमुख कारण हैं:

  • औद्योगिक कचरा: कारखानों से निकलने वाला जहरीला केमिकल आज भी कई जगहों पर सीधे नदियों में गिरता है।
  • सीवेज प्रबंधन की कमी: शहरों का अशोधित गंदा पानी नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को तबाह कर रहा है।
  • सामाजिक लापरवाही: धार्मिक अनुष्ठानों के नाम पर प्लास्टिक, पूजा सामग्री और कचरा नदियों में बहाने की आदत।

सच्ची आस्था का अर्थ केवल पूजन नहीं, संरक्षण भी है

नदियों को केवल मां मान लेने से उनकी रक्षा नहीं होगी। अगर कोई समाज किसी जल स्रोत को पवित्र मानता है, तो उसकी पवित्रता और स्वच्छता बनाए रखना भी उसी समाज की नैतिक और धार्मिक जिम्मेदारी है। सरकारों की नीतियों के साथ-साथ आम जनता को भी यह समझना होगा कि कचरा फेंककर नदियों को प्रदूषित करना आस्था नहीं, बल्कि लापरवाही है।

आगे की राह: कड़े कानून और जन-जागरूकता

यदि हमें अपनी पौराणिक नदियों को विलुप्त होने और नाले में तब्दील होने से बचाना है, तो कड़े नियमों को लागू करना होगा। औद्योगिक प्रदूषण पर सख्त कार्रवाई, आधुनिक वेस्ट ट्रीटमेंट प्लांट और सबसे महत्वपूर्ण—नागरिकों में स्वच्छता के प्रति अनुशासन ही इन नदियों को पुनर्जीवन दे सकता है।

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नसीम अहमद

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