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IIT-BHU के शोध ने बदला ई-वेस्ट मैनेजमेंट का खेल, निकाला 100% कॉपर और 92% गोल्ड

IIT-BHU के शोध ने बदला ई-वेस्ट मैनेजमेंट का खेल, निकाला 100% कॉपर और 92% गोल्ड

आधुनिक तकनीक और गैजेट्स की चमक के पीछे पल रहा इलेक्ट्रॉनिक कचरा यानी ई-वेस्ट दुनिया भर के पर्यावरणविदों के लिए एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। पुराने स्मार्टफोन, लैपटॉप और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण हर साल मीट्रिक टन के हिसाब से कचरे के ढेर में तब्दील हो रहे हैं। इस गंभीर वैश्विक समस्या के बीच भारत के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी-बीएचयू (IIT-BHU) से एक ऐसी उम्मीद की किरण फूटी है, जो भविष्य की तस्वीर पूरी तरह से बदल सकती है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने ई-वेस्ट को केवल डंप करने के बजाय उससे बेशकीमती धातुओं को बाहर निकालने का एक अचूक फॉर्मूला ढूंढ निकाला है।

रूस के नालचिक शहर में आयोजित प्रतिष्ठित 'GEO-SUSTAINABILITY BRICS 2026' सम्मेलन में इस क्रांतिकारी शोध को अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रस्तुत किया गया। धातुकर्म अभियांत्रिकी विभाग के जाने-माने विशेषज्ञ प्रो. कमलेश कुमार सिंह ने इस वैश्विक मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व किया और अपने अध्ययन से दुनिया भर के वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया। उनके इस शोध ने साबित कर दिया है कि जिसे हम बेकार समझकर फेंक देते हैं, असल में वह किसी खजाने से कम नहीं है।

ब्रिक्स-2026 सम्मेलन में चमका भारत का नाम

रूस के कबार्डिनो-बालकारियन स्टेट यूनिवर्सिटी (KBSU) और हाई-माउंटेन जियोफिजिकल इंस्टीट्यूट की ओर से 23 से 25 सितंबर 2026 के बीच इस भव्य सम्मेलन का आयोजन किया गया था। इस अंतरराष्ट्रीय महाकुंभ का मुख्य केंद्र वैश्विक बदलाव के दौर में भू-भौतिकीय प्रक्रियाओं, पर्यावरणीय स्थिरता और प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण प्रबंधन पर था। इसमें भारत के अलावा रूस, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, तुर्की और उज्बेकिस्तान समेत कई देशों के दिग्गज वैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया।

इस सम्मेलन में प्रो. कमलेश कुमार सिंह को विशेष तौर पर प्लेनरी वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया था। इतना ही नहीं, उनकी वैज्ञानिक क्षमता का सम्मान करते हुए उन्हें अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समिति का सदस्य भी नियुक्त किया गया। सम्मेलन के दौरान उन्होंने “Recycling of electronic waste for sustainable environmental management” विषय पर अपना विस्तृत शोध पत्र रखा, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

ई-वेस्ट: जहर भी और बेशकीमती खजाना भी

प्रो. सिंह ने अपने शोध पत्र में इस दोधारी तलवार पर गहराई से प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रॉनिक कचरा अपने साथ सीसा (Lead), पारा (Mercury), कैडमियम और ब्रोमिनयुक्त एपॉक्सी रेजिन जैसे अत्यधिक विषैले तत्वों को लेकर चलता है, जो पर्यावरण और मानव स्वास्थ्य दोनों के लिए धीमे जहर का काम करते हैं। यदि इनका सही तरीके से निपटान न किया जाए, तो यह हमारी धरती और जल स्रोतों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं.

दूसरी तरफ, इन्हीं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के अंदर खासतौर पर प्रिंटेड सर्किट बोर्ड (PCB) में सोने, चांदी, तांबे और टैंटलम जैसी बेहद महंगी और दुर्लभ धातुएं छिपी होती हैं। पारंपरिक तरीकों से इन धातुओं को अलग करना बेहद खर्चीला और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह होता है, लेकिन प्रो. सिंह के नेतृत्व में विकसित नई तकनीक ने इस प्रक्रिया को बेहद आसान और सुरक्षित बना दिया है.

शोध के चौंकाने वाले आंकड़े: शत-प्रतिशत कॉपर और 92 प्रतिशत गोल्ड रिकवरी

आईआईटी-बीएचयू के इस अध्ययन के आंकड़े बेहद उत्साहजनक हैं। शोध के अनुसार, डिलैमिनेटेड पीसीबी (PCB) से लीचिंग और सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन जैसी उन्नत प्रक्रियाओं के जरिए हैरान करने वाले परिणाम सामने आए हैं:

  • 100 प्रतिशत कॉपर (तांबा): ई-वेस्ट से शत-प्रतिशत शुद्ध तांबे की पुनर्प्राप्ति की गई है।
  • 92 प्रतिशत गोल्ड (सोना): कचरे से 92 प्रतिशत तक सोने को सुरक्षित रूप से रिकवर किया गया है।
  • 99 प्रतिशत मैंगनीज: टैंटलम कैपेसिटर से 99 प्रतिशत मैंगनीज निकाला गया, जिसकी शुद्धता का स्तर 99.6 प्रतिशत तक मापा गया।

इसके अलावा, पीपीएम (पार्ट्स पर मिलियन) स्तर पर बेहद सूक्ष्म मात्रा में मौजूद धातुओं को अलग करने के लिए 'पॉलिमर इंक्लूजन मेम्ब्रेन' तकनीक का भी बारीकी से अध्ययन किया गया है, जो इस प्रक्रिया को और अधिक सटीक बनाता है।

सस्टेनेबल पर्यावरण और जीरो-वेस्ट का विजन

आज के दौर में जब जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग मानवता के सामने सबसे बड़ा संकट बनकर खड़े हैं, ऐसे में संसाधनों का सही प्रबंधन ही एकमात्र विकल्प है। प्रो. कमलेश कुमार सिंह ने ई-वेस्ट से अधिकतम मूल्यवान पदार्थों को बाहर निकालने के लिए कई आधुनिक तकनीकों के समन्वय पर जोर दिया है।

उन्होंने अपने संबोधन में हाइड्रोमेटलर्जी, बायो-हाइड्रोमेटलर्जी, इलेक्ट्रो-विनिंग, सॉल्वेंट एक्सट्रैक्शन और पॉलिमर इंक्लूजन मेम्ब्रेन जैसी अत्याधुनिक वैज्ञानिक विधियों को एक साथ एकीकृत (Integrated) रूप से अपनाने की वकालत की। इस समग्र दृष्टिकोण का मुख्य उद्देश्य न केवल मूल्यवान संसाधनों की अधिकतम पुनर्प्राप्ति करना है, बल्कि सतत पर्यावरण प्रबंधन (Sustainable Environmental Management) और 'जीरो-वेस्ट' (Zero-Waste) के लक्ष्य की ओर मजबूती से आगे बढ़ना है।

भविष्य के लिए क्यों मील का पत्थर है यह उपलब्धि?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस तकनीक को बड़े पैमाने पर कमर्शियल स्तर पर लागू किया जाए, तो भारत और दुनिया भर में ई-वेस्ट रिसाइक्लिंग का पूरा परिदृश्य बदल सकता है। एक तरफ जहां इलेक्ट्रॉनिक कचरे से फैलने वाले प्रदूषण से मुक्ति मिलेगी, वहीं दूसरी तरफ भारत को सोने और तांबे जैसी महंगी धातुओं के आयात पर अपनी निर्भरता कम करने में भी बड़ी मदद मिलेगी।

आईआईटी-बीएचयू के इस शोध ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय अकादमिक और शोध संस्थान वैश्विक स्तर पर विज्ञान और पर्यावरण के सबसे बड़े समाधान देने में सक्षम हैं। रूस के ब्रिक्स मंच पर इस भारतीय रिसर्च की सराहना होना देश के हर नागरिक के लिए गर्व का विषय है, और यह इस बात का प्रमाण है कि आने वाले कल का सवेरा विज्ञान और तकनीक के दम पर ही हरा-भरा और समृद्ध होगा।

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नसीम अहमद

नसीम अहमद

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नसीम अहमद जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती हैं। उन...

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