अमरीका की राजनीति इस समय एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहां हर एक वोट कीमती है और हर एक समुदाय किंगमेकर की हैसियत रखता है। तारीख 3 नवंबर 2026 है और अमरीका में मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों का संग्राम अपने चरम पर पहुंच चुका है। संसद के दोनों सदनों—सीनेट और हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स—पर नियंत्रण पाने के लिए रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टी के बीच कांटे की टक्कर चल रही है। ऐसे में पूरे चुनावी परिदृश्य के केंद्र में एक ऐसा मतदाता वर्ग आ गया है जो न सिर्फ सबसे तेजी से बढ़ रहा है, बल्कि अत्यधिक शिक्षित और आर्थिक रूप से बेहद संपन्न भी है। हम बात कर रहे हैं अमरीका में रह रहे 52 लाख भारतीय-अमेरिकी नागरिकों की।
अमरीका में भारतीय-अमेरिकी समुदाय का बढ़ता दायरा
यूनाइटेड स्टेट्स सेंसस ब्यूरो और एशियन अमेरिकन डेटा के हालिया आंकड़े गवाही देते हैं कि पिछले डेढ़ दशक में अमरीकी जमीन पर भारतीय मूल के लोगों का प्रभाव अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। वर्ष 2010 में जहां अमरीका में भारतीय मूल की कुल आबादी करीब 28 लाख थी, वहीं 2026 तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा 52 लाख के पार जा चुका है। यानी महज एक दशक से थोड़े अधिक समय में इस आबादी में 50 प्रतिशत से अधिक की भारी उछाल आई है।
इस 52 लाख की कुल आबादी में से 21 लाख से अधिक योग्य वयस्क अमरीकी नागरिक हैं, जिनके पास मतदान का अधिकार है। जॉर्जिया, पेंसिल्वेनिया, नॉर्थ कैरोलिना, टेक्सास, मिशिगन और एरिज़ोना जैसे चुनावी रूप से बेहद संवेदनशील यानी 'स्विंग स्टेट्स' के उपनगरीय इलाकों में इस समुदाय का घनत्व काफी ज्यादा है। इन राज्यों में अक्सर जीत-हार का फैसला महज कुछ हजार वोटों के अंतर से होता है, ऐसे में 21 लाख भारतीय-अमेरिकी वोटर किसी भी पार्टी के अरमानों पर पानी फेरने या उन्हें फर्श से अर्श तक पहुंचाने का माद्दा रखते हैं।
रिकॉर्ड मतदान और उच्च शैक्षणिक ताकत
राजनीतिक विश्लेषकों के लिए यह समुदाय हमेशा से अध्ययन का विषय रहा है, जिसकी मुख्य वजह इनकी चुनावी प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी है। पारंपरिक रूप से अल्पसंख्यक समूहों में मतदान का प्रतिशत अमूमन कम देखा जाता है, लेकिन भारतीय-अमेरیکियों ने इस ट्रेंड को पूरी तरह बदल दिया है। अमरीकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान इन्होंने रिकॉर्ड 71 प्रतिशत मतदान दर्ज किया था, और 2026 के इस मिडटर्म चुनाव में भी यह उत्साह कम होता नहीं दिख रहा है।
हालिया वोटर सर्वे के मुताबिक, पंजीकृत भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं में से 90 प्रतिशत ने चुनाव में वोट डालने का मन बना लिया है, जिनमें से 71 प्रतिशत का कहना है कि वे हर हाल में मतदान केंद्र पहुंचेंगे। इसके अलावा, इस समुदाय के 75 प्रतिशत से अधिक वयस्कों के पास ग्रेजुएशन या उससे उच्च स्तर की डिग्री है। यही वजह है कि ये मतदाता किसी सतही वादे में आने के बजाय नीतियों की गहराई को समझते हैं, अमरीकी अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं और राजनीति के बड़े वित्तीय डोनर्स में गिने जाते हैं।
डेमोक्रेटिक पार्टी से पुराना नाता, लेकिन बदल रहा है मिजाज
ऐतिहासिक रूप से भारतीय-अमेरिकी नागरिक डेमोक्रेटिक पार्टी के सबसे भरोसेमंद और वफादार समर्थकों में गिने जाते रहे हैं। हालिया सीनेट रेस के सर्वे बताते हैं कि करीब 66 प्रतिशत भारतीय-अमेरिकी मतदाता डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के पक्ष में खड़े दिखते हैं, जबकि रिपब्लिकन पार्टी के प्रति झुकाव रखने वाले महज 22 प्रतिशत लोग ही हैं।
डेमोक्रेट्स की ओर झुकाव की मुख्य वजहें:
- सामाजिक समावेशिता: यह समुदाय बहुसांस्कृतिक समाज और नागरिक अधिकारों के ढांचे का पुरजोर समर्थन करता है।
- सार्वजनिक निवेश: स्वास्थ्य सेवा, उच्च शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और पर्यावरण जैसे क्षेत्रों में सरकारी फंडिंग के ये पक्षधर हैं।
- सतर्कता: दक्षिणपंथी सामाजिक रूढ़िवादिता और पारंपरिक राष्ट्रवाद के प्रति इस वर्ग में एक स्वाभाविक हिचकिचाहट और संदेह रहता है।
हालांकि, थिंक टैंक कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस की रिपोर्ट बताती है कि 2020 के बाद से खुद को कट्टर 'डेमोक्रेट' मानने वाले भारतीय-अमेरिकियों की संख्या 55% से गिरकर 46% पर आ गई है। दिलचस्प बात यह है कि यह वोट बैंक सीधे तौर पर रिपब्लिकन पार्टी में जाने के बजाय 'इंडिपेंडेंट' (निर्दलीय) श्रेणी में शिफ्ट हो रहा है, जो 2024 के 25% से बढ़कर 2026 में 29% तक पहुंच चुका है। यही स्वतंत्र रुख डोनाल्ड ट्रंप और उनकी पार्टी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बना हुआ है।
2026 के चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप से क्यों दूरी बना रहे हैं भारतीय?
भले ही भारत के प्रधानमंत्री और डोनाल्ड ट्रंप के व्यक्तिगत संबंध दुनिया के सामने कितने भी प्रगाढ़ क्यों न रहे हों, लेकिन अमरीकी धरती पर रह रहा भारतीय मतदाता अंतरराष्ट्रीय कूटनीति से ज्यादा अपने घरेलू सरोकारों को प्राथमिकता देता है। यदि इस बार यह वर्ग ट्रंप और उनकी पार्टी से दूरी बनाता नजर आ रहा है, तो उसके पीछे पांच बेहद ठोस नीतियां और कारण जिम्मेदार हैं:
- वीजा और इमिग्रेशन नीतियां: कानूनी आव्रजन, H-1B वर्क वीजा और ग्रीन कार्ड के अंतहीन बैकलॉग से इस समुदाय का सीधा वास्ता है। ट्रंप की "अमेरिका फर्स्ट" नीति और वीजा नियमों में सख्ती (जैसे फीस बढ़ाना और न्यूनतम वेतन की शर्तें) से भारतीय आईटी प्रोफेशनल्स और छात्रों में गहरा रोष रहता है।
- हेट क्राइम और सुरक्षा: ट्रंप की आक्रामक बयानबाजी और उग्र राष्ट्रवाद के माहौल में एशियाई-अमेरिकियों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव और 'हेट क्राइम' की घटनाओं ने इस वर्ग को असहज किया है।
- सार्वजनिक सेवाएं: एक शिक्षित और उच्च आय वाला वर्ग होने के नाते ये लोग सरकारी वित्तपोषित सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं (जैसे अफोर्डेबल केयर एक्ट) का समर्थन करते हैं, जबकि ट्रंप प्रशासन के दौर में इनमें कटौती की कोशिशें की जाती रही हैं।
- पर्यावरण संरक्षण: जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा के प्रति भारतीय-अमेरिकी बेहद सजग हैं। पेरिस जलवायु समझौते से बाहर निकलने जैसे कदमों को यह वर्ग वैज्ञानिक प्रगति के खिलाफ मानता है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व: डेमोक्रेटिक पार्टी ने कमला हैरिस, रो खन्ना, प्रमिला जयपाल और राजा कृष्णमूर्ति जैसे कई भारतीय-अमेरिकी चेहरों को अमरीकी राजनीति के शीर्ष मंचों पर जगह दी है, जिससे इस समुदाय का जुड़ाव और गहरा हुआ है।
निष्कर्ष: किधर जाएगा स्विंग वोट?
अमरीकी राजनीति के जानकारों का मानना है कि 3 नवंबर 2026 के इन मध्यावधि चुनावों में जीत का ताला खोलने की चाबी इन 52 लाख भारतीय-अमेरिकियों के हाथ में है। राजनीतिक दल लाख दावे कर लें, लेकिन उपनगरीय इलाकों में बैठा यह प्रबुद्ध वर्ग किस करवट बैठेगा, यह आने वाले कुछ ही घंटों में साफ हो जाएगा। एक बात तय है—अब अमरीकी सियासत भारतीय मूल के नागरिकों को नजरअंदाज करके आगे नहीं बढ़ सकती।