बिहार के कटिहार जिले से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो प्रशासनिक दावों और ज़मीनी हकीकत के बीच के फर्क को बयां करती है। यूं तो इलाके में बाढ़ का पानी अब धीरे-धीरे नीचे उतरने लगा है, लेकिन इसके साथ ही जो संकट पीछे छूट गया है, उसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खासकर पशुपालकों की नींद उड़ा दी है। नदियां भले ही शांत हो रही हों, पर जिंदगी की धारा अभी भी उफान पर है। खासकर उन लोगों के लिए जिनकी आजीविका पूरी तरह से पशुपालन पर टिकी हुई है।
पानी उतरा, लेकिन मुसीबतें गहरी हो गईं
सामान्य तौर पर बाढ़ हटने के बाद राहत की सांस ली जाती है, लेकिन कटिहार और खासकर मनिहारी के निचले इलाकों में स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। खेतों में अभी भी कीचड़ और जलजमाव का साम्राज्य है। जिन उपजाऊ जमीनों पर कभी हरी-भरी फसलें और चारा लहलहाता था, वहां अब सिवाय बर्बादी के कुछ नहीं बचा है। इस स्थिति ने किसानों और पशुपालकों के सामने सबसे बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—उनके मूक मवेशी आखिर क्या खाएंगे?
मवेशियों को जिंदा रखना इस वक्त इन परिवारों के लिए किसी जंग से कम नहीं है। जिले के ग्रामीण इलाकों में पशुपालन केवल शौक नहीं, बल्कि जीवनयापन का मुख्य जरिया है। दूध बेचकर परिवार चलाने वाले ये लोग इस समय भारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं क्योंकि प्राकृतिक आपदा ने उनके पशुधन के आगे भुखमरी की स्थिति पैदा कर दी है।
पैसेंजर ट्रेन बनी चारे की गाड़ी
मवेशियों के लिए हरा चारा जुटाने के वास्ते पशुपालकों ने संघर्ष का एक ऐसा रास्ता चुना है, जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। हर रोज सुबह के वक्त मनिहारी से कटिहार आने वाली पैसेंजर ट्रेन इन दिनों एक अनोखा नजारा पेश करती है। इस ट्रेन में सिर्फ आम यात्री ही सफर नहीं करते, बल्कि किसानों और पशुपालकों की भीड़ अपने साथ घास के बड़े-बड़े गट्ठर लादकर चलती है।
सुबह तड़के मनिहारी से कटिहार पहुंचने वाले ये ग्रामीण शहर के आसपास के इलाकों में भटकते हैं। जहां कहीं भी थोड़ी बहुत हरी घास या चारा नजर आता है, उसे बड़ी मेहनत से काटते और इकट्ठा करते हैं। इसके बाद शाम को वापसी के वक्त उसी पैसेंजर ट्रेन की बोगियों में इस चारे को लादकर वापस मनिहारी ले जाया जाता है। ट्रेन के भीतर और डिब्बों के दरवाजों पर चारे के बड़े-बड़े ढेर और उनके बीच बैठे परेशान पशुपालक इस आपदा के बाद के जख्मों की तस्दीक करते हैं।
सरकारी दावों और ज़मीनी हकीकत में अंतर
स्थानीय पशुपालकों का दर्द अब खुलकर सामने आने लगा है। उनका आरोप है कि सरकारी स्तर पर जो पशु राहत शिविर या चारे की व्यवस्था शुरू की गई थी, उन्हें अब बंद कर दिया गया है। प्रशासन का मानना है कि पानी घटने के साथ ही हालात सामान्य होने लगे हैं, लेकिन ज़मीन पर ऐसा कुछ नहीं है। पानी भले ही सड़कों और कुछ मुख्य रास्तों से हट गया हो, लेकिन गांवों के अंदरूनी हिस्सों और चरागाहों में अभी भी कीचड़ और पानी भरा हुआ है।
"सरकारी कैंप बंद हो चुके हैं, लेकिन हमारे खेतों में अभी भी कीचड़ और पानी है। पशुओं के लिए एक तिनका चारा भी पैदा नहीं हो रहा है। अगर सरकार ने कुछ दिनों तक और मदद नहीं की, तो हमारे मवेशी भूखे मरने लगेंगे।" - एक स्थानीय पशुपालक
यही वजह है कि प्रभावित लोग अब शासन और प्रशासन से एक बार फिर गुहार लगा रहे हैं कि कम से कम तब तक मवेशियों के लिए मुफ्त या रियायती दरों पर चारे की व्यवस्था जारी रखी जाए, जब तक कि स्थिति पूरी तरह से सामान्य नहीं हो जाती।
आजीविका पर मंडरा रहा है बड़ा खतरा
बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में दुग्ध उत्पादन किसानों की आर्थिक रीढ़ माना जाता है। बाढ़ और उसके बाद चारे की इस गंभीर किल्लत ने इस रीढ़ को झकझोर कर रख दिया है। पोषण की कमी के कारण मवेशियों का दूध उत्पादन तेजी से गिर रहा है, जिससे पशुपालकों की आमदनी लगभग शून्य हो चुकी है। कई किसानों के सामने तो यह संकट भी खड़ा हो गया है कि वे अपने इन बेजुबान पशुओं को बचाएं या उन्हें औने-पौने दामों पर बेचने के लिए मजबूर हों।
आगे की राह और प्रशासन की जिम्मेदारी
कटिहार की यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि किसी भी आपदा का असर केवल बाढ़ के दौरान नहीं रहता, बल्कि उसके टल जाने के हफ्तों या महीनों बाद तक उसका प्रभाव बना रहता है। पुनर्वास (Rehabilitation) की प्रक्रिया सिर्फ इंसानी बस्तियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था के हर उस पहिए को गति देनी होगी जो इस आपदा में टूट गया है।
फिलहाल, मनिहारी और कटिहार के बीच दौड़ने वाली पैसेंजर ट्रेन इन बेजुबानों की उम्मीदों का जरिया बनी हुई है। जब तक सरकार या स्थानीय प्रशासन इस ओर दोबारा ध्यान नहीं देता, तब तक इन किसानों की यह रोजाना की艱ش (कठिन) यात्रा यूं ही जारी रहेगी। देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इस दर्दनाक और अनोखी तस्वीर को देखकर कब तक कोई ठोस कदम उठाता है।