देश के उत्तर-पूर्वी हिस्से में सुरक्षा और शांति व्यवस्था को कायम रखने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बेहद महत्वपूर्ण और कड़ा कदम उठाया है। वर्तमान सुरक्षा हालात और जातीय तनाव की समीक्षा करने के बाद, सरकार ने मणिपुर समेत तीन राज्यों में अशांत क्षेत्रों के भीतर विवादास्पद सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम, यानी AFSPA को आगामी छह महीनों के लिए और बढ़ा दिया है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब क्षेत्र में छिटपुट हिंसक घटनाओं और सुरक्षा चुनौतियों का सिलसिला पूरी तरह थमा नहीं है।
अशांत क्षेत्रों में लगातार बनी हुई है विशेष सुरक्षा की जरूरत
गृह मंत्रालय द्वारा जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, इस कानून का विस्तार न केवल मणिपुर के कई जिलों में किया गया है, बल्कि इसके दायरे में आने वाले अन्य संवेदनशील क्षेत्रों पर भी यह नियम सख्ती से लागू रहेगा। सरकार का मानना है कि पिछले कुछ महीनों में स्थिति सुधरी जरूर है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी भी सुरक्षा बलों को असामाजिक तत्वों और उग्रवादी गतिविधियों से निपटने के लिए विशेष कानूनी सुरक्षा और अधिकारों की आवश्यकता है।
मणिपुर में पिछले लंबे समय से कुकी और नागा समुदायों के बीच के साथ-साथ बहुसंख्यक मैतेइ समुदाय के बीच जो अविश्वास और तनाव की स्थिति बनी हुई है, उसने सुरक्षा एजेंसियों के सामने लगातार बड़ी चुनौतियां खड़ी की हैं। इसी जटिल और संवेदनशील जातीय समीकरण को ध्यान में रखते हुए केंद्र और राज्य सरकारों ने आपसी समन्वय के साथ यह निर्णय लिया है कि फिलहाल कानून-व्यवस्था को पूरी तरह नियंत्रण में रखने के लिए AFSPA को हटाना जोखिम भरा हो सकता है।
क्या है AFSPA और क्यों लागू किया जाता है?
सशस्त्र बल (विशेष शक्तियां) अधिनियम, जिसे संक्षेप में AFSPA कहा जाता है, सुरक्षा बलों को अशांत क्षेत्रों में विशेष अधिकार प्रदान करता है। इस कानून के तहत सेना और असम राइफल्स जैसे बलों को बिना किसी वारंट के तलाशी लेने, किसी भी संदिग्ध व्यक्ति को गिरफ्तार करने और जरूरत पड़ने पर बल का प्रयोग करने की कानूनी छूट मिलती है। सरकार उन क्षेत्रों में इस कानून को लागू करती है जहां आंतरिक सुरक्षा को गंभीर खतरा होता है और स्थानीय पुलिस बल अकेले स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं होते हैं।
हालांकि, इस कानून को लेकर मानवाधिकार संगठनों और स्थानीय स्तर पर लंबे समय से विरोध के स्वर भी उठते रहे हैं। आलोचकों का तर्क है कि इस तरह के कड़े कानूनों से नागरिकों के अधिकारों का हनन हो सकता है, लेकिन दूसरी ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और आतंकवाद तथा उग्रवाद पर लगाम कसने के लिए सुरक्षा एजेंसियां इसे एक बेहद जरूरी कवच मानती हैं।
कुकी-नागा और मैतेइ तनाव की पृष्ठभूमि
मणिपुर में हिंसा की शुरुआत मई 2023 के आसपास हुई थी और तब से लेकर अब तक रुक-रुक कर संघर्ष की खबरें सामने आती रही हैं। राहत शिविरों में रह रहे विस्थापित लोग, पहाड़ों और घाटी के बीच की खाई, तथा विभिन्न सशस्त्र गुटों की मौजूदगी ने राज्य की आंतरिक शांति को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। कुकी और जो समुदाय के लोगों के साथ-साथ नागा समूहों और बहुसंख्यक आबादी के बीच आपसी अविश्वास की खाई को पाटने के लिए प्रशासन लगातार प्रयास कर रहा है, लेकिन स्थायी शांति बहाल होने में अभी और समय लग सकता है।
खुफिया एजेंसियों से मिले इनपुट के मुताबिक, सीमावर्ती इलाकों में हथियारों की तस्करी और कुछ उग्रवादी संगठनों की सक्रियता अब भी चिंता का विषय बनी हुई है। यही कारण है कि सुरक्षा बलों के मनोबल को बनाए रखने और किसी भी आपात स्थिति से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए AFSPA की अवधि को आगे बढ़ाना अनिवार्य हो गया था।
आम जनता और स्थानीय प्रतिक्रिया
इस फैसले के बाद से ही पूर्वोत्तर के इन राज्यों में राजनीतिक और सामाजिक हलचल तेज हो गई है। एक तरफ जहां सुरक्षा विशेषज्ञ गृह मंत्रालय के इस कदम को मौजूदा हालात में अपरिहार्य मान रहे हैं, वहीं स्थानीय नागरिक समाज के कुछ संगठन इसका विरोध भी कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस कानून के साए में सामान्य जनजीवन प्रभावित होता है और विकास की गति धीमी पड़ जाती है।
इसके बावजूद, सरकार का स्पष्ट रुख है कि राज्य में पूर्ण शांति और सामान्य स्थिति लौटने तक सुरक्षा से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। आने वाले महीनों में प्रशासन का मुख्य फोकस विस्थापितों की घर वापसी, पुनर्वास और विभिन्न समुदायों के बीच आपसी बातचीत के जरिए विश्वास बहाल करने पर रहेगा, ताकि भविष्य में इस तरह के कड़े कानूनों की जरूरत ही न पड़े।