अंतरराष्ट्रीय स्तर के खेल आयोजनों में खिलाड़ियों की सुविधा सर्वोपरि होनी चाहिए, लेकिन कई बार शुरुआती प्रबंधन की खामियां पूरे आयोजन के उत्साह को फीका कर देती हैं। नागोया में चल रहे इस बड़े खेल आयोजन की शुरुआत से ठीक पहले प्रशासनिक मोर्चे पर भारी नाकामी देखने को मिली है। खेलों के आगाज से पहले ही जिस तरह की अव्यवस्था की तस्वीरें सामने आई हैं, उसने खिलाड़ियों और उनके सपोर्ट स्टाफ की चिंता को बढ़ा दिया है।
कमरे के आवंटन में देरी और घंटों का इंतजार
आयोजन स्थल पर पहुंचने वाले खिलाड़ियों के स्वागत के बजाय उन्हें बुनियादी प्रशासनिक अड़चनों का सामना करना पड़ रहा है। हालात यह हैं कि कई एथलीटों को अपने कमरों की चाबी पाने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ा। रिपोर्ट्स के मुताबिक, वुशू के खिलाड़ियों को तो अपने कमरों के आवंटन के लिए पूरे छह घंटे तक लाउंज या बाहर इंतजार करना पड़ा। लंबे सफर के बाद थके-हारे खिलाड़ियों के लिए यह स्थिति मानसिक और शारीरिक रूप से बेहद तनावपूर्ण रही।
एक खिलाड़ी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वे अपनी प्रतियोगिता पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं, लेकिन इस तरह की प्राथमिक व्यवस्थाओं में देरी से उनका पूरा शेड्यूल बिगड़ जाता है। खेल गांव या होटल प्रबंधन की ओर से इस देरी के पीछे तकनीकी कारणों का हवाला दिया गया, लेकिन एथलीटों और कोचों में इसे लेकर गहरी नाराजगी साफ देखी जा सकती है।
शूटर्स के लिए दो घंटे का लंबा सफर
प्रशासनिक लापरवाही का सबसे बड़ा शिकार शूटिंग दल हुआ है। नागोया में अभ्यास स्थलों की जो व्यवस्था की गई है, वह मुख्य आवास से काफी दूर है। स्थिति इतनी दयनीय है कि भारतीय और अन्य देशों के शूटर्स को अपने प्रैक्टिस सेशन तक पहुंचने के लिए रोजाना दो घंटे का लंबा सफर तय करना पड़ रहा है।
शूटिंग एक ऐसा खेल है जिसमें मानसिक एकाग्रता और शारीरिक ऊर्जा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। प्रतियोगिता से पहले यदि कोई एथलीट केवल आने-जाने में ही चार घंटे बर्बाद कर दे, तो उसकी ऊर्जा का स्तर स्वाभाविक रूप से गिर जाएगा। अभ्यास सत्रों के लिए इस तरह की लंबी यात्रा खिलाड़ियों की रिकवरी और परफॉर्मेंस दोनों पर नकारात्मक असर डालती है।
प्रत्यायन (Accreditation) से जुड़ी समस्याएं भी बनी सिरदर्द
कमरे और यात्रा की समस्याओं के अलावा, एकडिटेशन यानी प्रत्यायन कार्ड से जुड़ी जटिलताओं ने भी खिलाड़ियों और अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। कई एथलीटों और कोचों को आयोजन स्थलों पर एंट्री पाने के लिए घंटों औपचारिकताएं पूरी करनी पड़ीं। समय पर कार्ड न मिलने के कारण वे तय समय पर अपने ट्रेनिंग सेशन का हिस्सा नहीं बन सके।
- लंबा सफर: शूटर्स को अभ्यास के लिए रोजाना दो घंटे का सफर करना पड़ रहा है।
- कमरे का इंतजार: वुशू खिलाड़ियों को रूम अलॉटमेंट के लिए छह घंटे बैठना पड़ा।
- प्रत्यायन संकट: समय पर कार्ड न मिलने से ट्रेनिंग प्रभावित हुई।
प्रशासनिक दावों और हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क
आयोजन समिति ने भले ही दुनिया भर के एथलीटों को विश्व स्तरीय सुविधाएं देने के बड़े-बड़े दावे किए थे, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों के बिल्कुल उलट नजर आ रही है। स्थानीय ट्रांसपोर्टेशन नेटवर्क और होटल मैनेजमेंट के बीच तालमेल की भारी कमी साफ दिखाई दे रही है। जब तक इन लॉजिस्टिक कमियों को तुरंत प्रभाव से दूर नहीं किया जाता, तब तक खिलाड़ियों के लिए अपनी सर्वश्रेष्ठ क्षमता के साथ मैदान पर उतरना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।
खेल प्रेमियों और खेल संघों की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि क्या स्थानीय आयोजक इस शुरुआती अराजकता से सबक लेते हुए आने वाले दिनों में व्यवस्थाओं को पटरी पर ला पाएंगे या नहीं। फिलहाल, खिलाड़ियों का पूरा फोकस सभी बाधाओं को पार कर अपने देश के लिए पदक जीतने पर टिका हुआ है।