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पाक सेना के हवाई हमलों से दहला अफगानिस्तान, इस्लामाबाद की रणनीति पर उठे गंभीर सवाल

पाक सेना के हवाई हमलों से दहला अफगानिस्तान, इस्लामाबाद की रणनीति पर उठे गंभीर सवाल

दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक पटल पर एक बार फिर तनाव की सुइयां तेजी से सुलग उठी हैं। अफगानिस्तान की सीमाओं पर मंडरा रहे युद्ध के काले बादल और पाकिस्तानी सेना द्वारा लगातार किए जा रहे हवाई हमले इस बात के गवाह हैं कि दोनों पड़ोसी देशों के रिश्ते अब टूटने की कगार पर पहुंच चुके हैं। हाल ही में कुनार और हेलमंद प्रांतों में हुए भीषण बमबारी के मामलों ने न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को खतरे में डाल दिया है, बल्कि इस्लामाबाद की कूटनीतिक और रणनीतिक नाकामी को भी पूरी दुनिया के सामने बेनकाब कर दिया है।

कुनार और हेलमंद में निर्दोषों का खून, सहम उठा अफगानिस्तान

सीमाई इलाकों से आ रही डरावनी तस्वीरें इस बात की तस्दीक करती हैं कि सैन्य कार्रवाइयों की आड़ में आम नागरिकों को भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। तालिबान प्रशासन के आधिकारिक प्रवक्ता जबीहुल्लाह मुजाहिद द्वारा साझा की गई जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तानी सेना के लड़ाकू विमानों ने अंधाधुंध बमबारी करते हुए सीधे तौर पर रिहायशी इलाकों और नागरिकों के घरों को निशाना बनाया।

इस क्रूर कार्रवाई में महिलाओं और मासूम बच्चों समेत कुल 9 बेकसूर नागरिकों की दर्दनाक मौत हो गई, जबकि 11 अन्य गंभीर रूप से घायल हो गए। धमाकों की गूंज इतनी तेज थी कि कई घर पूरी तरह मलबे के ढेर में तब्दील हो गए। यह कोई इकलौती घटना नहीं है; इससे पहले भी सितंबर महीने के दौरान कंधार, खोस्त, पक्तिया और पक्तिका जैसे प्रमुख प्रांतों में सिलसिलेवार हवाई और ड्रोन हमले किए जा चुके हैं।

कंधार को निशाना बनाना और जनता का रोष

तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा के मुख्य गढ़ माने जाने वाले कंधार शहर पर हमले होना यह साफ दर्शाता है कि पाकिस्तान अब सीधे तौर पर सत्ता के शीर्ष केंद्रों को चुनौती दे रहा है। इन हमलों के बाद से अफगान नागरिकों में पाकिस्तान के खिलाफ भयानक गुस्सा सुलग रहा है। काबुल समेत देश के कई बड़े शहरों की सड़कों पर आम जनता उतर आई है और पाकिस्तानी आक्रामकता के खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन (UNAMA) ने भी इन हमलों में आम नागरिकों के हताहत होने की पुष्टि की है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लामाबाद की किरकिरी हो रही है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इस तरह के सैन्य कदम क्षेत्रीय शांति को स्थायी रूप से पटरी से उतार सकते हैं।

कोहाट पुलिस परिसर हमला और टीटीपी का एंगल

आखिर इन हमलों के पीछे पाकिस्तान की क्या मजबूरी या मंशा है? इस सवाल की जड़ें खैबर पख्तूनख्वा के कोहाट शहर में हुए एक दहला देने वाले हादसे से जुड़ी हैं। कुछ समय पहले कोहाट पुलिस परिसर को विस्फोटकों से भरे एक वाहन के जरिए निशाना बनाया गया था। इस आत्मघाती और भीषण हमले में कम से कम 16 पुलिसकर्मी अपनी जान गंवा बैठे थे।

इस खूनी खेल की जिम्मेदारी 'आईएमपी' (IMP) नामक संगठन ने ली थी, जो हाफिस गुल बहादर समूह का एक गुट है और इसके तार तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) से जुड़े हुए हैं। पाकिस्तानी सुरक्षा एजेंसियों का दावा है कि इस बड़े हमले को अंजाम देने वाला एक हमलावर अफगान नागरिक था। इसी घटना को आधार बनाकर इस्लामाबाद ने सीमा पार ताबड़तोड़ एयरस्ट्राइक का सिलसिला शुरू कर दिया, जो अब एक बड़े युद्ध का रूप लेता जा रहा है।

आंकड़े बयां कर रहे तबाही की दास्तान

पिछले एक साल के आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति बेहद भयावह नजर आती है। अक्टूबर से लेकर अब तक पाकिस्तान ने अफगान सीमा के भीतर 15 से अधिक बार हवाई हमले किए हैं। विभिन्न स्वतंत्र अनुमानों के अनुसार, इस अवधि के दौरान सीमा पार हुई हिंसा और बमबारी की चपेट में आकर 1100 से अधिक आम नागरिक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित हुए हैं। घरों का उजड़ना, अपनों को खोना और शरणार्थी बनने का यह दौर अफगान अवाम के लिए किसी बड़े अभिशाप से कम नहीं है।

काबुल में खोया प्रभाव पाने की हताशा

रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि आतंकवाद के खात्मे का दावा करने वाले पाकिस्तान का असली मकसद कुछ और ही है। मई महीने में काबुल के एक बड़े नशा मुक्ति केंद्र पर हुए संदिग्ध हमले में 269 लोगों की मौत के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की भूमिका की स्वतंत्र जांच की मांग उठ रही है।

विश्लेषकों का विश्लेषण है कि टीटीपी की गतिविधियों पर लगाम लगाने के अलावा, पाकिस्तान की असली खुजली काबुल की सत्ता पर अपना पुराना रणनीतिक प्रभाव दोबारा हासिल करने की है। जो तालिबान कभी पाकिस्तान की कठपुतली या करीबी रणनीतिक सहयोगी माना जाता था, वही आज इस्लामाबाद के लिए गले की हड्डी बन चुका है। अपनी इस खोई हुई राजनीतिक जमीन को वापस पाने के लिए पाकिस्तान कभी सीमा पार आतंकी गुटों को बढ़ावा देता है, तो कभी सैन्य दबाव बनाने के लिए हवाई हमलों का सहारा लेता है।

उल्टा पड़ रहा है इस्लामाबाद का हर दांव

प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन 'द डिप्लोमैट' की एक रिपोर्ट में इस बात का खास जिक्र किया गया है कि पाकिस्तान की यह दमनकारी रणनीति अब उसी पर भारी पड़ती नजर आ रही है। तालिबान ने दशकों के संघर्ष के दौरान पाकिस्तान की हर चाल और कूटनीति को बहुत करीब से समझा है। यही वजह है कि आज तालिबान, पाकिस्तान के ही तौर-तरीकों का इस्तेमाल करके उस पर कूटनीतिक और सामरिक दबाव बना रहा है।

अमेरिका के लंबे अफगान अनुभव से भी पाकिस्तान ने कोई सबक नहीं सीखा है। इतिहास गवाह है कि केवल बमबारी और सैन्य बल के दम पर किसी स्वाभिमानी देश या संगठन को झुकाया नहीं जा सकता। इस्लामाबाद की यह जिद न केवल अफगानिस्तान के साथ उसके सदियों पुराने सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्तों को तबाह कर रही है, बल्कि खुद पाकिस्तान को एक ऐसे भू-राजनीतिक कुएं में धकेल रही है जहाँ से बाहर निकलना उसके लिए लगभग असंभव होता जा रहा है।

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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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