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अमेरिका-ईरान जंग के मुहाने पर पाकिस्तान का बड़ा दांव, तेहरान दौड़ पड़े असीम मुनीर

अमेरिका-ईरान जंग के मुहाने पर पाकिस्तान का बड़ा दांव, तेहरान दौड़ पड़े असीम मुनीर

पश्चिम एशिया में सुलग रही बारूद की आग के बीच कूटनीतिक गलियारों से एक बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। अमेरिका और ईरान के बीच चरम पर पहुंचे तनाव को कम करने के लिए अब पाकिस्तान ने मध्यस्थता की भूमिका निभाने का बीड़ा उठाया है। इसी कड़ी में पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर सोमवार को तेहरान के आधिकारिक दौरे पर जा रहे हैं।

इस यात्रा को केवल एक सामान्य सैन्य दौरा नहीं माना जा रहा है, बल्कि इसके सामरिक और भू-राजनीतिक मायने बेहद गहरे हैं। दुनिया की निगाहें इस समय इस बात पर टिकी हैं कि क्या पाकिस्तानी सेना प्रमुख इस गंभीर संकट के बीच कूटनीतिक मोर्चे पर कोई नया समीकरण बना पाएंगे या यह महज कूटनीतिक दिखावा साबित होगा।

युद्ध के साये में तेहरान की यात्रा

पिछले कुछ हफ्तों में अमेरिका और ईरान के बीच का वाकयुद्ध और सैन्य सरगर्मी खतरनाक स्तर पर पहुंच चुकी है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य से लेकर खाड़ी देशों तक तनाव की परतें और गहरी होती जा रही हैं। ऐसे नाजुक वक्त में जनरल असीम मुनीर का तेहरान जाना यह संकेत देता है कि पाकिस्तान इस पूरे घटनाक्रम में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराना चाहता है।

कूटनीतिक सूत्रों के अनुसार, इस यात्रा का मुख्य एजेंडा क्षेत्र में शांति और स्थिरता बहाली के लिए नए रास्तों की तलाश करना है। पाकिस्तान यह भली-भांति समझता है कि अगर अमेरिका और ईरान के बीच सीधा सैन्य संघर्ष छिड़ता है, तो इसके गंभीर परिणाम पूरे दक्षिण और पश्चिम एशिया के साथ-साथ खुद पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा पर भी पड़ेंगे।

क्या है इस दौरे का असली मकसद?

विशेषज्ञों का मानना है कि जनरल असीम मुनीर की इस तेहरान यात्रा के पीछे कई छिपे हुए उद्देश्य हैं:

  • क्षेत्रीय तनाव को कम करना: दोनों देशों के बीच बातचीत के बंद हो चुके दरवाजों को फिर से खोलने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाना।
  • सीमा सुरक्षा और आतंकवाद विरोधी सहयोग: ईरान और पाकिस्तान की साझा सीमा पर सुरक्षा चिंताओं को दूर करना, जो हाल के दिनों में दोनों देशों के बीच तनाव का कारण बनी थीं।
  • आर्थिक मजबूरियां: पाकिस्तान अपनी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था के कारण किसी भी बड़े क्षेत्रीय युद्ध का खामियाजा उठाने की स्थिति में नहीं है। ऊर्जा संकट से बचने के लिए भी ईरान के साथ संबंध मधुर रखना उसकी मजबूरी है।
  • वैश्विक मंचों पर प्रभाव: पाकिस्तान यह जताना चाहता है कि वह मुस्लिम दुनिया और क्षेत्र में शांति स्थापित करने में एक अहम कड़ी है।

अमेरिका और सऊदी अरब की भूमिका

यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है जब अमेरिकी प्रशासन की नजरें भी पश्चिम एशिया की हर गतिविधि पर टिकी हैं। पाकिस्तान के अमेरिका के साथ पारंपरिक रूप से गहरे सैन्य और रणनीतिक संबंध रहे हैं, जबकि ईरान के साथ उसके भौगोलिक और ऐतिहासिक रिश्ते हैं। ऐसे में, असीम मुनीर का यह दौरा एक 'डबल गेम' या एक बेहद सधा हुआ कूटनीतिक संतुलन साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

इस्लामाबाद में रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि जनरल मुनीर हाल ही में पश्चिमी देशों और खाड़ी के अन्य प्रमुख सहयोगियों के साथ हुई बैठकों के बाद ही तेहरान की यात्रा का यह ब्लूप्रिंट लेकर निकले हैं। क्या तेहरान इस मध्यस्थता को स्वीकार करेगा, यह देखने वाली बात होगी, क्योंकि ईरान का अमेरिकी नीतियों पर रुख हमेशा से बेहद सख्त रहा है।

भारत और वैश्विक समुदाय की नजर

पाकिस्तान के सेना प्रमुख के इस कदम पर भारत की कूटनीतिक और खुफिया एजेंसियों की भी पैनी नजर है। भारत के ईरान के साथ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं, विशेषकर चाबहार बंदरगाह के विकास को लेकर। पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा असर भारत की ऊर्जा सुरक्षा और व्यापार पर पड़ता है। ऐसे में, पाकिस्तान की इस मध्यस्थता के प्रयासों को क्षेत्रीय राजनीति के चश्मे से बेहद बारीकी से परखा जा रहा है।

फिलहाल, पूरी दुनिया की सांसें थमी हुई हैं और हर कोई यही जानना चाहता है कि क्या असीम मुनीर की यह तेहरान यात्रा युद्ध के बादलों को छांटने में कामयाब होती है या यह महज कूटनीतिक बयानबाजी बनकर रह जाती है। आने वाले कुछ दिन पश्चिम एशिया के भविष्य तय करने में निर्णायक साबित होंगे।


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ममता पाठक

ममता पाठक

Chief Editor

ममता पाठक न्यूज़रूम की संपादकीय दिशा तय करने वाली प्रमुख स्तंभ हैं। अंतरराष्ट्रीय खबरों की गहरी समझ और वर्षों के अनुभव के साथ, वे कंटेंट की गुणवत्त...

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