संसद में गूंजा 'चंदा चोरी' का मुद्दा: जब साधु के वेश में पहुंचे पप्पू यादव, विपक्ष ने रचा अनोखा 'नुक्कड़ नाटक'
नई दिल्ली:
संसद के बाहर का राजनीतिक तापमान एक बार फिर बढ़ गया है। लेकिन इस बार विरोध जताने का अंदाज नारों और तख्तियों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें रंगमंच, व्यंग्य और भारी नाटकीयता का तड़का देखने को मिला। 'चंदा चोरी' के कथित मामले को लेकर पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव बिल्कुल नए अवतार में नजर आए—वे बकायदा साधु का वेश धरकर संसद परिसर में पहुंचे और नुक्कड़ नाटक के जरिए सरकार पर जमकर निशाना साधा।
इस अनोखे विरोध-प्रदर्शन में कई अन्य विपक्षी सांसदों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और नाटक के अलग-अलग किरदारों के जरिए अपना विरोध दर्ज कराया।
साधु का वेश, हाथ में कमंडल और तीखे बोल
संसद परिसर में जैसे ही पप्पू यादव गेरुआ वस्त्र, गले में माला और हाथ में कमंडल थामे दाखिल हुए, वहां मौजूद सभी लोगों की निगाहें उन पर टिक गईं। उन्होंने साधु के रूप में अभिनय करते हुए 'चंदे' और 'ईमानदारी' पर तंज कसा।
"धर्म के नाम पर, चंदे के नाम पर जो खेल चल रहा है, उसे देश की जनता भली-भांति देख रही है। हम तो साधु हैं, सच बोलना हमारा काम है!" — पप्पू यादव
विपक्षी सांसदों का मिला साथ, जमा 'राजनीतिक रंगमंच'
इस नुक्कड़ नाटक को सफल बनाने में विपक्ष के अन्य सांसदों ने भी पूरी भूमिका निभाई:
- मंच बना संसद का घेरा: सांसदों ने संसद परिसर में ही एक गोल घेरा बनाकर पारंपरिक नुक्कड़ नाटक का माहौल तैयार किया।
- जोरदार संवाद: नाटकों के संवादों में 'चंदा चोरी', 'चुनावी बॉन्ड' और पारदर्शता जैसे मुद्दों पर सरकार को कटघरे में खड़ा किया गया।
- जनता से जुड़ने का जरिया: विपक्षी नेताओं का कहना था कि भारी-भरकम बहसों से इतर, नाटक एक ऐसा माध्यम है जो सीधे आम जनता के दिल और दिमाग तक बात पहुंचाता है।
सोशल मीडिया पर वायरल हुई तस्वीरें और वीडियो
जैसे ही यह नुक्कड़ नाटक शुरू हुआ, संसद परिसर में मौजूद मीडिया और कैमरों का जमावड़ा लग गया। देखते ही देखते पप्पू यादव के साधु वाले अवतार की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगे।
जहाँ एक तरफ विपक्षी समर्थक इसे एक रचनात्मक और असरदार विरोध मान रहे हैं, वहीं सत्तापक्ष की ओर से इसे "संसद की गरिमा को कम करने वाला ड्रामा" करार दिया जा रहा है।
निष्कर्ष
संसदीय राजनीति में विरोध प्रदर्शन कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब विरोध में कला, व्यंग्य और वेशभूषा का ऐसा मिला-जुला प्रयोग होता है, तो वह जनता का ध्यान खींचने में जरूर कामयाब रहता है। देखना यह होगा कि इस 'नाटकीय विरोध' की गूंज संसद के भीतर कितनी गहराई से सुनाई देती है।