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अर्धसैनिक बलों के रिटायर जवानों का जंतर-मंतर पर आर-पार का ऐलान, जानिए क्या हैं बड़ी मांगें

अर्धसैनिक बलों के रिटायर जवानों का जंतर-मंतर पर आर-पार का ऐलान, जानिए क्या हैं बड़ी मांगें

देश की सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा की रक्षा करने वाले अर्धसैनिक बलों (CRPF, CISF, BSF और ITBP) के पूर्व सैनिकों ने अब अपनी मांगों को लेकर आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। आने वाले दिनों में राजधानी दिल्ली के ऐतिहासिक जंतर-मंतर पर एक बार फिर से इन वीर जवानों की आवाज गूंजेगी, जो अपनी विभिन्न समस्याओं और पुरानी मांगों के समाधान के लिए भूख हड़ताल पर बैठने जा रहे हैं।

वर्षों तक अपनी जवानी देश की हिफाजत में खपाने वाले ये जवान अब सिस्टम के सामने खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। इस आंदोलन के पीछे की मुख्य वजहें क्या हैं और सरकार के लिए यह क्यों एक बड़ी चुनौती बन सकता है, आइए इस पूरी खबर को विस्तार से समझते हैं।

जंतर-मंतर पर क्यों हो रहा है यह बड़ा आंदोलन?

देशभर से जुटे अर्धसैनिक बलों के सेवानिवृत्त कर्मियों का कहना है कि उन्होंने देश सेवा में अपने जीवन के सबसे बेहतरीन साल दिए, लेकिन रिटायरमेंट के बाद उन्हें उनके हक और अधिकार नहीं मिल पा रहे हैं। कई सालों से सरकारों को ज्ञापन सौंपने और लगातार गुहार लगाने के बाद भी जब उनकी समस्याओं का कोई ठोस समाधान नहीं निकला, तो उनके पास जंतर-मंतर पर भूख हड़ताल का रास्ता अपनाने के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचा है।

जवानों का मुख्य दर्द यह है कि सशस्त्र बलों (सेना) और अर्धसैनिक बलों के बीच मिलने वाली सुविधाओं में एक बड़ा अंतर है, जिसे पाटने की मांग वे लंबे समय से कर रहे हैं।

CRPF और CISF के जवानों की मुख्य मांगें क्या हैं?

इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे संगठनों और पूर्व सैनिकों के अनुसार, उनकी कई ऐसी मांगें हैं जो सीधे तौर पर उनके सम्मान और जीवनयापन से जुड़ी हैं। आइए प्रमुख मांगों पर नजर डालते हैं:

  • ओपीएस (Old Pension Scheme) की बहाली: 1 जनवरी 2004 के बाद अर्धसैनिक बलों में भर्ती हुए जवानों के लिए पुरानी पेंशन योजना को फिर से लागू किया जाए, क्योंकि नई पेंशन योजना (NPS) से उनका भविष्य सुरक्षित नहीं दिखता है।
  • वन रैंक, वन पेंशन (OROP): जिस तरह भारतीय सेना के पूर्व सैनिकों को ओरोप का लाभ मिलता है, ठीक उसी तर्ज पर अर्धसैनिक बलों के रिटायर कर्मियों को भी इसका लाभ मिलना चाहिए।
  • कैंटीन और मेडिकल सुविधाएं: रिटायरमेंट के बाद अर्धसैनिक बलों के जवानों को मिलने वाली सीएसडी (CSD) कैंटीन और मेडिकल सुविधाओं को और अधिक सुलभ और बेहतर बनाया जाए ताकि उन्हें इलाज के लिए दर-दर न भटकना पड़े।
  • कंट्रीब्यूटरी हेल्थ स्कीम में सुधार: केंद्रीय अर्धसैनिक बल चिकित्सा योजना (CAPF RHS) की खामियों को दूर किया जाए ताकि गंभीर बीमारियों के इलाज में आने वाले खर्च से जवानों को राहत मिल सके।
  • शहीद का दर्जा: ड्यूटी के दौरान देश के लिए जान गंवाने वाले अर्धसैनिक बल के जवानों को 'शहीद' (Martyr) का आधिकारिक दर्जा दिया जाए, जो फिलहाल कई मामलों में नहीं मिल पाता है।

पूर्व जवानों का क्या है कहना?

आंदोलन से जुड़े एक वरिष्ठ सेवानिवृत्त अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "हमने अपने खून-पसीने से इस देश की सुरक्षा को सींचा है। जब हम वर्दी में थे, तब हमें अन्नदाता और देश का रक्षक कहा जाता था, लेकिन आज वर्दी उतरने के बाद हमें अपने ही हक के लिए सड़कों पर उतरना पड़ रहा है। यह हमारे आत्मसम्मान की लड़ाई है। जब तक सरकार हमारी इन जायज मांगों पर कोई ठोस नीतिगत फैसला नहीं लेती, हमारा संघर्ष जारी रहेगा।"

सरकार और प्रशासन के सामने क्या हैं चुनौतियां?

गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों के करीब आने या इस तरह के बड़े विरोध प्रदर्शनों से देश की आंतरिक सुरक्षा संभालने वाले बलों के मनोबल पर भी असर पड़ता है। जानकारों का मानना है कि गृह मंत्रालय और संबंधित विभागों को इस मामले में तुरंत संज्ञान लेना चाहिए। यदि देश की सुरक्षा करने वाले जवान ही अपनी मांगों को लेकर अनशन पर बैठेंगे, तो यह एक गंभीर प्रशासनिक और नैतिक सवाल खड़े करता है।

आगामी दिनों में जंतर-मंतर पर जुटने वाली भीड़ और इस भूख हड़ताल के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव क्या होंगे, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं। क्या सरकार इस बार इन जवानों की सुध लेगी या यह आंदोलन और तूल पकड़ेगा, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।


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अनुराधा दुबे

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अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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