पहाड़ों की रानी शिमला इन दिनों एक गंभीर और डराने वाली समस्या से जूझ रही है। यहां पर्यटकों की खूबसूरती के बीच स्थानीय नागरिकों के लिए रोजमर्रा की जिंदगी जीना मुश्किल होता जा रहा है। वजह हैं- बेकाबू होते बंदर, लंगूर और आक्रामक आवारा कुत्ते। इस बढ़ते आतंक के खिलाफ अब जनता का सब्र टूट चुका है और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया है। सोमवार को शिमला नागरिक सभा के बैनर तले कैथू में एक बड़ा प्रदर्शन किया गया, जिसमें प्रशासन की कार्यप्रणाली पर तीखे सवाल उठाए गए।
सिमिट्री क्षेत्र की वह दर्दनाक घटना, जिसने झकझोर दिया
यह पूरा आक्रोश अचानक पैदा नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे एक दर्दनाक हादसा है। कुछ समय पहले शिमला के सिमिट्री क्षेत्र में एक महिला अपनी छत पर पानी का टैंक देखने गई थी। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह सामान्य सा काम उसकी जिंदगी का आखिरी पल बन जाएगा। अचानक वहां बंदरों के एक झुंड ने उस महिला पर हमला कर दिया।
बंदरों के इस आक्रामक हमले से बचने की कोशिश में महिला का संतुलन बिगड़ा और वह सीधे छत से नीचे जा गिरी। गंभीर रूप से घायल अवस्था में उसे अस्पताल पहुंचाया गया, जहां इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। इस घटना के बाद से स्थानीय लोगों में भारी डर और गुस्सा है। शिमला नागरिक सभा ने इस मामले में नगर निगम की संवेदनशीलता पर सवाल उठाए हैं और मृतका के परिवार के लिए 5 लाख रुपये के मुआवजे की मांग की है।
वक्ताओं ने चेताया: बुजुर्गों और बच्चों की सुरक्षा खतरे में
किसान मजदूर भवन, चितकारा पार्क, कैथू में आयोजित इस प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने शहर के हालात पर गहरी चिंता जताई। सभा के अध्यक्ष जगमोहन ठाकुर और सचिव विवेक कश्यप ने अपने संबोधन में स्पष्ट कहा कि अब स्थिति हाथ से निकलती जा रही है।
उन्होंने कहा,
"शहर में बंदरों, लंगूरों और कुत्तों के हमले लगातार बढ़ रहे हैं। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों के लिए घर से बाहर निकलना भी सुरक्षित नहीं बचा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि प्रशासन गहरी नींद में सोया हुआ है।"
खुले में खाना खिलाना बन रहा है बड़ी मुसीबत
प्रदर्शन के दौरान एक और अहम मुद्दे पर रोशनी डाली गई। कई लोग या संगठन धर्म या शौक के नाम पर बंदरों और कुत्तों को खुलेआम रिहायशी इलाकों में खाना खिलाते हैं।
वक्ताओं ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि खुले में खाना मिलने की वजह से ये जानवर रिहायशी क्षेत्रों और सार्वजनिक रास्तों के आसपास झुंड बनाकर रहने लगते हैं। जब इन्हें समय पर भोजन नहीं मिलता या इनकी आक्रामकता बढ़ती है, तो ये राहगीरों पर टूट पड़ते हैं। सभा ने प्रशासन से मांग की है कि खुले में खाना खिलाने वालों के खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई की जाए।
नसबंदी के दावों पर उठे सवाल
नगर निगम लंबे समय से बंदरों और आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या को नियंत्रित करने के लिए 'नसबंदी अभियान' (Sterilization Drive) चलाने के दावे करता रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती नजर आती है।
नागरिक सभा ने कड़े शब्दों में आरोप लगाया कि कागजों पर भले ही योजनाएं चल रही हों, लेकिन इनकी संख्या में कमी आने के बजाय लगातार इजाफा हो रहा है। सभा ने मांग की है कि:
- आक्रामक कुत्तों, बंदरों और लंगूरों की पहचान कर उन्हें तुरंत सुरक्षित शेल्टर में भेजा जाए।
- पैदल रास्तों और फुटब्रिजों को पूरी तरह जानवरों के आतंक से मुक्त किया जाए।
- नसबंदी अभियान में तेजी लाई जाए और इसकी पारदर्शिता सुनिश्चित हो।
- रिहायशी क्षेत्रों में घूम रहे बंदरों और लंगूरों को वन विभाग के सहयोग से उनके प्राकृतिक आवास (जंगलों) की तरफ खदेड़ा जाए।
- संवेदनशील क्षेत्रों में नियमित रूप से निगरानी दल तैनात किए जाएं।
आगे की चेतावनी: बड़ा आंदोलन और निगम का घेराव
प्रदर्शन के बाद जगमोहन ठाकुर के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने नगर निगम प्रशासन से मुलाकात कर अपना मांग पत्र सौंपा। हालांकि, सभा ने साफ कर दिया है कि अगर इस बार भी सिर्फ आश्वासन मिले और धरातल पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो वे चुप नहीं बैठेंगे।
नागरिक सभा ने चेतावनी दी है कि यदि तय समय के भीतर इन समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो आम जनता को साथ लेकर एक बहुत बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा। जरूरत पड़ने पर नगर निगम कार्यालय का घेराव भी किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
अब देखना यह होगा कि शिमला प्रशासन इस चेतावनी के बाद कितनी जल्दी और कितनी प्रभावी कार्रवाई करता है, ताकि शहर की जनता को इस खौफ के साये से मुक्ति मिल सके।