बिहार की राजधानी पटना से सटे ग्रामीण इलाकों में कृषि व्यवस्था और खाद वितरण प्रणाली को लेकर सुगबुगाहट तेज हो गई है। बाढ़ अनुमंडल के पंडारक प्रखंड में इन दिनों स्थिति काफी तनावपूर्ण बनी हुई है, जिसकी मुख्य वजह उर्वरक की कालाबाजारी और प्रशासनिक महकमे की अनदेखी बताई जा रही है। हालात इस कदर बिगड़ चुके हैं कि अब खुदरा उर्वरक विक्रेताओं को खुलकर मैदान में उतरना पड़ा है। पंडारक प्रखंड में खुदरा उर्वरक विक्रेता संघ के बैनर तले दर्जनों व्यापारियों ने एकजुट होकर स्थानीय प्रखंड कृषि पदाधिकारी (BAO) को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है, जिसमें व्यवस्था की कई पोल खोली गई हैं।
थोक विक्रेताओं की मनमानी और बढ़ी हुई लागत
व्यापारियों द्वारा सौंपे गए ज्ञापन में सबसे बड़ा और गंभीर आरोप थोक विक्रेताओं पर लगाया गया है। खुदरा दुकानदारों का कहना है कि सरकार द्वारा यूरिया और अन्य उर्वरकों का खुदरा मूल्य आधिकारिक तौर पर 242 रुपये प्रति पैकेट तय किया गया है। लेकिन जमीनी हकीकत कागजी दावों से कोसों दूर है। थोक व्यापारी खुदरा दुकानदारों को यही खाद 310 रुपये प्रति पैकेट की दर से देने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
इस पूरी चेन में लागत का गणित खुदरा विक्रेताओं की कमर तोड़ रहा है। थोक मंडी से खाद को अपनी-अपनी दुकानों तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए दुकानदारों को प्रति पैकेट लगभग 50 रुपये का अतिरिक्त परिवहन खर्च (भाड़ा) वहन करना पड़ता है। जब 310 रुपये की खरीद मूल्य में 50 रुपये का परिवहन खर्च जोड़ा जाता है, तो एक पैकेट खाद की कुल लागत सीधे तौर पर 360 रुपये तक पहुंच जाती है। ऐसी स्थिति में दुकानदारों के सामने यह विकट संकट खड़ा हो जाता है कि वे सरकार द्वारा तय 242 रुपये के भाव पर खाद कैसे बेचें।
किसानों और दुकानदारों के बीच बढ़ रही तनातनी
इस आर्थिक गणित के चलते पंडारक क्षेत्र में आए दिन किसानों और खुदरा दुकानदारों के बीच नोकझोंक और विवाद की घटनाएं आम हो गई हैं। स्थानीय किसानों का तर्क होता है कि सरकार ने जब दाम तय कर दिए हैं, तो उन्हें अधिक पैसे क्यों चुकाने पड़ें। दूसरी ओर, दुकानदार अपनी मजबूरी गिनाते हैं कि जब उन्हें ही माल महंगे दामों पर मिल रहा है, तो वे घाटा सहकर व्यवसाय कैसे चलाएं।
इस आपसी रस्साकशी के बीच प्रखंड क्षेत्र के सैकड़ों छोटे और सीमांत किसान सबसे ज्यादा पिस रहे हैं। कृषि प्रधान माने जाने वाले इस इलाके में समय पर और उचित मूल्य पर खाद न मिलने से खरीफ और रबी फसलों की बुवाई के समय किसानों की चिंताएं काफी बढ़ गई हैं।
जटिल ऑनलाइन व्यवस्था ने बढ़ाई परेशानी
केवल दामों का खेल ही नहीं, बल्कि सरकार द्वारा हाल के वर्षों में थोपी गई जटिल ऑनलाइन वितरण प्रणाली ने भी इस संकट को और गहरा कर दिया है। प्रदर्शन कर रहे विक्रेताओं ने इस ऑनलाइन प्रक्रिया के खिलाफ कड़ा रोष व्यक्त किया है। उनका कहना है कि डिजिटल इंडिया के नाम पर लागू की गई यह व्यवस्था जमीनी स्तर पर पूरी तरह फेल साबित हो रही है।
दुकानदारों ने एक बानगी देते हुए बताया कि यदि किसी छोटे किसान को अपनी जरूरत के लिए मात्र 5 किलो भी उर्वरक खरीदना हो, तो उसके लिए भी पहले ऑनलाइन ऑर्डर करना अनिवार्य कर दिया गया है। इस कागजी और तकनीकी प्रक्रिया को पूरा करवाने के लिए किसानों को साइबर कैफे के चक्कर काटने पड़ते हैं। कैफे वाले इस प्रक्रिया के नाम पर आसानी से 50 रुपये अतिरिक्त वसूल लेते हैं। यानी जितनी कीमत की खाद नहीं होती, उससे कहीं अधिक खर्च किसानों को केवल ऑनलाइन बुकिंग प्रक्रिया पूरी कराने में उठाना पड़ रहा है।
प्रशासन से सख्त कार्रवाई और सुधार की मांग
प्रखंड कृषि पदाधिकारी को सौंपे गए ज्ञापन के माध्यम से दुकानदारों ने स्पष्ट शब्दों में कुछ प्रमुख मांगें रखी हैं:
- थोक दरों पर नियंत्रण: प्रशासन तुरंत हस्तक्षेप करे और थोक विक्रेताओं पर शिकंजा कसकर तय सरकारी दरों पर खाद उपलब्ध कराना सुनिश्चित करे।
- परिवहन शुल्क का समाधान: थोक से खुदरा तक माल ढुलाई के खर्च पर उचित नीति बनाई जाए ताकि छोटे दुकानदारों पर आर्थिक बोझ न पड़े।
- ऑनलाइन प्रक्रिया का सरलीकरण: छोटे किसानों और दुकानदारों के हित को ध्यान में रखते हुए डिजिटल वितरण प्रक्रिया को बेहद सरल और व्यावहारिक बनाया जाए।
- कालाबाजारी पर रोक: क्षेत्र में अवैध रूप से चल रहे खाद भंडारण और मुनाफाखोरी पर तुरंत प्रभाव से रोक लगाई जाए।
उग्र आंदोलन की चेतावनी
पंडारक के खुदरा उर्वरक विक्रेताओं ने प्रशासनिक अधिकारियों को चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि यदि समय रहते इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया और थोक व्यापारियों की मनमानी पर लगाम नहीं कसी गई, तो वे सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन करने के लिए मजबूर होंगे। इस चेतावनी के बाद अब स्थानीय प्रशासन और कृषि विभाग पर दबाव काफी बढ़ गया है, और सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इस समस्या के समाधान के लिए विभाग क्या कदम उठाता है।