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ट्रांसजेंडर अधिकार कानून में संशोधन पर घमासान: 'स्व-पहचान' या सरकारी जांच? जानें क्यों सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक मचा है बवाल

ट्रांसजेंडर अधिकार कानून में संशोधन पर घमासान: 'स्व-पहचान' या सरकारी जांच? जानें क्यों सड़क से सुप्रीम कोर्ट तक मचा है बवाल

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) के परिसर में सतरंगी झंडों के बीच गूंजते 'फैज़' और 'हबीब जालिब' के नगमों ने देश में एक नए सामाजिक और कानूनी संग्राम को हवा दे दी है। मुद्दा बेहद संवेदनशील है—किसी व्यक्ति की जेंडर पहचान (Gender Identity) कौन तय करेगा? वह व्यक्ति खुद, कोई डॉक्टर या फिर सरकार?

केंद्र सरकार द्वारा ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन अधिनियम पारित किए जाने के बाद से देश भर में LGBTQ+ कार्यकर्ता और छात्र सड़कों पर उतर आए हैं। वहीं, इस कानून की संवैधानिक वैधता को अब देश की शीर्ष अदालत (Supreme Court) में चुनौती दी गई है।

2014 का ऐतिहासिक फैसला बनाम नया संशोधन कानून

भारत में वर्ष 2014 के नालसा (NALSA) फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को 'Self-Identification' (स्व-पहचान) का संवैधानिक अधिकार दिया था। इसके तहत किसी व्यक्ति को अपनी जेंडर पहचान साबित करने के लिए किसी डॉक्टरी जांच या सरकारी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं थी।

हालांकि, नए संशोधन अधिनियम ने इस व्यवस्था को बदल दिया है:

  • मेडिकल और राज्य मूल्यांकन अनिवार्य: नए कानून के तहत ट्रांसजेंडर पहचान पत्र प्राप्त करने के लिए मेडिकल जांच और जिला प्रशासन का सर्टिफिकेट अनिवार्य कर दिया गया है।
  • परिभाषा पर विवाद: याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि इस संशोधन ने ट्रांसजेंडर की परिभाषा को सीमित कर दिया है और स्व-पहचान के अधिकार को छीन लिया है।

सरकार का रुख: 'पारदर्शिता और योजनाओं के दुरुपयोग पर रोक'

सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सरकार का तर्क है कि यह कदम कल्याणकारी योजनाओं के पारदर्शी क्रियान्वयन के लिए उठाया गया है। संसद में केंद्रीय मंत्री वीरेंद्र कुमार ने स्पष्ट किया था कि इस कानून का मकसद असली लाभार्थियों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाना और धोखाधड़ी को रोकना है।

"स्व-पहचान व्यक्ति की गरिमा से जुड़ी है, लेकिन जब कानूनी अधिकारों, कल्याणकारी योजनाओं और आधिकारिक रिकॉर्ड की बात आती है, तो राज्य की जिम्मेदारी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की भी होती है।"
- मेधा विश्राम कुलकर्णी, सांसद (BJP)

'मेरी पहचान तय करने वाला कोई दूसरा कौन?' - ट्रांस समुदाय की चिंताएं

लखनऊ की ट्रांसजेंडर छात्रा 'भूमि' कहती हैं, "मैं नहीं चाहती कि कोई और यह तय करे कि मैं पर्याप्त ट्रांसजेंडर हूं या नहीं। यह प्रक्रिया बेहद अपमानजनक और निजता पर हमला महसूस होती है।"

वरिष्ठ वकील अरुंधति काटजू और ट्रांस कार्यकर्ताओं का कहना है कि योजनाओं के दुरुपयोग का कोई ठोस आंकड़ा नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि 2026 तक केवल 32,000 सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं। इसके अलावा, नए कानून में अनधिकृत रूप से जेंडर बदलने के लिए दबाव बनाने पर 5 से 10 साल की सजा का प्रावधान है, जिसका इस्तेमाल परिवार वाले ट्रांस समुदाय के सपोर्ट नेटवर्क्स को निशाना बनाने के लिए कर सकते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. ट्रांसजेंडर संशोधन कानून को लेकर मुख्य विवाद क्या है?

मुख्य विवाद 'स्व-पहचान' का अधिकार खत्म करके मेडिकल बोर्ड और सरकारी अधिकारियों द्वारा सत्यापन अनिवार्य करने को लेकर है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह मौलिक अधिकारों का हनन है।

2. सरकार ने नए कानून के पक्ष में क्या तर्क दिया है?

सरकार का कहना है कि इस संशोधन से कल्याणकारी योजनाओं का दुरुपयोग रुकेगा, पारदर्शिता आएगी और वास्तविक ट्रांसजेंडर समुदाय को ही सरकारी लाभ मिल सकेगा।

3. मामला सुप्रीम कोर्ट में क्यों गया है?

ट्रांसजेंडर अधिकार कार्यकर्ताओं और वकीलों ने इसे 2014 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन और असंवैधानिक बताते हुए याचिका दायर की है, जिस पर अदालत में सुनवाई जारी है।

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अल्का सिंह

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Senior Content Writer

अल्का सिंह स्वास्थ्य और जीवनशैली से जुड़े विषयों पर गहन शोध के साथ लेखन करती हैं। उनका प्रयास रहता है कि पाठकों को केवल सामान्य जानकारी ही नहीं, बल...

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