आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में, जहाँ हर चीज़ तकनीक और डिजिटल स्क्रीन पर निर्भर हो चुकी है, वहीं उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित रामनगर में एक ऐसा भी संसार बसता है जो समय के पहिये को दो सौ साल पीछे धकेल देता है। यहाँ न तो बिजली के चकाचौंध करने वाले बल्बों की रोशनी होती है और न ही कानों के पर्दे फाड़ने वाले लाउडस्पीकरों की आवाज़। यहाँ गूंजती है तो सिर्फ प्राकृतिक आवाज़ें, पारंपरिक मशालों की पीली रोशनी और सदियों पुरानी संस्कृति की वो सौंधी खुशबू, जो देखने वाले के मन को पूरी तरह से मोह लेती है। हम बात कर रहे हैं विश्व प्रसिद्ध 'रामनगर की रामलीला' की, जो अपनी अनूठी शैली और प्राचीन परंपराओं के कारण आज भी पूरी दुनिया में अद्वितीय बनी हुई है।
त्रेतायुग का जीवंत अहसास कराती है रामनगर की धरा
वाराणसी के पास गंगा नदी के तट पर स्थित रामनगर की यह रामलीला महज एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह आस्था, इतिहास और लोक-संस्कृति का एक ऐसा महाकुंभ है जो हर साल अक्टूबर के महीने में जीवंत हो उठता है। लगभग दो सौ वर्षों से भी अधिक समय से चली आ रही इस परंपरा की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह आज के आधुनिक युग में भी प्राचीन मान्यताओं से इंच भर भी नहीं डिगी है। यहाँ जब मंचन शुरू होता है, तो ऐसा प्रतीत होता मानो दर्शक आधुनिक काल से निकलकर सीधे त्रेतायुग में प्रवेश कर गए हों।
यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर का गौरव
इस ऐतिहासिक रामलीला के वैश्विक महत्व को पहचानते हुए, वर्ष 2008 में यूनेस्को (UNESCO) ने इसे 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' (Intangible Cultural Heritage of Humanity) की प्रतिष्ठित सूची में शामिल किया था। यह इस बात का प्रमाण है कि भारत की यह प्राचीन लोक-कला न केवल देश के भीतर बल्कि पूरी दुनिया में अपनी सांस्कृतिक समृद्धि के लिए कितनी महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि हर साल इस भव्य आयोजन का गवाह बनने के लिए देश के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि विदेशों से भी लाखों पर्यटक, शोधकर्ता और कला प्रेमी काशी पहुँचते हैं।
बिना लाउडस्पीकर और बिजली के अचंभित करने वाला मंचन
आज के समय में बिना माइक या साउंड सिस्टम के किसी बड़े खुले मैदान में नाटक या सभा करना असंभव सा लगता है, लेकिन रामनगर की रामलीला इस नियम को पूरी तरह झुठला देती है। यहाँ न तो किसी माइक्रोफोन का इस्तेमाल होता है और न ही बिजली के लाउडस्पीकरों का। इसके बावजूद, कलाकारों द्वारा बोले जाने वाले संवाद खुले आसमान के नीचे बैठे हज़ारों दर्शकों तक अपनी पूरी स्पष्टता के साथ पहुँचते हैं।
रात के सन्नाटे में जब यह लीला आगे बढ़ती है, तो रोशनी के लिए आधुनिक एलईडी या हैलोजन लाइट्स के बजाय पेट्रोमैक्स (गैस बत्ती) और पारंपरिक मशालों का उपयोग किया जाता है। मशालों की टिमटिमाती रोशनी और उससे उठने वाला धुआं जब ऐतिहासिक किलों और मंदिरों की दीवारों पर पड़ता है, तो एक ऐसा अलौकिक और जादुई वातावरण बनता है जिसे शब्दों में बयान करना नामुमकिन है।
पूरा शहर बन जाता है एक खुला मंच
यह रामलीला किसी बंद ऑडिटोरियम या चार दीवारों के भीतर बने थिएटर तक सीमित नहीं है। रामनगर का लगभग 5 वर्ग किलोमीटर का पूरा क्षेत्र इस विशाल नाटक का खुला मंच बन जाता है। इस पूरे भौगोलिक दायरे में स्थायी और अस्थायी रूप से पौराणिक कथाओं के अनुसार अयोध्या, जनकपुर, चित्रकूट, पंचवटी और लंका जैसे स्थल सजाए जाते हैं।
कथा जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, वैसे-वैसे मंच भी बदलता है। दिलचस्प बात यह है कि केवल कलाकार ही नहीं, बल्कि हज़ारों की संख्या में मौजूद दर्शक भी प्रभु श्रीराम के साथ एक स्थान से दूसरे स्थान की इस यात्रा में पैदल या पारंपरिक वाहनों से साथ-साथ चलते हैं। यह दृश्य किसी विशाल जनसैलाब की तरह होता है, जहाँ हर व्यक्ति भक्ति में लीน नजर आता है।
31 दिनों तक चलने वाला सबसे लंबा उत्सव
देश के अधिकांश हिस्सों में रामलीला का आयोजन विजय दशमी तक यानी कुल 9 से 10 दिनों के भीतर समाप्त हो जाता है, लेकिन रामनगर में इसकी अवधि पूरे 31 दिनों की होती है। इस भव्य उत्सव की शुरुआत हर साल 'अनंत चतुर्दशी' के पावन अवसर पर होती है। इस पूरी लीला का मुख्य आधार महाकवि गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अमर ग्रंथ 'रामचरितमानस' है। संवाद और प्रसंग सीधे इसी ग्रंथ के छंदों और चौपाइयों से लिए जाते हैं, जिन्हें पारंपरिक टेर (सुरीली और गूंजती हुई आवाज में पाठ) के साथ गाया जाता है।
काशी नरेश का संरक्षण और शाही परंपरा
इस ऐतिहासिक आयोजन के पीछे काशी नरेश (वाराणसी के महाराजा) का प्रत्यक्ष संरक्षण और मार्गदर्शन रहा है। आज के आधुनिक दौर में भी राजशाही भले ही समाप्त हो चुकी हो, लेकिन रामनगर की रामलीला में काशी नरेश की भूमिका आज भी राजा वाली ही है। लीला के प्रत्येक दिन का शुभारंभ काशी नरेश के पारंपरिक शाही लवाजमे के साथ आगमन से होता है।
जैसे ही महाराज सभा में पहुँचते हैं, पूरा क्षेत्र 'हर हर महादेव' के गगनभेदी उद्घोष से गूंज उठता है। राजपरिवार के वरिष्ठ सदस्य आज भी पारंपरिक पोशाक में सजे-धजे हाथियों पर सवार होकर लीला स्थल पर पहुँचते हैं, जो इस आयोजन को पूरी तरह से एक शाही और ऐतिहासिक रूप प्रदान करता है।
स्वरूपों की कठिन तपस्या और अनुशासन
रामनगर की रामलीला में भगवान राम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और माता सीता का किरदार निभाने वाले बाल कलाकारों को 'स्वरूप' कहा जाता है। ये सभी स्वरूप 18 वर्ष से कम आयु के बालक होते हैं। इन 31 दिनों के दौरान इन बाल कलाकारों की दिनचर्या बेहद कठिन और अनुशासित होती है।
- घर से दूरी: ये बच्चे इन पूरे 31 दिनों तक अपने घरों से दूर रहते हैं और लीला परिसर में ही निवास करते हैं।
- ब्रह्मचर्य का पालन: वे पूरी तरह से कठोर ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं।
- सात्विक जीवनशैली: वे पूरी तरह शुद्ध सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं और सांसारिक गतिविधियों से पूरी तरह विरक्त रहते हैं।
- देवत्व का सम्मान: इन दिनों में स्थानीय लोग और श्रद्धालु इन बाल कलाकारों को साधारण बच्चा नहीं मानते, बल्कि उन्हें साक्षात भगवान का स्वरूप मानकर उनकी पूजा करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं।
आधुनिकता के बीच परंपरा की अमिट छाप
आज के इस भौतिकवादी युग में जहाँ हर चीज़ बहुत तेजी से बदल रही है, वहीं रामनगर की रामलीला ने अपनी जड़ों को मजबूती से थामे रखा है। यहाँ की मिट्टी में रची-बसी संस्कृति, अनुशासन और भक्ति का यह अनूठा संगम यह सिखाता है कि कैसे पुरानी परंपराएं आज भी प्रासंगिक बनी रह सकती हैं। यदि आप भारतीय संस्कृति, इतिहास और आध्यात्मिकता के असली स्वरूप को करीब से देखना चाहते हैं, तो जीवन में कम से कम एक बार रामनगर की इस अलौकिक रामलीला का हिस्सा जरूर बनना चाहिए। यह अनुभव आपके जेहन में हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो जाएगा।