उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर से तापमान चरम पर है। राज्य के सियासी गलियारों में इस समय सिर्फ एक ही चर्चा सबसे ज्यादा गर्म है—और वह है आगामी चुनावों को लेकर सीट बंटवारे का गणित। जैसे-जैसे राजनीतिक दल अपनी जमीन मजबूत करने में जुटे हैं, वैसे-वैसे आंतरिक कलह और वार्ताओं के पेंच भी उलझते जा रहे हैं। समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने जहां एक तरफ एनडीए (NDA) खेमे और पाला बदलने वाले दलों के लिए अपनी रणनीति का खुलासे करते हुए 162 सीटों का एक बड़ा समीकरण सामने रखा है, वहीं दूसरी तरफ 'इंडिया' गठबंधन के भीतर ही कांग्रेस के तेवरों ने सपा की पेशानी पर बल डाल दिए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ सीटों का सौदा नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की दो सबसे बड़ी विपक्षी पार्टियों के बीच वर्चस्व की एक खामोश जंग भी है। आइए जानते हैं कि आखिर इस पूरे घटनाक्रम के पीछे की असली सियासी बिसात क्या है और कैसे यह उत्तर प्रदेश के चुनावी परिणामों को पूरी तरह से प्रभावित कर सकती है।
अखिलेश यादव का 162 सीटों वाला मास्टरस्ट्रोक
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस बार फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं। हाल ही में उन्होंने जिस तरह से एनडीए गठबंधन और संभावित नए सहयोगियों के लिए रणनीतिक रूप से 162 सीटों का जिक्र किया है, उसने सियासी पंडितों को भी हैरान कर दिया है। जानकारों का कहना है कि इसके जरिए सपा उन सीटों पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है जहां पिछले चुनावों में या तो हार का अंतर बहुत कम था या फिर पार्टी का संगठन बेहद मजबूत स्थिति में है।
सपा के रणनीतिकारों का मानना है कि यदि एनडीए के भीतर किसी भी तरह की टूट-फूट होती है या क्षेत्रीय दल पाला बदलते हैं, तो उनके लिए इन 162 सीटों के दायरे में ही जमीन तलाशनी होगी। इस कदम को अखिलेश यादव के एक बड़े डिफेंसिव और ऑफेंसिव दांव के रूप में देखा जा रहा है, जिससे वे अपने मुख्य वोट बैंक यानी PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) समीकरण को भी साधे रखना चाहते हैं।
'इंडिया' गठबंधन में कांग्रेस की बढ़ती मांगें बनीं सिरदर्द
एक तरफ अखिलेश यादव एनडीए को मात देने के लिए अपनी पार्टी को सबसे बड़ी ताकत के रूप में पेश कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ उनके अपने ही गठबंधन के साथी यानी कांग्रेस पार्टी ने समाजवादी पार्टी की नींद उड़ा दी है। अंदरखाने से आ रही खबरों के मुताबिक, कांग्रेस इस बार उत्तर प्रदेश में सिर्फ सांकेतिक सीटों पर संतोष करने के मूड में बिल्कुल नहीं है।
कांग्रेस का तर्क है कि लोकसभा चुनावों में उनके प्रदर्शन के बाद राज्य में पार्टी का कैडर और मनोबल दोनों हाई हैं। ऐसे में, विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने सम्मानजनक सीटों की मांग की है, जो कि सपा द्वारा उन्हें दी जाने वाली शुरुआती पेशकश से कहीं ज्यादा है। इस मांग ने 'इंडिया' गठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग के फॉर्मूले को लगभग अधर में लटका दिया है।
- कांग्रेस का तर्क: पार्टी का मानना है कि संगठन को मजबूत करने के लिए ज्यादा सीटों पर लड़ना जरूरी है।
- सपा की दुविधा: अखिलेश यादव इतनी बड़ी संख्या में सीटें छोड़ने के पक्ष में नहीं हैं, क्योंकि इससे उनके पारंपरिक गढ़ और कार्यकर्ताओं में गलत संदेश जा सकता है।
- गठबंधन का भविष्य: यदि समय रहते इस पर सहमति नहीं बनी, तो सीट बंटवारे की यह रस्साकशी चुनाव से ठीक पहले नुकसान का सौदा साबित हो सकती है।
क्या कहती हैं राजनीतिक मजबूरियां?
उत्तर प्रदेश का चुनावी इतिहास गवाही देता है कि यहां बिना मजबूत सामाजिक समीकरण और स्पष्ट सीट तालमेल के चुनाव जीतना लगभग असंभव है। साल 2017 और 2022 के चुनावों के अनुभवों से सपा और कांग्रेस दोनों ने बहुत कुछ सीखा है। पिछले गठबंधनों में आपसी खींचतान के कारण कई सीटों परस्ताना पड़ा था, जिसका सीधा फायदा सत्ताधारी दल को मिला था।
यही वजह है कि इस बार दोनों ही दल अपनी तरफ से कोई भी कमज़ोर कड़ी नहीं छोड़ना चाहते। हालांकि, ज्यादा सीटों की जिद अंततः गठबंधन के लिए जी का जंजाल बन सकती है। स्थानीय कार्यकर्ताओं का भी यही मानना है कि अगर सीटों के बंटवारे पर फैसला जल्द नहीं हुआ, तो जमीनी स्तर पर चुनाव प्रचार की धार कमजोर पड़ जाएगी।
