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भारत के FCRA कानून में बदलाव से अमेरिका में मचा बवाल, सांसद राइली मूर ने दी कड़ा रुख अपनाने की चेतावनी

भारत के FCRA कानून में बदलाव से अमेरिका में मचा बवाल, सांसद राइली मूर ने दी कड़ा रुख अपनाने की चेतावनी

क्या भारत का विदेशी चंदा कानून (FCRA) अब नई दिल्ली और वाशिंगटन के बीच कूटनीतिक तनाव की नई वजह बनने जा रहा है? भारत सरकार द्वारा गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक संस्थानों और ट्रस्टों को मिलने वाले विदेशी दान के नियमों को कड़ा करने के प्रस्ताव पर अमेरिका से तीखी प्रतिक्रिया आई है। एक अमेरिकी सांसद ने इस कदम पर गहरी चिंता जताते हुए इसे दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों के लिए नुकसानदायक करार दिया है।

अमेरिकी सांसद राइली मूर का गंभीर आरोप

वेस्ट वर्जीनिया से रिपब्लिकन पार्टी के अमेरिकी सांसद राइली मूर (Riley Moore) ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर इस मुद्दे को लेकर अपनी बात रखी। मूर का दावा है कि विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) में किए जा रहे नए संशोधन भारतीय अधिकारियों को धार्मिक संस्थाओं और चर्चों के प्रबंधन पर नियंत्रण या उनके अधिग्रहण का अधिकार दे सकते हैं।

"भारत में ईसाइयों का इतिहास बेहद प्राचीन है, जो संत थामस के मलाबार तट पर आगमन के समय से चला आ रहा है। इस लंबे इतिहास के बावजूद, भारत की संसद FCRA नियमों में ऐसे संशोधन पर विचार कर रही है, जो सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटीज को अपने नियंत्रण में लेने की अनुमति देगा।" - राइली मूर, अमेरिकी सांसद

"द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ेगा सीधा असर"

अमेरिकी सांसद ने इस प्रस्तावित संशोधन को ईसाइयों के खिलाफ कदम बताते हुए चेतावनी दी है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि यह विधेयक अपने वर्तमान स्वरूप में आगे बढ़ता है, तो यह अमेरिका और भारत के रणनीतिक व कूटनीतिक संबंधों में एक प्रमुख चिंता और बाधा का विषय बन जाएगा।

आखिर क्या है एफसीआरए (FCRA) और क्यों है यह चर्चा में?

विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम यानी FCRA, भारत में किसी भी एनजीओ, ट्रस्ट या संस्थान द्वारा विदेश से प्राप्त होने वाले फंड को विनियमित करने वाला कानून है। भारत सरकार का तर्क रहता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा, पारदर्शिता और आर्थिक अखंडता बनाए रखने के लिए विदेशी धन की निगरानी बेहद जरूरी है। पिछले कुछ वर्षों में कड़े नियमों का पालन न करने के कारण कई विदेशी-वित्तपोषित संगठनों के लाइसेंस रद्द किए जा चुके हैं।

मामले से जुड़े मुख्य बिंदु:

  • विदेशी फंडिंग पर कड़ाई: भारत सरकार एनजीओ और धार्मिक ट्रस्टों को विदेश से मिलने वाले पैसों के इस्तेमाल पर पारदर्शिता बढ़ाना चाहती है।
  • अमेरिकी आपत्ति: सांसद मूर का आरोप है कि इससे धार्मिक स्वतंत्रता और चैरिटी संस्थाओं के काम में बाधा आएगी।
  • कूटनीतिक पहलू: अमेरिका के राजनीतिक गलियारों में इसे भारत-अमेरिका के मजबूत होते संबंधों के लिए एक संवेदनशील मुद्दा माना जा रहा है।

भारत का कूटनीतिक रुख

हालांकि, भारत हमेशा यह रुख अपनाता रहा है कि देश के आंतरिक कानून और वित्तीय नियम पूरी तरह से संप्रभुता और पारदर्शिता पर आधारित हैं। भारत किसी भी बाहरी देश द्वारा अपने आंतरिक विधायी मामलों में की गई टिप्पणियों को खारिज करता आया है। ऐसे में यह देखना होगा कि इस अमेरिकी बयान पर विदेश मंत्रालय क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देता है।

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