अधिकारों की मांग को लेकर सड़कों पर उतरने वाले नागरिकों और कानून के बीच की खींचतान एक बार फिर सुर्खियों में है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत डिपके ने हाल ही में सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका साफ कहना है कि सरकार नोएडा के प्राइवेट फर्म के मजदूरों के साथ जो कुछ किया, वही अब देश के छात्रों के साथ दोहराने की कोशिश कर रही है, जिसे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
नोएडा मजदूर आंदोलन और 53 दिनों की लंबी कैद
यह पूरा विवाद तब और गहरा गया जब इसी साल अप्रैल के महीने में नोएडा में एक हफ्ते तक चले प्राइवेट कंपनियों के मजदूरों के आंदोलन की एक रिपोर्ट सामने आई। इस आंदोलन के दौरान पुलिस ने लगभग 200 मजदूरों को हिरासत में लिया था। चौंकाने वाली बात यह है कि अदालत से जमानत मिलने से पहले इन मजदूरों ने औसतन 53 दिन जेल की सलाखों के पीछे बिताए।
अभिजीत डिपके ने एक मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए सोशल मीडिया पर सवाल उठाया कि उस तथाकथित 'पाकिस्तान लिंक' का क्या हुआ, जिसका दावा अक्सर ऐसे आंदोलनों के दौरान किया जाता है। जांच रिपोर्ट में यह बात सामने आई थी कि भले ही विरोध प्रदर्शन के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने मजदूरों के वेतन में बढ़ोतरी कर दी, लेकिन इसके बावजूद गरीब मजदूर जेल में सड़ते रहे।
अदालत की सख्ती और पुलिस की कार्रवाई पर सवाल
जब यह मामला अदालत में पहुंचा, तो न्यायपालिका ने स्थिति का संज्ञान लेते हुए अधिकांश मजदूरों को जमानत पर रिहा कर दिया। अदालत ने अपनी टिप्पणी में साफ कहा कि पुलिस इन मामलों में कोई भी पुख्ता और विशिष्ट सबूत पेश करने में पूरी तरह नाकाम रही है। पुलिस ने सिर्फ आंदोलन में भीड़ का हिस्सा होने या वहां मौजूद रहने के आधार पर ही लोगों को गिरफ्तार कर लिया था।
स्थिति तब और गंभीर हो गई जब हिरासत में लिए गए दो मजदूरों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) जैसी बेहद कड़ी धाराएं थोप दी गईं, जिसकी वजह से उनकी हिरासत की अवधि और लंबी हो गई। इन तमाम पहलुओं को उजागर करते हुए CJP प्रमुख ने मांग की है कि सरकार को अपने हक के लिए लड़ने वाले आम लोगों के खिलाफ कानूनों के दुरुपयोग को तुरंत बंद करना चाहिए।
छात्रों के आंदोलन पर मंडराता खतरा
मजदूरों के इस पूरे प्रकरण का हवाला देते हुए अभिजीत डिपके ने चेतावनी दी है कि प्रशासन की यही दमनकारी नीति अब छात्रों के खिलाफ भी अपनाई जा रही है। उन्होंने कहा, 'सरकार ने नोएडा के मजदूरों के साथ जो किया, अब वही तौर-तरीके छात्रों पर भी आजमाने की साजिश रची जा रही है।' संगठन का मानना है कि युवा पीढ़ी को दबाने की यह कोशिश देश के लोकतांत्रिक ताने-बाने के लिए ठीक नहीं है।
इसी बीच, कॉकरोच जनता पार्टी ने अपनी राष्ट्रीय कार्यसमिति की एक अहम बैठक बुलाई है। इस बैठक का मुख्य एजेंडा यह समीक्षा करना है कि 25 जुलाई को राष्ट्रव्यापी आंदोलन वापस लिए जाने के बाद केंद्र सरकार ने अपने वादों पर अब तक क्या कदम उठाए हैं। दबाव समूह का आरोप है कि सरकार की तरफ से अभी तक उन आश्वासनों को अमलीजामा पहनाने को लेकर कोई आधिकारिक और स्पष्ट संदेश नहीं दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट की सख्ती और एफआईआर की सूची
इस पूरे घटनाक्रम में सुप्रीम कोर्ट का रुख भी बेहद अहम रहा है। बीते 18 अगस्त को सर्वोच्च अदालत ने देश भर में छात्रों और प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर की एक समेकित सूची (Consolidated List) तलब की थी। CJP का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा तीन बार कहे जाने के बावजूद, केंद्र सरकार ने वह सूची उपलब्ध कराने को लेकर कोई ठोस प्रतिबद्धता नहीं दिखाई।
न्यायालय की इस सुनवाई के तुरंत बाद, CJP के सह-संयोजक सौरभ दास और कानूनी मामलों की प्रमुख रत्ना सिंह ने गहरी चिंता जताई थी। उनका कहना था कि सरकार ने केंद्र के साथ बातचीत के दौरान किए गए वादों के आधार पर आंदोलन समाप्त करने वाले युवाओं के साथ 'धोखाधड़ी' की है।
