स्वास्थ्य जगत में आज भी कई ऐसी बीमारियां हैं जिन्हें लेकर समाज में अनगिनत भ्रांतियां और डर समाए हुए हैं। इन्हीं में से एक नाम ट्यूबरकुलोसिस यानी टीबी (TB) का है। हमारे देश में आज भी जब किसी को टीबी होने का पता चलता है, तो लोग अक्सर उससे दूरी बनाने लगते हैं। आम बोलचाल और पुरानी धारणाओं के आधार पर यह मान लिया जाता है कि टीबी के मरीज के साथ उठना-बैठना, उसका जूठा खाना खाना या उसके साथ बर्तन शेयर करने से यह बीमारी दूसरों को भी जकड़ सकती है। लेकिन क्या वाकई इन साधारण सी हरकतों से टीबी का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे में फैल सकता है? इस सबसे बड़े और गंभीर सवाल का जवाब जानने के लिए हमने देश के प्रतिष्ठित संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) के वरिष्ठ चिकित्सकों से बात की और इस भ्रम की परत दर परत सच्चाई को टटोला।
टीबी को लेकर समाज में फैला सबसे बड़ा भ्रम
अक्सर भारतीय परिवारों में यह सीख दी जाती है कि किसी बीमार व्यक्ति का जूठा नहीं खाना चाहिए या उसके इस्तेमाल किए हुए बर्तनों को तुरंत अलग कर देना चाहिए। यह बात कुछ हद तक अन्य संक्रामक रोगों जैसे सर्दी-जुकाम, फ्लू या पेट के संक्रमण के मामले में सही भी बैठती है, क्योंकि ये वायरस आसानी से संपर्क में आने से फैलते हैं। यही कारण है कि लोगों ने अनजाने में टीबी को भी इसी श्रेणी में रख लिया है। लोग सोचते हैं कि अगर टीबी के मरीज ने जिस थाली में खाना खाया है, उसी में स्वस्थ व्यक्ति खा ले, तो उसे भी यह बीमारी हो जाएगी। AIIMS के डॉक्टरों के अनुसार, यह पूरी तरह से एक मिथक (Myth) है और इसका वास्तविकता से कोई लेना-देना नहीं है।
चिकित्सकों का स्पष्ट कहना है कि केवल खाना शेयर करने, बर्तन एक साथ धोने या किसी टीबी मरीज के साथ हाथ मिलाने से ट्यूबरकुलोसिस का संक्रमण नहीं फैलता है। टीबी का बैक्टीरिया पेट के रास्ते या त्वचा के संपर्क से शरीर में प्रवेश नहीं करता है, बल्कि इसका रूट पूरी तरह से अलग होता है।
आखिर कैसे फैलता है टीबी का संक्रमण?
एम्स के विशेषज्ञ डॉक्टरों ने समझाया कि माइकोबैक्टीरियम ट्यूबरकुलोसिस (Mycobacterium tuberculosis) नामक बैक्टीरिया के कारण होने वाली यह बीमारी मुख्य रूप से हवा के जरिए फैलती है, जिसे 'एयरबोर्न' (Airborne) इंफेक्शन कहा जाता है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:
- खांसने और छींकने से: जब फेफड़ों की टीबी से पीड़ित कोई मरीज खांसता है, छींकता है, जोर से बात करता है या हंसता है, तो उसके मुंह और नाक से सूक्ष्म बूंदें (Droplets) हवा में निकलती हैं।
- हवा में तैरते कण: ये सूक्ष्म कण काफी देर तक हवा में तैरते रहते हैं। जब कोई स्वस्थ व्यक्ति उस दूषित हवा में सांस लेता है, तो ये बैक्टीरिया उसकी श्वास नली के जरिए सीधे फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं।
- लंबे समय का संपर्क: यह संक्रमण आमतौर पर तब अधिक प्रभावी होता है जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे सक्रिय टीबी मरीज के संपर्क में लगातार और लंबे समय तक रहता है, जिसका इलाज अभी शुरू नहीं हुआ है।
साफ शब्दों में कहें तो टीबी का ट्रांसमिशन केवल रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट (श्वसन तंत्र) के माध्यम से होता है, न कि लार, पसीने, हाथ मिलाने या भोजन साझा करने से।
क्या कहते हैं एम्स के आंकड़े और डॉक्टर?
एम्स के पल्मोनरी मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी के मरीजों के साथ सामाजिक बहिष्कार जैसा व्यवहार करना पूरी तरह से गलत और अमानवीय है। डॉक्टर बताते हैं कि जब एक बार मरीज की एंटी-ट्यूबरकुलोसिस ड्रग्स (ATT) की थेरेपी शुरू हो जाती है, तो महज दो से तीन सप्ताह के भीतर ही वह संक्रमण फैलाने की स्थिति में नहीं रहता है। यानी दवाएं शुरू होने के कुछ ही दिनों बाद मरीज का बैक्टीरिया दूसरे को संक्रमित करने की क्षमता खो देता है।
"टीबी के मरीजों से दूरी बनाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्हें सामाजिक समर्थन, सही पोषण और समय पर दवा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। खाना शेयर करने से टीबी नहीं फैलता, इसलिए इस डर को अपने मन से पूरी तरह निकाल देना चाहिए।" - एम्स विशेषज्ञ
किन कारणों से बढ़ जाता है टीबी का खतरा?
भले ही खाना शेयर करने से टीबी न फैले, लेकिन कुछ ऐसे जोखिम कारक (Risk Factors) जरूर हैं जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) को कमजोर कर देते हैं और व्यक्ति को इस बैक्टीरिया की चपेट में आसानी से ला सकते हैं:
- कमजोर इम्यून सिस्टम या कुपोषण की स्थिति।
- एचआईवी या अन्य गंभीर बीमारियां जो शरीर की रक्षा प्रणाली को तोड़ देती हैं।
- धूम्रपान और तंबाकू का अत्यधिक सेवन, जो फेफड़ों को सीधे तौर पर नुकसान पहुंचाता है।
- हवादार और अत्यधिक भीड़-भाड़ वाले तंग इलाकों में रहना, जहां वेंटिलेशन की उचित व्यवस्था न हो।
- अनियंत्रित डायबिटीज (मधुमेह) के मरीज, जिनका शुगर लेवल अक्सर हाई रहता है।
टीबी के शुरुआती लक्षण जिन्हें भूलकर भी न करें नजरअंदाज
यदि समय रहते टीबी के लक्षणों की पहचान कर ली जाए, तो यह बीमारी पूरी तरह से ठीक हो जाती है। इसके मुख्य लक्षणों में शामिल हैं:
- लगातार दो हफ्ते से ज्यादा समय तक खांसी रहना (कई बार बलगम के साथ खून आना)।
- शाम के वक्त हल्का बुखार रहना या रात में सोते समय ज्यादा पसीना आना।
- बिना किसी स्पष्ट कारण के तेजी से वजन कम होना और शरीर में कमजोरी महसूस होना।
- भूख में भारी कमी आना और सीने में हल्का दर्द रहना।
बचाव और सावधानी के उपाय
चूंकि टीबी हवा के जरिए फैलती है, इसलिए इससे बचाव के लिए कुछ बुनियादी सावधानियां बरतना बेहद जरूरी है:
- खांसते या छींकते समय हमेशा अपने मुंह और नाक पर रुमाल या टिश्यू पेपर का इस्तेमाल करें।
- कमरों और दफ्तरों में ताजी हवा के आने-जाने (Ventilation) की पुख्ता व्यवस्था रखें।
- सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में मुफ्त उपलब्ध मिलने वाली टीबी की जांच समय-समय पर करवाएं।
- यदि घर में कोई टीबी का मरीज है, तो डॉक्टर की सलाह के अनुसार दवाइयां नियमित रूप से दें और मरीज को मास्क पहनने के लिए प्रेरित करें।
निष्कर्ष
निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि टीबी को लेकर समाज में फैले डर और संकोच को दूर करने का समय आ गया है। यह बीमारी लाइलाज नहीं है और न ही यह साथ खाने या बर्तन शेयर करने से फैलती है। जरूरत है तो बस सही जानकारी रखने की, मेडिकल साइंस पर भरोसा करने की और टीबी मरीजों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण रवैया अपनाने की। यदि हम जागरूक बनेंगे, तभी देश से टीबी के खात्मे का संकल्प पूरा हो सकेगा।