अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद जब कोई मरीज अपने घर लौटता है और सामान्य महसूस करने लगता है, तो उसके परिवार में राहत की सांस ली जाती है। ऐसा लगने लगता है कि अब सब कुछ ठीक हो गया है और दिल की वह भयानक बीमारी पीछे छूट चुकी है। लेकिन क्या वाकई शारीरिक रूप से ठीक महसूस करना इस बात की गारंटी है कि दिल की नलियों में अब कोई रुकावट या समस्या नहीं बची है?
चिकित्सा जगत के जानकारों का मानना है कि यह एक ऐसा भ्रम है, जो कई बार भारी पड़ सकता है। दिल का दौरा (Heart Attack) पड़ने के बाद केवल लक्षणों का गायब हो जाना या सीने में दर्द का रुक जाना यह साबित नहीं करता कि कोरोनरी धमनियां पूरी तरह से साफ हो चुकी हैं।
अंदरूनी स्थिति और बाहरी अहसास में फर्क
जब किसी व्यक्ति को मायोकार्डियल इंफार्क्शन यानी हार्ट अटैक आता है, तो डॉक्टरों की पहली प्राथमिकता मरीज की जान बचाना और उस वक्त बंद हुई मुख्य धमनी को खोलना होती है। यह काम एंजियोप्लास्टी और स्टेंट या फिर बाईपास सर्जरी के जरिए किया जाता है। इसके बाद मरीज को दवाइयां दी जाती हैं जिससे उसे राहत मिलती है।
हालांकि, यह प्रक्रिया केवल उस आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए होती है जिसने दौरा डाला था। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि शरीर की बाकी धमनियों में प्लाक (पोषक तत्वों और वसा का जमाव) पूरी तरह खत्म हो चुका है। कई बार अन्य धमनियों में छोटे या मध्यम स्तर के ब्लॉकेज बने रहते हैं, जो शुरुआती दौर में कोई लक्षण नहीं दिखाते।
क्यों जरूरी है नियमित फॉलो-अप और आगे की टेस्टिंग?
हृदय रोग विशेषज्ञों (Cardiologists) के अनुसार, रिकवरी फेज के दौरान मरीजों की यह सबसे बड़ी गलती होती है कि वे खुद को पूरी तरह स्वस्थ मानकर आगे के चेकअप टाल देते हैं।
- साइलेंट ब्लॉकेज: शरीर कई बार अंदरूनी खतरों को तुरंत संकेत के रूप में नहीं दिखाता। कई धमनियों में ब्लॉकेज धीरे-धीरे बढ़ता है।
- स्टेंट की स्थिति: डाले गए स्टेंट के आसपास नई कोशिकाएं या खून के थक्के जमने की आशंका हमेशा बनी रहती है।
- दवाइयों का प्रभाव: मरीज पर दी जा रही दवाओं का असर कितना हो रहा है, यह जांचने के लिए ब्लड टेस्ट और इमेजिंग जरूरी है।
यही वजह है कि डॉक्टर केवल दवाओं के सहारे छोड़ने के बजाय समय-समय पर स्ट्रेस टेस्ट, इकोकार्डियोग्राम या फॉलो-अप एंजियोग्राम की सलाह देते हैं।
मरीजों की मानसिकता और जीवनशैली में बदलाव
अक्सर यह देखा गया है कि जैसे ही मरीज की ऊर्जा वापस लौटती है, वे अपनी पुरानी जीवनशैली में लौटने लगते हैं। खानपान पर दोबारा लापरवाही बरतना, तनाव लेना और डॉक्टर द्वारा बताए गए दिशा-निर्देशों की अनदेखी करना भविष्य के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।
चिकित्सक इस बात पर जोर देते हैं कि दिल का दौरा पड़ना शरीर की ओर से एक आखिरी चेतावनी की तरह होता है। इस चेतावनी को गंभीरता से लेते हुए न सिर्फ इलाज प्रक्रिया को पूरा करना चाहिए, बल्कि अपनी दिनचर्या में योग, ध्यान, संतुलित आहार और नियमित वॉक को स्थायी रूप से शामिल करना बेहद आवश्यक है।
निष्कर्ष
यदि आप या आपके परिवार में कोई सदस्य हार्ट अटैक की प्रक्रिया से गुजर चुका है और अब बिल्कुल स्वस्थ महसूस कर रहा है, तो भी डॉक्टर से संपर्क तोड़ना समझदारी नहीं है। नियमित जांच और कार्डियोलॉजिस्ट की देखरेख ही वह सुरक्षा कवच है जो आपको भविष्य के बड़े जोखिमों से सुरक्षित रख सकता है। सतर्क रहें और स्वास्थ्य को लेकर किसी भी तरह की लापरवाही न बरतें।