जीवन और मृत्यु का चक्र इस ब्रह्मांड का सबसे बड़ा और अटल सत्य है। इस संसार में जो भी आया है, उसे एक न एक दिन इस नश्वर शरीर को छोड़कर जाना ही है। श्मशान घाट वह स्थान है जहाँ पहुँचकर बड़े से बड़ा अहंकारी भी घुटने टेक देता है। वहाँ राख हो रहे शरीर को देखकर इंसान को यह अहसास होना चाहिए कि इस दुनिया में न तो किसी की जिद साथ जानी है और न ही किसी का अहंकार। लेकिन, उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले से एक ऐसी घटना सामने आई है, जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है।
अंतिम विदाई या जंग का मैदान?
अमरोहा के प्रसिद्ध तिगरी गंगा धाम में एक पिता का अंतिम संस्कार चल रहा था। एक तरफ चिता की लपटें उठ रही थीं और दूसरी तरफ अपनों के बीच ही खूनी संघर्ष छिड़ गया। जिस क्षण बेटों और परिजनों को अपने आंसुओं को पोंछते हुए अपने प्रिय, अपने पिता को अंतिम विदाई देनी चाहिए थी, उसी पवित्र और शांत माने जाने वाले स्थल पर लाठी-डंडे और ईंट-पत्थर चलने लगे।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, विवाद इतना बढ़ गया कि चंद मिनटों में ही श्मशान घाट का वह पावन माहौल रणक्षेत्र में बदल गया। वहां मौजूद लोग समझ ही नहीं पा रहे थे कि मातम मनाएं या अपनी जान बचाएं। इस हिंसक झड़प में दोनों पक्षों के लगभग पांच लोगों के घायल होने की खबर है, जिन्हें तुरंत नजदीकी अस्पताल में भर्ती कराया गया।
कहाँ गई पारिवारिक मर्यादा और संवेदनाएं?
घटना की गंभीरता को देखते हुए स्थानीय पुलिस को तुरंत मौके पर पहुंचना पड़ा। पुलिस बल ने जब स्थिति को संभाला, तब जाकर मामला शांत हुआ। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या संवेदनाएं इतनी मर चुकी हैं कि अब अपनों की अंतिम विदाई का मौका भी झगड़े की भेंट चढ़ने लगा है?
प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, विवाद की जड़ें पुरानी रंजिश, संपत्ति या आपसी वर्चस्व की लड़ाई से जुड़ी हो सकती हैं। सोचिए, उस पिता पर क्या बीत रही होगी (यदि उसकी आत्मा देख रही हो) जिसने अपनी पूरी जिंदगी खून-पसीना बहाकर अपने बच्चों को पाला-पोसा, उन्हें काबिल बनाया और परिवार को एकजुट रखने की कोशिश की। और आज वही बच्चे, उसी पिता की चिता के पास खड़े होकर एक-दूसरे की जान लेने पर उतारू हैं।
श्मशान का संदेश और हमारी नीयत
- मोह-माया का अंत: श्मशान की राख हमें यह सिखाती है कि जीवन क्षणभंगुर है।
- खाली हाथ जाना है: इंसान तमाम उम्र संपत्ति और धन के पीछे भागता है, लेकिन अंत में सब यहीं रह जाता है।
- रिश्तों की कीमत: नफरत और अहंकार के चक्कर में लोग अपनों को ही दुश्मन बना बैठते हैं।
यह घटना केवल अमरोहा के तिगरी गंगा धाम की नहीं है, बल्कि यह आज के समाज के उस कड़वे सच को उजागर करती है जहाँ इंसान भौतिकता की अंधी दौड़ में इतना आगे निकल चुका है कि उसे अपनों का दर्द और मौत की पवित्रता भी नजर नहीं आती। धन, जमीन और मामूली अहं की भिड़ंत ने मानवीय मूल्यों को कुचलकर रख दिया है।
पुलिस की कार्रवाई और आगे की जांच
घटना के तुरंत बाद पुलिस हरकत में आई। अमरोहा पुलिस प्रशासन ने वीडियो फुटेज और वहां मौजूद लोगों के बयानों के आधार पर मामले की जांच शुरू कर दी है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि कानून व्यवस्था को हाथ में लेने वाले किसी भी शख्स को बख्शा नहीं जाएगा। घायलों का इलाज जारी है और पुलिस दोनों पक्षों से पूछताछ कर रही है ताकि इस हिंसा के असल कारणों का पता लगाया जा सके।
बहरहाल, यह घटना पूरे समाज के लिए एक गंभीर आत्मમंथन का विषय है। जब हम श्मशान की दहलीज पर खड़े होकर भी नफरत की आग को शांत नहीं कर सकते, तो फिर जीवन जीने का असली अर्थ क्या रह जाता है? जरूरत इस बात की है कि हम अपने भीतर झांकें और आक्रामकता की जगह सहनशीलता को अपनाएं, ताकि अंतिम विदाई जैसे पलों की भी गरिमा बनी रहे।