बिहार के भोजपुर जिले से एक ऐसा हैरान करने वाला मामला सामने आया है, जिसने कृषि विभाग के अधिकारियों को भी सोच में डाल दिया है। आपदा राहत और फसल क्षति अनुदान के नाम पर सरकारी खजाने से पैसे ऐंठने की जुगत में कुछ ऐसे लोगों ने भी आवेदन कर दिए हैं, जिनके खेतों में बाढ़ आने से पहले एक तिनका तक नहीं उगा था। जब विभाग ने ऑनलाइन आवेदनों की स्क्रूटनी शुरू की, तो जमीनी हकीकत और कागजी दावों के बीच का यह खेल खुलकर सामने आ गया।
जब फसल थी ही नहीं, तो नुकसान किस बात का?
यह पूरा मामला तब प्रकाश में आया जब प्राकृतिक आपदा यानी बाढ़ से प्रभावित किसानों के लिए सरकार की ओर से फसल क्षति अनुदान हेतु ऑनलाइन आवेदन आमंत्रित किए गए थे। नियम और प्रक्रिया के मुताबिक, जिन किसानों की फसलें बाढ़ या अत्यधिक बारिश की वजह से नष्ट हुई हैं, उन्हें आर्थिक सहायता दी जानी है।
लेकिन भोजपुर जिले के शाहपुर प्रखंड के अंतर्गत आने वाले कुछ इलाकों से ऐसे अजीबोगरीब दावे सामने आए, जहां खेतों में फसल बोई ही नहीं गई थी। जिन पंचायतों से ये आवेदन आए हैं, वहां की भौगोलिक स्थिति और कृषि इतिहास कुछ ऐसा है कि वहां के किसान अमूमन खरीफ के सीजन में बुआई से बचते हैं।
इन इलाकों के दावों ने बढ़ाई विभाग की टेंशन
जिला कृषि पदाधिकारी डॉ. नीरज कुमार के अनुसार, शाहपुर प्रखंड के लछुटोला, लालू का डेरा और दामोदरपुर जैसी करीब एक दर्जन ऐसी पंचायतें हैं, जहां हर साल बाढ़ का प्रकोप रहता है और खेतों में लंबे समय तक पानी जमा रहता है। इस वजह से इन क्षेत्रों में पारंपरिक रूप से खरीफ फसल की खेती नहीं की जाती है।
इसके बावजूद, जब अनुदान वितरण के लिए पोर्टल खुला, तो इन्हीं क्षेत्रों से धड़ाधड़ फसल क्षति के दावे अपलोड कर दिए गए। कागजों पर फसल नुकसान दिखाकर मुआवजा हासिल करने की इस चालाकी ने प्रशासनिक अमले को सतर्क कर दिया है कि आखिर बिना फसल के यह मुआवजा पाने की होड़ क्यों मची हुई है।
डिजिटल सर्वे बनेगा सच और झूठ का पैमाना
गनीमत यह है कि कृषि विभाग ने इस बार पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने के लिए पहले ही पुख्ता इंतजाम कर रखे थे। विभाग ने बाढ़ आने से ठीक पहले ही संबंधित क्षेत्रों में फसल की वास्तविक स्थिति का डिजिटल सर्वेक्षण करा लिया था। इस सर्वे के दौरान खेतों की जियो-टैगिंग के साथ-साथ रकबा, खेसरा, अक्षांस (Latitude) और देशांतर (Longitude) जैसी तमाम तकनीकी जानकारियां डिजिटल रूप से पोर्टल पर सुरक्षित अपलोड कर दी गई थीं।
अब विभाग इन्हीं पुराने डिजिटल आंकड़ों और हाल ही में आए ऑनलाइन आवेदनों का आमने-सामने मिलान कर रहा है। चूंकि हर खेत का डिजिटल रिकॉर्ड विभाग के पास सुरक्षित है, इसलिए यह पहचानना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं हो रहा है कि किस किसान का दावा सच है और किसका आवेदन पूरी तरह फर्जी और कागजी है।
सत्यापन के बाद होगी सख्त कार्रवाई
कृषि विभाग का स्पष्ट रुख है कि राज्य के किसी भी वास्तविक और जरूरतमंद किसान का हक नहीं मारा जाना चाहिए। जिन किसानों के खेतों में वाकई फसल लहलहा रही थी और बाढ़ के पानी ने उनकी मेहनत पर पानी फेर दिया है, उन्हें नियमानुसार समय पर मुआवजा राशि उनके बैंक खातों में ट्रांसफर की जाएगी।
परंतु, दूसरी तरफ जो लोग बिना फसल के ही अनुदान पाने के लिए गलत दावे ठोक रहे हैं, उनके आवेदन पूरी तरह से छांटे जा रहे हैं। जांच में गड़बड़ी साबित होते ही ऐसे सभी फर्जी आवेदनों को तत्काल प्रभाव से रद्द किया जा रहा है। प्रशासनिक स्तर पर यह चेतावनी भी दी जा रही है कि आपदा के नाम पर इस तरह की धांधली करने वालों को बख्शा नहीं जाएगा।
भोजपुर में कितने क्षेत्रफल का हुआ था आकलन?
आंकड़ों पर गौर करें तो भोजपुर जिले के लगभग सात प्रखंडों में बाढ़ और अन्य कारणों से हुई फसल क्षति का कुल आकलन करीब 21,489 हेक्टेयर भूमि पर किया गया था। विभाग की कोशिश है कि इस बड़े दायरे में राहत राशि का वितरण पूरी पारदर्शिता के साथ हो ताकि बिचौलियों या गलत नीयत वाले लोगों की दाल न गल सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की सख्ती से भविष्य में सरकारी योजनाओं का लाभ उठाने के नाम पर होने वाली अनियमितताओं पर लगाम लगेगी। किसानों के बीच भी यह संदेश साफ जा रहा है कि अब केवल कागजी हवाई किले बनाकर सरकारी सहायता नहीं बटोरी जा सकती, क्योंकि तकनीक और डिजिटल रिकॉर्ड हर झूठ का पर्दाफाश करने के लिए तैयार बैठा है।