चिकित्सा जगत में जब कभी असाधारण और बेहतरीन तालमेल की मिसाल दी जाती है, तो उसमें समय पर लिया गया फैसला और डॉक्टरों की टीम का समर्पण सबसे ऊपर आता है। उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में स्थित बाबा कीनाराम स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय (पंडित कमलापति त्रिपाठी संयुक्त चिकित्सालय) के डॉक्टरों ने कुछ ऐसा ही करिश्मा कर दिखाया है। यहाँ की मेडिकल टीम ने अपनी मुस्तैदी और बेहतरीन चिकित्सकीय कौशल का परिचय देते हुए एक बेहद गंभीर हालत में पहुंचे मरीज को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया है। दो दिनों तक लगातार वेंटिलेटर सपोर्ट पर जिंदगी और मौत की जंग लड़ने के बाद मरीज अब खतरे से बाहर है और तेजी से रिकवरी की ओर बढ़ रहा है।
अचानक बिगड़ी थी तबीयत, इमरजेंसी में हड़कंप
यह पूरी घटना सैयदराजा थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले काटा गांव की है। यहाँ के रहने वाले सुजीत (पुत्र रामचंद्र) की अचानक तबीयत इतनी बिगड़ गई कि परिजनों के पैरों तले जमीन खिसक गई। आनन-फानन में परिवार के लोग उन्हें लेकर चंदौली के मुख्य अस्पताल यानी बाबा कीनाराम मेडिकल कॉलेज पहुंचे। 25 अगस्त 2026 की दोपहर लगभग 1:25 बजे जब सुजीत को अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में लाया गया, तो उनकी हालत बेहद नाजुक थी। उन्हें सांस लेने में भारी तकलीफ हो रही थी और शरीर में ऑक्सीजन का स्तर तेजी से गिर रहा था।
मरीज की इस गंभीर स्थिति को देखकर अस्पताल में तैनात मेडिकल स्टाफ तुरंत हरकत में आ गया। इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर डॉ. अजय कुमार वर्मा ने बिना एक पल भी गंवाए हालात की गंभीरता को समझा और तुरंत एक्शन लिया। उन्होंने बगैर देर किए मरीज को कृत्रिम सांस देने के लिए इंट्यूबेशन की प्रक्रिया को पूरा किया, जो उस वक्त मरीज की जान बचाने के लिए सबसे पहला और बेहद जरूरी कदम था।
इमरजेंसी से लेकर आईसीयू तक दिखा परफेक्ट टीमवर्क
किसी भी क्रिटिकल पेशेंट के मामले में पहले कुछ मिनट बेहद अहम होते हैं। इस मामले में भी ऐसा ही देखने को मिला। इमरजेंसी में तैनात फार्मासिस्ट बीर सिंह और जूनियर रेजिडेंट्स की पूरी टीम ने डॉ. अजय कुमार वर्मा के साथ मिलकर जिस मुस्तैदी से काम किया, उसने सभी का दिल जीत लिया। शुरुआती जीवनरक्षक प्रक्रिया और मरीज को सांस का स्थिर सपोर्ट मिलने के बाद, दोपहर करीब 2:20 बजे उन्हें फौरन बेहतर देखभाल के लिए अस्पताल के इंटेंसिव केयर यूनिट यानी आईसीयू (ICU) में शिफ्ट कर दिया गया।
आईसीयू में कदम रखते ही मरीजों की देखरेख का जिम्मा आईसीयू प्रभारी डॉ. विवेकानंद तिवारी के कन्धों पर आ गया। उनके निर्देशन में डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ की एक विशेष टीम ने सुजीत की सेहत पर चौबीसों घंटे पैनी नजर रखनी शुरू कर दी। नर्सिंग टीम का नेतृत्व कर रहे शुभम सिंह पटेल और उनके सहयोगियों ने दवाइयों के प्रशासन और मॉनिटरिंग में कोई कसर नहीं छोड़ी। हर घंटे मरीज के वाइटल्स चेक किए जा रहे थे ताकि किसी भी संभावित खतरे से पहले ही निपटा जा सके।
दो दिनों की कड़ी मशक्कत के बाद वेंटिलेटर से हटाया गया
मरीज की नाज़ुक हालत को देखते हुए उन्हें 25 अगस्त की दोपहर 1:30 बजे से लेकर 27 अगस्त की दोपहर 2:30 बजे तक यानी लगभग पूरे 48 घंटे से अधिक समय तक वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया। इस दौरान मेडिकल टीम की धड़कनें भी मरीज के साथ ही चल रही थीं। हर गुजरते घंटे के साथ डॉक्टरों की कोशिश यही थी कि किसी तरह मरीज के फेफड़े प्राकृतिक रूप से काम करना शुरू कर दें और उनका शरीर वेंटिलेटर की निर्भरता से बाहर आ सके।
आखिरकार, डॉक्टरों की कड़ी मेहनत, सही दवाइयों और सटीक ट्रीटमेंट प्लान का असर दिखने लगा। 27 अगस्त की दोपहर करीब 2:35 बजे जब मेडिकल टीम ने पाया कि सुजीत की स्थिति में अपेक्षित और संतोषजनक सुधार आ चुका है, तो उन्होंने एक बड़ा और राहत भरा फैसला लिया। मरीज को सुरक्षित तरीके से वेंटिलेटर से हटाकर नॉन-रीब्रीदर मास्क (NRBM) यानी ऑक्सीजन सपोर्ट पर शिफ्ट कर दिया गया। वर्तमान में मरीज की स्थिति पूरी तरह स्थिर है और डॉक्टरों की टीम लगातार उनकी रिकवरी पर नजर बनाए हुए है।
अस्पताल प्रशासन और प्राचार्य ने सराहा डॉक्टरों का हौसला
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद मेडिकल कॉलेज परिसर में खुशी और संतोष का माहौल है। अस्पताल प्रशासन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वे आम जनता को उच्च कोटि की स्वास्थ्य सेवाएं देने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हैं। कॉलेज के प्राचार्य डॉ. अमित कुमार सिंह ने इस बड़ी चिकित्सकीय सफलता पर अपनी पूरी टीम को बधाई दी है।
डॉ. अमित कुमार सिंह ने कहा, "यह सफलता किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हमारे इमरजेंसी स्टाफ, आईसीयू टीम, रेजिडेंट डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के बीच शानदार तालमेल का नतीजा है। हमारे अस्पताल में आने वाले हर गंभीर मरीज को तुरंत और सही इलाज देना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है। अगर हमारे सभी विभाग इसी तरह पूरी जिम्मेदारी और लगन के साथ काम करते रहे, तो यह संस्थान बहुत जल्द चिकित्सा क्षेत्र में नई ऊंचाइयों को छुएगा और पूर्वांचल के लोगों के लिए वरदान साबित होगा।"
चिकित्सा व्यवस्था के लिए एक सकारात्मक संदेश
छोटे शहरों और ग्रामीण इलाकों के सरकारी अस्पतालों में अक्सर लचर व्यवस्थाओं की खबरें सामने आती हैं, लेकिन चंदौली मेडिकल कॉलेज की इस घटना ने यह दिखा दिया है कि यदि सही समय पर सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो सरकारी अस्पतालों में भी बड़े से बड़े निजी अस्पतालों जैसी बेहतरीन स्वास्थ्य सुविधाएं मिल सकती हैं। सुजीत के परिजनों ने भी अस्पताल के सभी डॉक्टरों और नर्सिंग स्टाफ के प्रति अपना आभार व्यक्त किया है, जिनकी वजह से आज उनके घर का चिराग एक बार फिर रोशन हो सका है।
