भारतीय ग्रामीण इलाकों में विकास के दावों की पोल खोलने वाली तस्वीरें अक्सर सामने आती रहती हैं, लेकिन उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले की एक ग्राम सभा की स्थिति व्यवस्था पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर रही है। यहां के निवासियों का एक दशक का इंतजार केवल प्रशासनिक आश्वासनों और चुनावी वादों के बीच ही दम तोड़ता नजर आ रहा है। चंदौली के नियमताबाद ब्लॉक के अंतर्गत आने वाली ग्राम सभा चौरहट की पुरानी बस्ती इन दिनों भीषण उपेक्षा का दंश झेल रही है। हालात ऐसे हैं कि थोड़ी सी बारिश भी यहां के जनजीवन को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त कर देती है.
एक दशक का सफर और धरातल पर शून्य विकास
लोकतंत्र में चुनाव जनप्रतिनिधियों की परीक्षा का समय होते हैं और जनता के विकास कार्यों से ही उनका मूल्यांकन होता है। लेकिन चौरहट की पुरानी बस्ती के बाशिंदों के लिए पिछले दस साल केवल तारीखों के बदलने जैसे रहे हैं। स्थानीय लोगों का दर्द साफ झलकता है कि जब पिछले चुनाव हुए थे, तब बड़े-बड़े वादे किए गए थे। आश्वासन मिला था कि गांव की तस्वीर बदल जाएगी, गलियां पक्की होंगी, जल निकासी की पुख्ता व्यवस्था होगी और मूलभूत सुविधाओं का अंबार लग जाएगा।
हालांकि, आज जब पूरे दस साल बीत चुके हैं, तो धरातल पर स्थिति जस की तस बनी हुई है। विकास के नाम पर यहां केवल खोखले दावे और फाइलों में दर्ज योजनाएं ही नजर आती हैं। गांव की गलियों में कदम रखते ही स्थानीय विकास के दावों की सच्चाई खुलकर सामने आ जाती है।
जरा सी बारिश में नर्क बन जाती है रोजमर्रा की जिंदगी
चौरहट की पुरानी बस्ती की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यहां मौसम का थोड़ा सा भी बदलाव लोगों के लिए बड़ी आफत बन जाता है। आसमान में बादल घिरे और थोड़ी सी बारिश हुई कि गांव की गलियों और रास्तों का हाल बद से बदतर हो जाता है। पानी की निकासी का कोई उचित प्रबंध न होने के कारण बारिश का पानी रास्तों पर जमा हो जाता है, जिससे पूरा इलाका जलभराव की चपेट में आ जाता है।
- दैनिक कार्यों में बाधा: बच्चों के स्कूल जाने से लेकर बड़ों के रोजमर्रा के कामकाज तक, हर गतिविधि ठप पड़ जाती है।
- कीचड़ और जलभराव: रास्तों पर कीचड़ का साम्राज्य फैल जाता है, जिससे पैदल चलना भी दूभर हो जाता है।
- स्वास्थ्य का जोखिम: गंदे पानी के जमा होने से संक्रामक बीमारियों और मच्छरों का खतरा लगातार मंडराता रहता है।
रोजमर्रा की जिंदगी की इन बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए भी स्थानीय नागरिकों को रोजाना संघर्ष करना पड़ रहा है। जो लोग शहर या अन्य जगहों पर काम के सिलसिले में जाते हैं, उन्हें कीचड़ भरे रास्तों से गुजरने के लिए भारी मशक्कत करनी पड़ती है.
दोबारा चुनावी सरगर्मी और जनता का आक्रोश
वक्त का पहिया अपनी रफ्तार से घूम रहा है और अब एक बार फिर से चुनावी सुगबुगाहट तेज हो गई है। पिछले दस सालों तक क्षेत्र से नदारद रहने वाले या विकास के मोर्चे पर असफल साबित होने वाले प्रतिनिधि अब नए सिरे से तैयारी में जुट गए हैं। गांव की गलियों में एक बार फिर से लुभावने वादों और दावों का दौर शुरू होने की सुगबुगाहट सुनाई देने लगी है।
लेकिन इस बार चौरहट की जनता का मूड बदला हुआ है। पिछले दस वर्षों की पीड़ा को झेल चुके ग्रामीण अब इन राजनीतिक गतिविधियों को बेहद निंदनीय और छलावा मान रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन प्रतिनिधियों ने एक दशक तक उनकी सुधि नहीं ली, वे अब किस मुंह से वोट मांगने आएंगे? जनता को केवल चुनाव के वक्त धोखा देने और लुभाने की यह प्रवृत्ति अब अस्वीकार्य हो चुकी है।
ग्राम सभा चौरहट की रुलाई और भविष्य की उम्मीदें
आज ग्राम सभा चौरहट अपनी बदहाली पर आंसू बहा रही है। यहां के लोग सिर्फ इतनी मांग कर रहे हैं कि उन्हें सड़क, पानी और बुनियादी सहूलियतें मिल जाएं, जो उनका हक है। डिजिटल होती इस दुनिया में जहां देश के कई गांव स्मार्ट बन रहे हैं, वहीं चंदौली की यह पुरानी बस्ती आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रही है।
यह स्थिति न केवल स्थानीय प्रशासन के लिए बल्कि उन सभी जनप्रतिनिधियों के लिए एक गंभीर आत्ममंथन का विषय है जो लोकतंत्र में जनता के सेवक होने का दावा करते हैं। चौरहट की जनता अब सिर्फ वादे नहीं, बल्कि ठोस परिणाम चाहती है। देखना यह होगा कि क्या इस बार प्रशासनिक अमला और आने वाले प्रतिनिधि इस सुदूर बस्ती की सुध लेते हैं या फिर विकास के नाम पर सिर्फ चुनावी जुमले ही परोसे जाते रहेंगे।