वैश्विक मंच पर शांति स्थापना के प्रयासों को तेज करते हुए भारत ने एक बार फिर स्पष्ट कर दिया है कि वह रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे लंबे संघर्ष को समाप्त कराने के लिए हरसंभव मदद करने को तैयार है। नई दिल्ली में विदेश मंत्रालय की ओर से यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब दुनिया भर की निगाहें भारत की कूटनीतिक भूमिका पर टिकी हुई हैं। भारत का रुख हमेशा से अडिग रहा है कि किसी भी समस्या का समाधान रणक्षेत्र में खून बहाने से नहीं, बल्कि बातचीत और कूटनीति की टेबल पर ही संभव है।
युद्ध के मैदान से नहीं निकलेगा कोई समाधान
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने एक मीडिया ब्रीफिंग के दौरान साफ शब्दों में कहा कि भारत का यह पुराना और स्पष्ट दृष्टिकोण है कि वर्तमान समय संघर्ष का नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अंतहीन युद्ध अब थम जाना चाहिए और इसके स्थान पर शांति का मार्ग प्रशस्त होना चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस ऐतिहासिक संदेश को एक बार फिर दोहराया गया जिसमें उन्होंने कहा था कि आज का युग युद्ध का नहीं है।
रणधीर जायसवाल के अनुसार, भारत केवल दर्शक बनकर नहीं बैठा है, बल्कि वह रूस और यूक्रेन दोनों ही देशों के शीर्ष नेतृत्व के साथ निरंतर संपर्क बनाए हुए है। नई दिल्ली उन तमाम रचनात्मक विचारों और सुझावों पर बारीक नजर रख रही है और उन पर विचार कर रही है जो इस खूनी संघर्ष को रोकने में मददगार साबित हो सकते हैं।
विदेश मंत्री एस. जयशंकर के दौरों के मायने
हाल ही में विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने पोलैंड और यूक्रेन का दौरा किया था। इस कूटनीतिक दौरे के दौरान उन्होंने दोनों देशों के प्रमुख नेताओं के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं में भारत की मंशा को बहुत स्पष्ट रूप से रखा था। कीव और वारसॉ में की गई बैठकों में यह बात खुलकर सामने आई कि यदि दोनों पक्ष चाहें तो भारत इस ऐतिहासिक गतिरोध को खत्म करने में एक निष्पक्ष और मददगार कड़ी की भूमिका निभाने से पीछे नहीं हटेगा।
पोलैंड की राजधानी वारसॉ में वहां के विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोरस्की के साथ हुई संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में भी एस. जयशंकर ने इस बात को बल दिया था कि भारत मॉस्को और कीव के बीच दूरियों को पाटने के लिए हरसंभव प्रयास करने को प्रतिबद्ध है। यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा के साथ हुई बैठकों में भी इस बात पर गंभीर चर्चा हुई कि कैसे कूटनीतिक चैनलों को फिर से सक्रिय किया जाए।
शुरुआत से ही संवाद का पक्षधर रहा है भारत
जब साल 2022 में इस संघर्ष की शुरुआत हुई थी, तभी से भारत ने बिना किसी पक्षपात के शांति का संदेश दिया है। उज्बेकिस्तान के समरकंद में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात इसका सबसे बड़ा गवाह है, जहां पीएम मोदी ने दुनिया के सामने यह सत्य रखा था कि आज का दौर युद्धों का नहीं होना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक दक्षिण (Global South) के एक बड़े नेता के रूप में भारत की कूटनीतिक स्वीकार्यता रूस और यूक्रेन दोनों ही खेमों में है। पश्चिमी देश जहां यूक्रेन के साथ खड़े हैं और रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाए बैठे हैं, वहीं भारत के संबंध रूस के साथ भी पारंपरिक रूप से बेहद मजबूत रहे हैं। यही वजह है कि दोनों देश भारत को एक भरोसेमंद मध्यस्थ के रूप में देख सकते हैं जो बिना किसी पूर्वाग्रह के शांति वार्ता की जमीन तैयार कर सके।
आगे की राह और वैश्विक उम्मीदें
वर्तमान वर्ष 2026 में प्रवेश करते-करते यह युद्ध दुनिया की अर्थव्यवस्था और मानवीय संकट का एक बड़ा कारण बन चुका है। ऐसे में भारत की यह पहल अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए एक बड़ी उम्मीद बनकर उभरी है। हालांकि, यह पूरी तरह से मॉस्को और कीव की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है कि वे शांति के इन प्रस्तावों को किस रूप में स्वीकार करते हैं। लेकिन इतना तय है कि भारत ने अपनी ओर से वैश्विक शांति के लिए कूटनीति का वह दरवाजा खुला रखा है जो इस खूनी खेल को विराम दे सकता है।