प्राकृतिक आपदाएं जब जीवन की रफ्तार को अचानक रोक देती हैं, तो चारों ओर सिर्फ पानी का शोर, चीख-पुकार और भविष्य को लेकर अनिश्चितता का अंधेरा छा जाता है। बिहार के भागलपुर में इस समय कुछ ऐसा ही मंज़र है, जहां गंगा और अन्य नदियों की उफनती धाराओं ने सैंकड़ों परिवारों को बेघर कर दिया है। राहत और बचाव कार्यों के बीच, स्थानीय पॉलिटेक्निक कॉलेज में बने राहत शिविर से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो किसी के भी चेहरे पर मुस्कान ले आए। यह तस्वीर महज़ एक राहत शिविर की नहीं, बल्कि इंसानी जिजीविषा और कला की वह ताकत है जो सबसे बड़े संकट में भी उम्मीद का दीया जला सकती है।
जब दर्द और विस्थापन के साए में चली कूची
घर-बार छूटने का गम, आंखों में भविष्य को लेकर अनिश्चितता और हर तरफ बाढ़ का पानी—इन विकट परिस्थितियों ने बच्चों के कोमल मन पर गहरा असर छोड़ा था। ऐसे में बच्चों को इस मानसिक आघात (Trauma) से बाहर निकालने के लिए प्रशासन और सामाजिक स्तर पर एक अनूठी पहल की शुरुआत की गई। राहत शिविर में रह रहे बाढ़ प्रभावित परिवारों के बच्चे और महिलाएं अब केवल राहत सामग्री का इंतजार नहीं कर रहे, बल्कि वे बिहार की प्राचीन और समृद्ध लोककला 'मंजूषा पेंटिंग' की बारीकियां सीख रहे हैं।
विस्थापन के इस तनाव को दूर करने के लिए कला को एक हथियार बनाया गया है। शिविर के तंबूओं और कमरों के बीच जब बच्चे हाथों में ब्रश और रंग थामकर बैठते हैं, तो कुछ पलों के लिए वे अपनी सारी तकलीफें भूल जाते हैं। कागज़ पर उतरती मंजूषा कला की पारंपरिक रेखाएं उनके भीतर एक नई ऊर्जा का संचार कर रही हैं।
मंजूषा गुरु मनोज पंडित का अनूठा योगदान
इस रचनात्मक पहल को ज़मीन पर उतारने में जाने-माने मंजूषा गुरु मनोज पंडित की भूमिका बेहद अहम रही है। वे खुद राहत शिविर में मौजूद रहकर बच्चों और महिलाओं को इस प्राचीन अंगिका लोककला की तालीम दे रहे हैं। गुरु मनोज पंडित बच्चों को मंजूषा कला के कड़े नियम, उसकी खास सर्प जैसी रेखाएं (Snake motifs) और पारंपरिक रंगों के संयोजन की शिक्षा दे रहे हैं।
मनोज पंडित बताते हैं, 'संकट की इस घड़ी में बच्चों का मानसिक संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती होती है। जब मैंने इन बच्चों को कला से जोड़ने का विचार रखा, तो इनका उत्साह देखने लायक था। आज स्थिति यह है कि बच्चे सुबह उठते ही अपने पेंटिंग बॉक्स के साथ कतार में बैठ जाते हैं। कला ने इनके भीतर के डर और अवसाद को पूरी तरह से धो डाला है।'
बिहुला-विषहरी की कथाओं से सज रहे हैं कागज़
अंग प्रदेश की लोकगाथा 'बिहुला-विषहरी' पर आधारित मंजूषा पेंटिंग अपने आप में बेहद अनूठी है। इसे 'स्नेक पेंटिंग' के नाम से भी जाना जाता है, जिसमें मुख्य रूप से गुलाबी, पीले और हरे रंगों का प्रयोग होता है। राहत शिविर में बैठे छोटे-छोटे बच्चे जब अपने हाथों से बिहुला, बाला का और सर्प की आकृतियों को उकेरते हैं, तो ऐसा लगता मानो सदियों पुरानी परंपरा किसी नए रूप में पुनर्जीवित हो रही हो।
- पारंपरिक रंग: गुलाबी, पीला और हरा रंग जो इस कला की पहचान हैं।
- पौराणिक कथा: अंग क्षेत्र की अमर प्रेम और विश्वास की गाथा 'बिहुला-विषहरी'।
- मानसिक लाभ: बच्चों में ध्यान केंद्रित करने की क्षमता का विकास और तनाव से मुक्ति।
अस्थाई विद्यालय: शिक्षा के साथ रचनात्मकता का संगम
केवल कला ही नहीं, बल्कि बच्चों की पढ़ाई का नुकसान न हो, इसके लिए भी पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। बिहार सरकार के स्पष्ट निर्देशों के बाद भागलपुर जिला प्रशासन ने इस बाढ़ राहत शिविर के भीतर ही एक अस्थाई विद्यालय का संचालन शुरू किया है। यहाँ नियमित रूप से शिक्षक बच्चों को पढ़ा रहे हैं ताकि आपदा के कारण उनकी अकादमिक पढ़ाई बाधित न हो।
स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासन की यह पहल सिर्फ कागजी नहीं है, बल्कि जमीन पर इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। सुबह के वक्त जहां बच्चे स्कूल की तर्ज पर पढ़ाई करते हैं, वहीं दोपहर बाद कला कक्षाओं में अपनी रचनात्मकता को पंख देते हैं। इस दोहरी गतिविधि ने शिविर के उस gloomy (निराशाजनक) माहौल को पूरी तरह बदल दिया है, जो अमूमन ऐसे राहत कैंपों में देखने को मिलता है।
प्रशासन की संवेदनशीलता की सराहना
आम तौर पर आपदा राहत शिविरों की छवि केवल दाल-चावल, तिरपाल और सरकारी सहायता तक सीमित मानी जाती है। लेकिन भागलपुर प्रशासन ने लीक से हटकर यह साबित कर दिया है कि संकट के समय मानसिक पुनर्वास (Mental Rehabilitation) भी उतना ही जरूरी है जितना कि पेट भरना।
शिविर में रह रही महिलाओं ने भी इस पहल में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है। कई महिलाओं का मानना है कि इन कक्षाओं के शुरू होने से उनका दिन आसानी से कट जाता है और घर खोने का जो मानसिक तनाव उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रहा था, उससे भी राहत मिली है। महिलाएँ पारंपरिक कला के जरिए अपनी आजीविका के नए रास्ते तलाशने की उम्मीद भी संजो रही हैं।
उम्मीद की एक नई सुबह
भागलपुर के इस पॉलिटेक्निक कॉलेज का राहत शिविर इस बात का जीता-जागता उदाहरण है कि विपरीत परिस्थितियां इंसानी हौसले को नहीं तोड़ सकतीं। बाढ़ का पानी भले ही गांवों और खेतों को डुबो चुका हो, लेकिन इन बच्चों के भीतर कला की जो जोत जगी है, वह आने वाले कल के एक बेहतर और उज्ज्वल भविष्य की गवाही दे रही है। जब ये बच्चे बड़े होकर अपनी इन कलाकृतियों को देखेंगे, तो शायद उन्हें याद रहेगा कि कैसे सबसे बड़े संकट के बीच भी उन्होंने उम्मीद के रंग ढूंढ निकाले थे।