दिल्ली से लेकर पटना तक गरमाई सियासत
भारतीय राजनीति के गलियारों में इस समय एक ऐसी हलचल मची है जिसने प्रशासनिक हलकों से लेकर आम जनता तक का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के कामकाज के तरीकों और फैसलों को लेकर कांग्रेस पार्टी ने अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। आज देश की राजधानी दिल्ली से लेकर पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता और बिहार की राजनीतिक भूमि पटना तक, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर जबरदस्त शक्ति प्रदर्शन किया है।
पार्टी का आरोप है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की गरिमा और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कांग्रेस नेताओं का साफ कहना है कि आयोग के भीतर तानाशाही रवैया अपनाया जा रहा है, जहां बाकी दो चुनाव आयुक्तों की आवाज़ को नजरअंदाज किया जा रहा है। इस विरोध प्रदर्शन ने देश की राजनीतिक सरगर्मी को अचानक से कई गुना बढ़ा दिया है।
गुवाहाटी से लखनऊ तक गूंजे नारे
इस राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का दायरा केवल महानगरों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उत्तर से लेकर पूर्वोत्तर तक इसका असर देखने को मिला। असम के गुवाहाटी और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने जोरदार प्रदर्शन किया। हाथों में पार्टी के झंडे और तख्तियां लेकर कार्यकर्ताओं ने चुनाव आयोग के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
मुख्य चुनाव आयुक्त पर क्यों भड़की है कांग्रेस?
कांग्रेस पार्टी का मुख्य आरोप यह है कि देश के सबसे बड़े और निष्पक्ष माने जाने वाले चुनाव निकाय के भीतर हाल ही में कुछ ऐसा घटित हुआ है जो लोकतंत्र की सेहत के लिए ठीक नहीं है। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का दावा है कि:
- मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अपनी शक्तियों का कथित तौर पर मनमाना इस्तेमाल कर रहे हैं।
- आयोग के अन्य दो आयुक्तों के सुझावों और असहमति को दरकिनार किया जा रहा है।
- चुनावी प्रक्रियाओं और फैसलों में पारदर्शिता की भारी कमी देखी जा रही है।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने के प्रयास किए जा रहे हैं, जिसे कांग्रेस किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगी।
लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता पर बहस
सितंबर 2026 के इस राजनीतिक घटनाक्रम ने एक बार फिर से देश में स्वतंत्र संस्थाओं की कार्यप्रणाली और उनकी स्वायत्तता पर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब चुनाव आयोग जैसी निष्पक्ष संस्थाओं पर किसी एक व्यक्ति के हावी होने के आरोप लगते हैं, तो यह सीधे तौर पर देश की चुनावी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर असर डालता है।
कांग्रेस कार्यकर्ताओं का कहना है कि वे चुप बैठने वाले नहीं हैं। यदि आयोग अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं करता है और सभी सदस्यों को बराबर का अधिकार नहीं देता है, तो यह आंदोलन आने वाले दिनों में और अधिक उग्र रूप ले सकता है।
सड़कों पर उतरी पुलिस और कार्यकर्ता
राजधानी दिल्ली और अन्य प्रमुख शहरों में प्रदर्शन के दौरान पुलिस और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच तीखी झड़पें भी देखने को मिलीं। कई स्थानों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए बैरिकेड्स लगाए, जिन्हें तोड़ने की कोशिश में कार्यकर्ताओं और सुरक्षा बलों के बीच जमकर धक्का-मुक्की हुई। स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए भारी पुलिस बल तैनात किया गया था और कई वरिष्ठ नेताओं को हिरासत में भी लिया गया है।
आगे की क्या है रणनीति?
सूत्रों के हवाले से यह जानकारी सामने आ रही है कि कांग्रेस पार्टी इस मुद्दे को केवल सड़क तक सीमित नहीं रखना चाहती। पार्टी कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों से सलाह लेकर आगे की रणनीति तैयार कर रही है। संसद के आगामी सत्र से लेकर राष्ट्रपति भवन तक अपनी बात पहुंचाने के लिए ज्ञापन सौंपने की तैयारी की जा रही है।
देश के राजनीतिक पटल पर यह विवाद आने वाले समय में क्या नया मोड़ लेता है, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल इस देशव्यापी आंदोलन ने सत्ता पक्ष और मुख्य विपक्षी दल के बीच तनाव को और गहरा कर दिया है। आम जनता की नजरें भी अब चुनाव आयोग के अगले कदम और प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं कि क्या आयोग इन गंभीर आरोपों पर कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी करता है या नहीं।