आधुनिक दौर में जब दुनिया पूंजीवाद और साम्यवाद की दो ध्रुवीय बहसों में उलझी है, तब भारतीय मनीषा और संस्कृति के सार को समेटे 'एकात्म मानवदर्शन' वैश्विक समस्याओं का सबसे प्रभावी समाधान बनकर उभरता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने यह विचार शुक्रवार को जयपुर के धानक्या में पंडित दीनदयाल उपाध्याय की 110वीं जयंती के अवसर पर आयोजित एक भव्य समारोह को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि दीनदयाल जी का यह जीवन दर्शन केवल भारत या किसी राजनीतिक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समस्त मानवता के लिए एक अचूक मार्गदर्शक और मॉडल है।
धानक्या की पावन भूमि पर वैचारिक मंथन
पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मृति समारोह समिति की ओर से आयोजित इस प्रेरणादायी कार्यक्रम में शिरकत करते हुए होसबाले ने कहा कि धानक्या की पवित्र भूमि पर आना और उस स्मारक के दर्शन करना सौभाग्य की बात है, जहां इस महान युगपुरुष ने अपना शुरुआती जीवन बिताया। उन्होंने कहा कि यह स्मारक आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्र और समाज के लिए निष्ठापूर्वक काम करने की निरंतर ऊर्जा देता रहेगा।
दीनदयाल जी के बहुआयामी व्यक्तित्व का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा कि वे एक साधारण स्वयंसेवक से लेकर प्रचारक, राजनेता, दूरदर्शी अर्थशास्त्री, साहित्यकार और उत्कृष्ट लेखक के रूप में विलक्षण प्रतिभा के धनी थे। उनके जीवन के छोटे-छोटे प्रसंग, जैसे यात्रा के दौरान रेडियो का लाइसेंस समाप्त होने पर उसका उपयोग बंद कर देना, उनके उच्च नागरिक कर्तव्यों और नैतिक मूल्यों की स्पष्ट मिसाल पेश करते हैं।
पूंजीवाद और साम्यवाद से परे भारतीय चिंतन
वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं पर गहरी चोट करते हुए दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि दुनिया को केवल दो विकल्पों—पूंजीवाद और साम्यवाद—में विभाजित नहीं किया जा सकता।
- पूंजीवाद का संकट: इसमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अत्यधिक जोर देने के कारण समाज में आर्थिक असमानता और शोषण की प्रवृत्तियां तेजी से बढ़ी हैं।
- साम्यवाद का संकट: इसमें समानता लाने के नाम पर मनुष्य की मूल स्वतंत्रता और मौलिक अधिकारों को ही समाप्त कर दिया गया।
- भारतीय दृष्टिकोण: इन दोनों प्रणालियों में मानव के आपसी संबंधों और बंधुता की पूरी तरह उपेक्षा हुई। इसके विपरीत, भारतीय चिंतन व्यक्ति, समाज, संपूर्ण सृष्टि और परमेश्वर के बीच के गहरे संबंधों को आधार मानकर समाज जीवन की मु मुकम्मल व्यवस्था रचता है।
उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण द्वारा उपनिषदों के सार को गीता के रूप में मानवता के सामने रखने का उदाहरण देते हुए कहा कि ठीक उसी प्रकार दीनदयाल उपाध्याय ने भारतीय संस्कृति और जीवन दर्शन के तमाम विषयों को सार रूप में पिरोकर आधुनिक युग के लिए 'एकात्म मानवदर्शन' की ठोस आधारभूमि तैयार की।
'भारत को भारत बनाना होगा'
होसबाले ने जोर देकर कहा कि हमें अंधानुकरण से बचना चाहिए। भारत को अमेरिका, इंग्लैंड या जापान बनाने की जरूरत नहीं है, बल्कि भारत को उसकी अपनी मूल प्रकृति के अनुसार 'भारत' ही बनाना चाहिए। हमारी अपनी संस्कृति, पारंपरिक जीवन मूल्यों और विशिष्ट राष्ट्रीय व्यक्तित्व पर आधारित यह जीवन दर्शन पूरी दुनिया के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बन सकता है।
उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि इस महान वैचारिक ढांचे को केवल किताबों, शोध पत्रों और पुस्तकालयों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए। इसे आम जनजीवन के व्यवहार में उतारना होगा। जब समाज में इन विचारों के सकारात्मक परिणाम दिखेंगे, तभी पूरी दुनिया इसकी प्रामाणिकता और सफलता पर पूरी तरह भरोसा करेगी।
गाँव, तकनीक और स्वदेशी पर नए दृष्टिकोण
वर्तमान समय की ज्वलनशील समस्याओं पर बात करते हुए उन्होंने ग्रामीण विकास का खाका खींचा। उन्होंने कहा कि यदि गांवों में ही पढ़ाई, कमाई और दवाई की माकूल व्यवस्था हो जाए, तो महानगरों की ओर होने वाला युवाओं का पलायन स्वतः रुक जाएगा। इसके लिए कृषि, कुटीर उद्योगों, हस्तशिल्प और स्थानीय रोजगार को बढ़ावा देने के प्रायोगिक तरीकों की सख्त जरूरत है। उन्होंने नानाजी देशमुख द्वारा चित्रकूट और गोंडा में किए गए ग्राम विकास के सफल प्रयोगों का विशेष उल्लेख किया।
तकनीक और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के इस दौर पर टिप्पणी करते हुए होसबाले ने स्पष्ट किया कि दीनदयाल उपाध्याय तकनीक के कभी विरोधी नहीं थे। उनका साफ मानना था कि तंत्रज्ञान यानी टेक्नोलॉजी ऐसी होनी चाहिए जो मनुष्य के जीवन को सुख दे, पर्यावरण के अनुकूल हो, किसी को आर्थिक रूप से कमजोर न बनाए, रोजगार न छीने और मानवीय मूल्यों का ह्रास न करे। तकनीक इंसानों को गुलाम बनाने वाली नहीं, बल्कि उनके कल्याण का साधन होनी चाहिए।
शोधार्थियों और लोक कलाकारों का सम्मान
समारोह के दौरान पंडित दीनदयाल उपाध्याय के जीवन, दर्शन और कृतित्व पर गहन अकादमिक शोध करने वाले देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधार्थियों को सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में रांची विश्वविद्यालय के डॉ. सोहन सिंह, हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय के डॉ. जगदीश सिंह चंदेल, मथुरा के डॉ. अंशुमान कौशिक और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के डॉ. नागेश चौबे प्रमुख रूप से शामिल रहे।
इसके अलावा, देश की लोक कला और संगीत परंपरा को समृद्ध करने वाले प्रतिष्ठित कलाकारों को भी मंच पर नवाजा गया। इनमें आलोकवादक पद्मश्री तगाराम भील और प्रसिद्ध भपंग वादक पद्मश्री गफरुद्दीन मेवाती को उनके विशिष्ट सांस्कृतिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता जाने-माने उद्यमी मनीष गुप्ता ने की, जबकि विशिष्ट अतिथि के रूप में जेईसीआरसी विश्वविद्यालय के अध्यक्ष ओपी अग्रवाल उपस्थित रहे। समारोह समिति के अध्यक्ष प्रोफेसर मोहनलाल छीपा ने संस्था के अब तक के सफर और भावी उद्देश्यों पर विस्तृत प्रकाश डाला, वहीं सचिव प्रताप भानु शेखावत ने आगामी योजनाओं की रूपरेखा रखी। कार्यक्रम का कुशल संचालन गजेंद्र ज्ञानपुरिया ने किया और अंत में आभार प्रदर्शन समिति के उपाध्यक्ष नीरज कुमावत ने किया।
अपने संबोधन के अंत में दत्तात्रेय होसबाले ने आह्वान किया कि दीनदयाल जी का स्मरण केवल उनकी जयंती पर औपचारिक श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके विचारों का लगातार मंथन करते हुए उनके जीवन की प्रेरणाओं को अपने आचरण में ढालना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।