राजधानी दिल्ली की सड़कों पर सफर करना अपने आप में एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। बात जब जाम से जूझने की आती है, तो शहर के कई फ्लाईओवर और चौराहे इस फेहरिस्त में सबसे ऊपर नजर आते हैं। इन दिनों दिल्ली का बहुप्रतीक्षित और नया बारापूला फ्लाईओवर एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। जिस उम्मीद के साथ इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट को शुरू किया गया था, ज़मीनी स्तर पर तस्वीर कुछ और ही दास्तान बयां कर रही है।
ड्राइवर्स और commuters (यात्रियों) का कहना है कि इस फ्लाईओवर पर चढ़ते और उतरते वक्त गाड़ियां अचानक रेंगने लगती हैं। पीक आवर्स (Peak Hours) के दौरान यहां गाड़ियों की लंबी कतारें लग जाती हैं। आखिर करोड़ों की लागत से तैयार होने वाले इस आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में ऐसी कौन सी खामियां रह गईं, जो आज दिल्ली के वाहन चालकों के लिए सिरदर्द बन चुका है?
अधिकारियों का चौंकाने वाला खुलासा
इस पूरे मामले पर जब हमने संबंधित विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत की, तो एक बेहद दिलचस्प और चौंकाने वाला तकनीकी पहलू सामने आया। अधिकारियों ने स्वीकार किया कि इस प्रोजेक्ट की रूपरेखा (conceived) बहुत पहले तैयार की गई थी। उस वक्त पूर्वी दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद और दक्षिण दिल्ली के बीच वाहनों की आवाजाही का गणित बिल्कुल अलग था।
विशेषज्ञों के मुताबिक, आज से कुछ साल पहले जब इस डिजाइन को हरी झंडी दिखाई गई थी, तब कमर्शियल गाड़ियां, निजी वाहन और टू-व्हीलर्स का ट्रैफिक वॉल्यूम आज की तुलना में काफी कम हुआ करता था। लेकिन वक्त के साथ दिल्ली की डेमोग्राफी और ट्रैफिक पैटर्न में क्रांतिकारी बदलाव आ गए। दुर्भाग्य से, प्लानिंग उस तेजी से नहीं बदल पाई जितनी तेजी से सड़कों पर गाड़ियों की संख्या बढ़ी।
शार्प मर्जर और आउटडेटेड प्लान: मुख्य वजहें
ट्रैफिक विशेषज्ञों और अर्बन प्लानर्स का मानना है कि बारापूला प्रोजेक्ट की असफलता के पीछे दो सबसे बड़े कारण छिपे हैं:
- शार्प मर्जर (Sharp Merger): फ्लाईओवर के कई हिस्सों पर रैंप और मुख्य कैरिजवे का मिलन (merger) बहुत ही तीखा और अचानक है। यानी रफ्तार से आ रही गाड़ियों को बिना किसी पर्याप्त बफर लेन या मर्जिंग डिस्टेंस के मुख्य ट्रैफिक में घुसना पड़ता है।
- आउटडेटेड ट्रैफिक प्लानिंग (Outdated Plan): मौजूदा ट्रैफिक लोड को ध्यान में रखे बिना पुरानी ड्राइंग और डिजाइन पर ही प्रोजेक्ट को पूरा कर दिया गया। यही वजह है कि बॉटलनेक (Bottleneck) सिचुएशन हर दिन पैदा हो रही है।
जब दो अलग-अलग दिशाओं से आने वाला ट्रैफिक एक बेहद संकरी जगह पर बिना किसी सहज दूरी के मिलता है, तो वहां ब्रेक लगाने ही पड़ते हैं। और यहीं से शुरू होती है जाम की अंतहीन श्रृंखला।
ईस्ट दिल्ली से साउथ दिल्ली का सफर हुआ प्रभावित
बारापूला कॉरिडोर को मूल रूप से इसलिए तैयार किया गया था ताकि मयूर विहार और पूर्वी दिल्ली के लोग बिना किसी ट्रैफिक सिग्नल के सीधे दक्षिण दिल्ली, एम्स और आईएनए जैसे अहम इलाकों तक पहुंच सकें। शुरुआती दौर में कुछ हद तक राहत भी मिली, लेकिन जैसे ही इस रूट पर गाड़ियों की संख्या बढ़ी, इसका बुनियादी ढांचा चरमराने लगा।
विशेषकर सुबह और शाम के व्यस्त समय में जब ऑफिस जाने वाले लोगों की भीड़ होती है, तब स्थिति बद से बदतर हो जाती है। कई बार वाहन चालकों को केवल कुछ किलोमीटर की दूरी तय करने में आधे से पौन घंटा तक गंवाना पड़ रहा है।
क्या इस समस्या का कोई समाधान संभव है?
इस सवाल पर अब अर्बन डिजाइनर्स और ट्रैफिक पुलिस मंथन कर रही है। अधिकारियों का कहना है कि भविष्य की दिक्कतों को दूर करने के लिए कुछ सुधारात्मक कदम (Corrective Measures) उठाए जा सकते हैं:
- मर्जिंग पॉइंट्स पर अतिरिक्त साइनेज और ब्लिंकर लाइट्स लगाना।
- रोड मार्किंग को बदलकर लेन ड्राइविंग को सख्ती से लागू करना।
- कुछ खास रैंप्स पर पीक आवर्स के दौरान ट्रैफिक वॉल्यूम को नियंत्रित करने के लिए बैरिकेडिंग या डायवर्जन का प्रयोग करना।
- लंबी अवधि के समाधान के रूप में कुछ स्थानों पर इंजीनियरिंग में बदलाव (Retrofitting) करने पर विचार करना।
निष्कर्ष
दिल्ली जैसे महानगर में किसी भी फ्लाईओवर या एक्सप्रेसवे का उद्देश्य जनता का समय बचाना और सफर को सुगम बनाना होता है। लेकिन अगर योजना बनाते वक्त भविष्य के ट्रैफिक ट्रेंड्स का सही आकलन न किया जाए, तो करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी जनता को राहत नहीं मिलती। बारापूला फ्लाईओवर की यह वर्तमान स्थिति आने वाले अन्य इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए एक बड़ा सबक है कि समय के साथ सोच और प्लानिंग दोनों का अपडेट होना बेहद जरूरी है।