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51 साल पुराना नियम बदलकर 'सुपर CM' बने देवेंद्र फडणवीस? जानिए क्या है सच

51 साल पुराना नियम बदलकर 'सुपर CM' बने देवेंद्र फडणवीस? जानिए क्या है सच

महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों 'रूल्स ऑफ बिजनेस' (Rules of Business) में हुए बदलावों को लेकर घमासान मचा हुआ है। विपक्षी दलों से लेकर राजनीतिक गलियारों तक यह चर्चा जोरों पर है कि क्या राज्य के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को असीमित शक्तियां यानी 'वीटो पावर' दे दी गई है, जिससे वे एक तरह से 'सुपर सीएम' बन गए हैं। इन तमाम चर्चाओं और अटकलों के बीच अब खुद राज्य सरकार ने आधिकारिक तौर पर स्थिति स्पष्ट कर दी है और इन दाווों की हवा निकाल दी है।

क्या सचमुच मुख्यमंत्री को मिली है कोई नई 'वीटो पावर'?

सरकारी सूत्रों ने साफ किया है कि मुख्यमंत्री के पास मंत्रियों के फैसलों को रद्द करने या वापस लेने का जो अधिकार चर्चा का विषय बना हुआ है, वह कोई नया प्रावधान नहीं है। यह अधिकार साल 1975 से लागू 'रूल्स ऑफ बिजनेस' के तहत पहले से ही मुख्यमंत्री के पास मौजूद था। नए नियमों में ऐसा दूर-दूर तक नहीं कहा गया है कि मुख्यमंत्री को यह शक्ति पहली बार सौंपी गई है।

संविधान के जानकारों और प्रशासनिक नियमों के अनुसार, मंत्रियों को मिलने वाली सभी कार्यकारी शक्तियां मूल रूप से मुख्यमंत्री की ही होती हैं। मुख्यमंत्री ही विभिन्न विभागों का आवंटन करते समय इन शक्तियों को अपने मंत्रियों को सौंपते हैं। यही वजह है कि सामान्य प्रशासनिक और नीतिगत मामलों में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार हमेशा से मुख्यमंत्री के पास ही निहित रहता है।

प्रशासनिक फैसले बनाम अर्ध-न्यायिक मामले

सरकार की ओर से जारी स्पष्टीकरण में यह भी बताया गया है कि सामान्य प्रशासनिक मामलों और अर्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) मामलों में जमीन-आसमान का फर्क होता है।

  • प्रशासनिक मामले: इन मामलों में विभागों के मंत्री काम करते हैं, लेकिन यदि कोई नीतिगत या बड़ा विवाद हो, तो मुख्यमंत्री का निर्णय अंतिम होता है।
  • अर्ध-न्यायिक मामले: इन मामलों में स्थिति बिल्कुल अलग होती है। ऐसे प्रकरणों में मंत्री अपने वैधानिक अधिकारों का स्वतंत्र रूप से उपयोग करते हैं और उनका फैसला अंतिम माना जाता है।
  • इन अर्ध-न्यायिक फैसलों के खिलाफ सामान्य तौर पर प्रशासनिक स्तर पर अपील का प्रावधान नहीं होता और असंतुष्ट पक्ष सीधा बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाता है।

कब और कैसे शुरू हुई थी नियम बदलने की पूरी प्रक्रिया?

राजनीतिक गलियारों में भले ही इसे हालिया राजनीतिक समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा हो, लेकिन सच यह है कि इन नियमों को बदलने की प्रक्रिया आज या कल की नहीं, बल्कि करीब पांच साल पुरानी है। इसकी शुरुआत महाविकास अघाड़ी (MVA) सरकार के कार्यकाल के दौरान हुई थी।

अक्टूबर 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सरकार के 'रूल्स ऑफ बिजनेस' में व्यापक संशोधन के लिए एक उच्च स्तरीय अध्ययन समूह का गठन किया था। इस समूह में राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव सीताराम कुंटे, मनुकुमार श्रीवास्तव, सुजाता सौनिक, देबाशीष चक्रवर्ती और श्रीकांत देशपांडे जैसे वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी शामिल थे।

इसके बाद जुलाई 2021 में उद्धव ठाकरे सरकार ने इसी काम के लिए एक और संशोधित अध्ययन समूह बनाया। इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट फरवरी 2022 में सरकार को सौंप दी थी, जिस वक्त राज्य की कमान उद्धव ठाकरे के हाथ में ही थी। समय के पहिये ने करवट ली और सत्ता बदली, लेकिन प्रशासनिक सुधार की यह प्रक्रिया चलती रही।

फरवरी 2024 में जब एकनाथ शिंदे राज्य के मुख्यमंत्री थे, तब इस अध्ययन समूह की रिपोर्ट को मंत्रिमंडल की बैठक में प्रस्तुत किया गया। इसके बाद जनवरी 2025 में मौजूदा मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और उपमुख्यमंत्री अजित पवार के सामने इसका फाइनल प्रेजेंटेशन रखा गया, जिसके बाद कैबिनेट ने इसे अपनी हरी झंडी दे दी।

1975 के बाद पहली बार हुआ नियमों का व्यापक पुनरीक्षण

महाराष्ट्र में प्रशासनिक कामकाज चलाने के लिए 'रूल्स ऑफ बिजनेस' पहली बार 1975 में लागू किए गए थे। इन पांच दशकों में समय-समय पर छोटे-मोटे संशोधन तो किए गए, लेकिन कभी भी इनका समग्र और व्यापक स्तर पर पुनरीक्षण (Comprehensive Revision) नहीं किया गया था। आखिरी बार इसमें बड़ा संशोधन 1990 में हुआ था।

इन नए बदलावों को करते समय केंद्र सरकार और देश के अन्य बड़े राज्यों में लागू प्रशासनिक नियमों का बारीकी से अध्ययन किया गया है। बदलावों के तहत अब नियमों की संख्या को 15 से बढ़ाकर सीधा 48 कर दिया गया है। वहीं, पहले जो केवल 2 शेड्यूल हुआ करते थे, उन्हें बढ़ाकर अब 4 कर दिया गया है।

सरकार का दावा है कि इस पूरी कवायद का मकसद किसी को अतिरिक्त या निरंकुश ताकत देना नहीं है, बल्कि प्रशासनिक प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, स्पष्ट और व्यवस्थित बनाना है, ताकि फाइलों के मूवमेंट और फैसلي लेने में किसी तरह की अस्पष्टता न रहे।

निष्कर्ष: क्या निकला इस विवाद का सार?

महाराष्ट्र सरकार द्वारा दी गई आधिकारिक सफाई के बाद यह पूरी तरह से स्पष्ट हो चुका है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को कोई नई 'वीटो पावर' नहीं मिली है। यह केवल दशकों पुरानी प्रशासनिक व्यवस्था को आधुनिक समय और कामकाज की सुगमता के हिसाब से री-स्ट्रक्चर करने का मामला है। विपक्ष के आरोप भले ही राजनीतिक रूप से तूल पकड़ रहे हों, लेकिन कागजी और कानूनी सच्चाई यही है कि मुख्यमंत्री की यह शक्ति हमेशा से संविधान और प्रशासनिक नियमों का अभिन्न हिस्सा रही है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

प्रશ્न 1: क्या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को मंत्रियों के फैसले पलटने का नया अधिकार मिला है?

उत्तर: बिल्कुल नहीं। मंत्रियों के प्रशासनिक फैसलों पर अंतिम निर्णय लेने का यह अधिकार मुख्यमंत्री के पास 1975 से लागू 'रूल्स ऑफ बिजनेस' के तहत पहले से ही मौजूद था।

प्रશ્न 2: 'रूल्स ऑफ बिजनेस' में बदलाव की शुरुआत किसने की थी?

उत्तर: इन नियमों में बदलाव की प्रक्रिया की शुरुआत अक्टूबर 2020 में तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के कार्यकाल के दौरान एक अध्ययन समूह बनाकर की गई थी।

प्रશ્न 3: क्या मंत्री अपने अर्ध-न्यायिक मामलों में स्वतंत्र हैं?

उत्तर: हां, मंत्रियों द्वारा अर्ध-न्यायिक मामलों में लिए गए फैसले स्वतंत्र होते हैं और उन पर मंत्री का फैसला ही अंतिम माना जाता है। ऐसे मामलों में मुख्यमंत्री दखल नहीं देते।

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तनु उपाध्याय

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Senior Sub Editor

तनु उपाध्याय एंटरटेनमेंट जगत की हलचल को करीब से समझती हैं और उसे दर्शकों के सामने आकर्षक अंदाज में पेश करती हैं। फिल्मों, टीवी, ओटीटी और वायरल ट्रे...

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