दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी चुनावों की सुगबुगाहट
राजधानी दिल्ली की सिख सियासत में इन दिनों तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है। अक्टूबर 2026 के इस दौर में जैसे-जैसे दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) के आगामी चुनावों की तारीखें नजदीक आ रही हैं, राजनीतिक गलियारों में हलचल अपने चरम पर है। पंथक राजनीति के जानकारों का मानना है कि इस बार का चुनावी मुकाबला बेहद दिलचस्प और अप्रत्याशित मोड़ों से भरा होने वाला है। पर्दे के पीछे चल रही बैठकों और राजनीतिक समीकरणों ने कई दिग्गजों की नींद उड़ा दी है, जिसमें परमजीत सिंह सरना और हरमीत सिंह कलका जैसे बड़े चेहरे शामिल हैं।
सरना बंधुओं की बढ़ी बेचैनी की असली वजह
हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों पर अगर बारीकी से नजर डाली जाए, तो यह स्पष्ट होता है कि सरना गुट के भीतर बेचैनी अचानक क्यों बढ़ गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह सिख सियासत के पारंपरिक दायरे से बाहर जाकर बन रहे नए समीकरण हैं। चर्चा है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के कुछ प्रमुख सिख नेता शिरोमणि अकाली दल (शिअद) के एक धड़े के साथ अपनी नजदीकियों को लगातार मजबूत कर रहे हैं। इस सियासी गठजोड़ और भीतरखाने चल रही सुगबुगाहट ने सरना बंधुओं के उस गणित को बिगाड़ दिया है, जिसके सहारे वे पिछले कई महीनों से अपनी चुनावी जमीन तैयार करने में जुटे थे।
पंथक वोटों के बिखराव का डर
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि जब भी सत्ता के गलियारों में नए समीकरण बनते हैं, तो सबसे बड़ा असर वोटों के ध्रुवीकरण पर पड़ता है।
- पारंपरिक वोट बैंक में सेंधमारी का खतरा बढ़ गया है।
- युवा मतदाताओं का रुझान अब पारंपरिक नारों से हटकर विकास और प्रशासनिक सुधारों की ओर हो रहा है।
- विपक्ष के पास एकजुट रणनीति का अभाव सरना गुट के लिए चिंता का सबसे बड़ा विषय बन गया है।
यही वजह है कि सरना गुट के रणनीतिकार अब अपनी पुरानी कार्यशैली को बदलकर नए सिरे से रणनीति बनाने पर मजबूर हो गए हैं।
भाजपा नेताओं की सक्रियता और नए समीकरण
दिल्ली के गुरुद्वारा प्रबंधन में लंबे समय से विभिन्न राजनीतिक दलों की अप्रत्यक्ष दखلअंदाजी जगजाहिर रही है। लेकिन इस बार का परिदृश्य थोड़ा अलग है। राष्ट्रीय राजधानी में सक्रिय भाजपा के कई दिग्गज सिख चेहरे अब खुलकर पंथक मुद्दों और गुरुद्वारा प्रशासन की कार्यप्रणाली में रुचि ले रहे हैं। शिअद के बागी या स्थानीय नेताओं के साथ उनकी बढ़ती मुलाकातों ने गलियारों में इन चर्चाओं को हवा दे दी है कि आने वाले दिनों में कोई बड़ा राजनीतिक धमाका हो सकता है। यदि यह धुरी मजबूत होती है, तो इसका सीधा नुकसान उन क्षेत्रीय क्षत्रपों को उठाना पड़ सकता है जो खुद को एकमात्र पंथक ठेकेदार के रूप में पेश करते आए हैं।
मैदान में उतरने से पहले दिग्गजों का शक्ति परीक्षण
चुनाव आयोग की तैयारियों के साथ ही संभावित उम्मीदवारों ने अपने अपने इलाकों में जनसंपर्क अभियान तेज कर दिए हैं। संगत के बीच जाकर अपनी उपलब्धियों को गिनाने और विरोधियों की कमियों को उजागर करने का दौर शुरू हो चुका है। हालांकि, इस बार का चुनाव सिर्फ धार्मिक संस्था पर कब्जे की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह दिल्ली में सिख नेतृत्व के भविष्य को तय करने वाला एक बड़ा मोड़ साबित होने जा रहा है।
संगत की उम्मीदें और जमीनी हकीकत
चुनावी शोर के बीच आम सिख संगत की अपनी अलग प्राथमिकताएं हैं। गुरुद्वारों के वित्तीय प्रबंधन में पारदर्शिता, शिक्षा संस्थानों की बेहतरी और स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार ऐसे मुद्दे हैं जिन पर हर वोटर की नजर है। राजनीतिक दल चाहे जितने भी समीकरण बना लें, लेकिन अंततः फैसला संगत के हाथों में ही होना है। सरना गुट की बेचैनी अपनी जगह सही हो सकती है, लेकिन असली परीक्षा तो उस दिन होगी जब मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।
आने वाले कुछ हफ्तों में यह और अधिक स्पष्ट हो जाएगा कि कौन सा दल किसके साथ गठबंधन करता है और कौन मैदान में अकेले उतरने का जोखिम उठाता है। फिलहाल, दिल्ली की सिख सियासत में हर दिन बदलते समीकरणों पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं।