त्योहारों का मौसम शुरू होते ही गलियों और बाजारों में एक अलग ही रौनक देखने को मिलती है। जहाँ कुछ सालों पहले तक हर गली के नुक्कड़ पर हाई-व्हाॅल्यूम डीजे की धमक सुनाई देती थी, वहीं अब इस तस्वीर में एक सुखद बदलाव आता दिखाई दे रहा है। बदलते दौर और बढ़ती जागरूकता के बीच इस साल पूजा पंडालों में डीजे की जगह पारंपरिक 'ढाक' (एक खास तरह का पारंपरिक वाद्य यंत्र) की मांग में अभूतपूर्व उछाल दर्ज किया गया है।
यह बदलाव न केवल कानों को सुकून देने वाला है, बल्कि उन पारंपरिक कलाकारों के लिए भी किसी वरदान से कम नहीं है जो आधुनिकता की दौड़ में अपनी आजीविका खोने की कगार पर पहुंच गए थे। आइए जानते हैं कि कैसे इस छोटे से बदलाव ने कला जगत में एक नई जान फूंक दी है और क्यों लोग अब डीजे से दूरी बना रहे हैं।
डीजे के शोर से तौबा, संस्कृति की ओर वापसी
पिछले कुछ वर्षों में त्योहारों के दौरान अत्यधिक तेज आवाज वाले डीजे का चलन काफी बढ़ गया था। इससे न केवल बुजुर्गों, बच्चों और मरीजों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता था, बल्कि पर्यावरण और ध्वनि प्रदूषण भी अपने चरम पर पहुंच जाता था। सुप्रीम कोर्ट और स्थानीय प्रशासन की सख्ती के साथ-साथ अब आम जनता की सोच में भी बड़ा बदलाव आया है।
लोग अब यह समझने लगे हैं कि पूजा-पाठ और धार्मिक अनुष्ठानों का असली आनंद संयम, अनुशासन और पारंपरिक संस्कृति में है, न कि कानों के पर्दे फाड़ने वाले डीजे के शोर में। आयोजकों का मानना है कि डीजे से भक्ति का भाव कहीं खो जाता है, जबकि पारंपरिक वाद्यों की थाप सीधे दिल को छूती है।
पारंपरिक ढाकियों के चेहरों पर लौटी मुस्कान
इस बदलाव का सबसे सकारात्मक असर पारंपरिक 'ढाकियों' (ढाक बजाने वाले कलाकारों) पर पड़ा है। पिछले कई सालों से आर्थिक तंगी से जूझ रहे इन कलाकारों के पास इस सीजन में बुकिंग की भरमार है। पश्चिम बंगाल और आसपास के ग्रामीण इलाकों से आने वाले ये कलाकार अपनी आजीविका के लिए पूरी तरह से इसी सीजन पर निर्भर रहते हैं।
"पिछले दो-तीन सालों में हालात बहुत खराब हो गए थे। डीजे के आने से हमें कोई पूछता ही नहीं था। लेकिन इस बार जिस तरह से लोगों ने फोन करके एडवांस बुकिंग कराई है, उससे हमारे परिवार की दीवाली और पूजा बहुत अच्छी कटने वाली है। ढाक की थाप हमारी पहचान है और इसे दोबारा सम्मान मिलते دیکھ कर दिल खुश हो गया है।" - एक वरिष्ठ ढाक वादक
कलाकारों का कहना है कि न केवल स्थानीय पंडाल, बल्कि अब तो कॉर्पोरेट ऑफिस और हाउसिंग सोसाइटियों के दुर्गा पूजा उत्सवों से भी ढाकियों की विशेष मांग आ रही है। उन्हें उचित मानदेय के साथ-साथ सम्मान भी मिल रहा है।
युवा पीढ़ी भी ले रही है संस्कृति में दिलचस्पी
इस बदलाव का एक और सुखद पहलू यह है कि आज की युवा पीढ़ी भी पारंपरिक संगीत की ओर आकर्षित हो रही है। सोशल मीडिया के इस दौर में जहां हर कोई रील्स और ट्रेंड्स के पीछे भागता है, वहीं ढाक की थाप पर थिरकना युवाओं के लिए एक नया ट्रेंड बन गया है।
- पंडालों में डीजे के मुकाबले ढाक की धुनों पर युवा अधिक ऊर्जावान होकर नाचते नजर आ रहे हैं।
- कई युवा कलाकारों ने पारंपरिक ढाक सीखने में अपनी रुचि दिखाई है, जिससे इस प्राचीन कला के लुप्त होने का खतरा टल गया है।
- संस्कृति को आधुनिक अंदाज में पेश करने का यह तरीका लोगों को खूब भा रहा है।
अर्थव्यवस्था और रोजगार को बढ़ावा
इस सांस्कृतिक बदलाव का सीधा असर ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। ढाक बनाने वाले कारीगरों से लेकर इसे बजाने वाले कलाकारों तक, एक पूरी चेन को इसका आर्थिक लाभ मिल रहा है। जब मांग बढ़ती है, तो कलाकारों को उनकी मेहनत का उचित मेहनताना भी मिलता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह ट्रेंड आने वाले सालों में भी जारी रहा, तो हमारी लोक कलाएं और पारंपरिक वाद्य यंत्र आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रह सकेंगे। यह सिर्फ एक वाद्य यंत्र की वापसी नहीं है, बल्कि हमारी जड़ों से जुड़ने का एक बेहद खूबसूरत माध्यम है।
निष्कर्ष
त्योहार हमें अपनों के करीब लाने और अपनी संस्कृति का जश्न मनाने का अवसर देते हैं। डीजे की चकाचौंध और कर्णछेदक आवाज से दूर, जब मां दुर्गा के पंडालों में पारंपरिक ढाक की गूंज सुनाई देती है, तो पूरा माहौल भक्तिमय हो जाता है। कलाकारों को मिली यह राहत इस बात का प्रमाण है कि अंततः जीत सत्य, संस्कृति और परंपरा की ही होती है। इस बार के उत्सव में यह बदलाव पूरे समाज के लिए एक सकारात्मक संदेश लेकर आया है।