अक्टूबर 2026 का महीना आते ही त्योहारों की रौनक चारों तरफ बिखरने लगी है। हवा में एक अलग ही उमंग है, मेलों की गूंज है और बाजारों में खरीदारों की भीड़ है। हर साल की तरह इस बार भी विजयादशमी के अवसर पर मैदानों में आसमान को छूते रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के विशाल पुतले जलाए जाएंगे। आतिशबाजी होगी और बुराई पर अच्छाई की जीत का यह जश्न धूमधाम से मनाया जाएगा। लेकिन क्या कभी आपने गहराई से सोचा है कि क्या रावण का पुतला जला देना भर ही इस प्राचीन पर्व का एकमात्र उद्देश्य है?
सच्चाई तो यह है कि रावण हमारे बाहर ही नहीं, बल्कि जाने-अनजाने हमारी दिनचर्या, हमारे विचारों और हमारे घरों के भीतर भी कई रूपों में मौजूद रहता है। इस साल दशहरा 2026 के मौके पर परंपराओं के दायरे से थोड़ा आगे बढ़कर कुछ नया सोचने का समय आ गया है। इस विजयादशमी हम केवल कागज और लकड़ियों से बने पुतले को आग के हवाले न करें, बल्कि अपने घर और जीवन की उन तमाम छोटी-छोटी नकारात्मक आदतों का भी खात्मा करें जो हमारी शांति और प्रगति में बाधा बनती हैं। आइए जानते हैं ऐसी 10 बेहद जरूरी और व्यावहारिक बातों के बारे में, जिन्हें इस दशहरे पर हमेशा के लिए अलविदा कहा जा सकता है।
1. जरूरत से ज्यादा सामान और कबाड़ जमा करने की आदत
हमारे घरों की अलमारियों और स्टोर रूम में कई ऐसी चीजें बरसों से बंद पड़ी रहती हैं जिनका कोई इस्तेमाल नहीं होता। पुराने और फटे-पुराने कपड़े, खराब इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स, खाली डिब्बे और बेकार का सामान घर की ऊर्जा को भी बाधित करता है। इस दशहरे पर घर की गहन सफाई के दौरान उन सभी उपयोगी चीजों को अलग करें जो किसी जरूरतमंद के काम आ सकती हैं, और बाकी कबाड़ को जिम्मेदारी के साथ रिसाइकल होने के लिए भेजें। घर जितना खुला और हवादार होगा, मानसिक सुकून उतना ही ज्यादा बढ़ेगा।
2. थाली में खाने की बर्बादी को कहें सख्त अलविदा
त्योहारों के उल्लास में अक्सर घरों में तरह-तरह के पकवान और व्यंजन बनते हैं। कई बार जरूरत से ज्यादा खाना बन जाता है जो अंततः डस्टबिन में जाता है। इस बार संकल्प लें कि परिवार के सदस्यों की संख्या और उनकी जरूरत के हिसाब से ही भोजन तैयार किया जाएगा। अगर कुछ खाना बच भी जाता है, तो उसे फेंकने के बजाय क्रिएटिव तरीके से अगले मील में इस्तेमाल करने की कला अपनाएं। अन्न का अपमान करना सबसे बड़ी बुराई है, और इसे छोड़ना ही असली विजयादशमी है।
3. हर पुरानी चीज को तुरंत फेंकने की जिद छोड़ें
आज के उपभोक्तावादी दौर में जैसे ही कोई चीज थोड़ी पुरानी होती है, हम उसे कचरे में फेंककर नई चीज खरीद लेते हैं। इस मानसिकता को बदलने की सख्त जरूरत है। पुरानी और बेजान दिखने वाली चीजों को थोड़ा सा समय और रचनात्मकता देकर नया जीवन दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, पुरानी साड़ियों से सुंदर कुशन कवर बनाए जा सकते हैं, कांच की खाली बोल्टरों को पेंट करके लैंप का रूप दिया जा सकता है, या पुराने जार में छोटे पौधे लगाए जा सकते हैं। सस्टेनेबिलिटी ही आने वाले कल की सबसे बड़ी सच्चाई है।
4. डिजिटल लत: अपनों के बीच स्क्रीन टाइम का करें ‘दहन’
यह आज के आधुनिक समाज की सबसे बड़ी विडंबना है। परिवार का हर सदस्य एक ही कमरे में बैठा होता है, लेकिन किसी की नजरें अपनों से मिलने के बजाय मोबाइल की नीली स्क्रीन पर टिकी होती हैं। इस दशहरे पर परिवार के सभी सदस्य मिलकर कुछ घंटों के ‘नो फोन टाइम’ का नियम बना सकते हैं। इस दौरान बिना किसी डिजिटल रुकावट के आपस में बातें करें, बुजुर्गों से उनके बचपन और पुराने जमाने की रामलीलाओं के किस्से सुनें। अपनों के साथ बिताया गया यह वक्त किसी भी सोशल मीडिया स्क्रॉलिंग से कहीं ज्यादा कीमती है।
5. बिजली और ऊर्जा की बेपरवाह बर्बादी
कमरा खाली है लेकिन पंखा और लाइटें पूरी रफ्तार से चल रही हैं—यह लापरवाही हमारे घरों में आम बात बन गई है। बिजली का बिल भरना आसान हो सकता है, लेकिन प्राकृतिक संसाधनों की बर्बादी आने वाली पीढ़ियों के लिए संकट पैदा कर रही है। इस विजयादशमी पर बच्चों को भी यह सिखाएं कि ऊर्जा की बचत करना ही पर्यावरण के प्रति सच्ची देशभक्ति और अच्छाई है। एक-एक स्विच ऑफ करने की छोटी सी आदत बड़ा बदलाव ला सकती है।
6. उत्सव के नाम पर प्लास्टिक और कृत्रिम सजावट से तौबा
त्योहार आते ही बाजार प्लास्टिक के चमकीले और सस्ते डेकोरेशन आइटम्स से पट जाते हैं। ये सजावटी सामान कुछ दिनों के इस्तेमाल के बाद कचरे के ढेर में चले जाते हैं और सदियों तक पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं। इस बार घर की सजावट के लिए पूरी तरह नेचुरल तरीकों को अपनाएं। ताजे फूल, मिट्टी के दीये, कपड़े की सुंदर झालरें और जूट से बने उत्पादों का इस्तेमाल कर घर को एक पारंपरिक और बेहद खूबसूरत लुक दिया जा सकता है।
7. मन में पाल रखी पुरानी नाराजगी और नकारात्मकता को हटाएं
बाहर के रावण को जलाना आसान है, लेकिन दिल में बरसों से दबाकर रखी गई कड़वाहट, गुस्सा और पुराने मनमुटाव को मिटाना बेहद कठिन होता है। दशहरा हमें यही सिखाता है कि अहंकार और नकारात्मकता का अंत ही मुक्ति है। इस पर्व पर अपने करीबियों से पुरानी बातों को भुलाकर नए सिरे से रिश्ते जोड़ने की પહેल करें। माफ करना और आगे बढ़ना किसी भी व्यक्ति की सबसे बड़ी ताकत होती है।
8. बच्चों के लिए विशेष ‘मेरा रावण’ एक्टिविटी
त्योहारों को बच्चों के लिए केवल छुट्टियों का दिन न बनाएं, बल्कि उन्हें इसके गहरे संदेश से जोड़ें। बच्चों को एक कागज पर दस सिर वाला रावण बनाने के लिए कहें। इसके बाद हर सिर पर उनकी कोई ऐसी व्यक्तिगत आदत लिखवाएं जिसे वे सुधारना चाहते हैं—जैसे सुबह देर से उठना, पढ़ाई में मन न लगना, हर वक्त वीडियो गेम खेलना या अपना सामान बिखेर कर रखना। इसे सचमुच में जलाने के बजाय वे इस कागज को रिसाइक्लिंग के लिए रख सकते हैं और कुछ हफ्तों बाद खुद आकलन कर सकते हैं कि उन्होंने अपनी कौन-सी आदत पर विजय पा ली है।
9. 'एक लो, एक छोड़ो' का गोल्डन रूल अपनाएं
त्योहार के इस सीजन में नए कपड़े, जूते और घरेलू सामान खरीदना उत्साह का हिस्सा है। लेकिन इस बार परिवार में एक बेहतरीन नियम बनाएं—अगर घर में कोई एक नई उपयोगी चीज प्रवेश करती है, तो अच्छी हालत में मौजूद कोई पुरानी चीज किसी जरूरतमंद को दान कर दी जाएगी। इससे न सिर्फ घर में सामान का अनावश्यक ढेर नहीं लगेगा, बल्कि किसी गरीब के चेहरे पर मुस्कान भी आएगी जो इस पर्व को और सार्थक बना देगा।
10. अगले दशहरे तक का एक पक्का और छोटा संकल्प
बड़ी-बड़ी बातें करना आसान होता है, लेकिन छोटे बदलाव लंबे समय तक टिकते हैं। विजयादशमी के इस पावन दिन कोई ऐसा एक छोटा संकल्प लें जिसे आप पूरे साल बिना चूके निभा सकें। वह संकल्प पानी बचाने का हो सकता है, सिंगल यूज़ प्लास्टिक का पूरी तरह बहिष्कार करने का हो सकता है, हर महीने कम से कम एक किताब पढ़ने का हो सकता है, या फिर अपने माता-पिता और बच्चों के साथ रोजाना आधा घंटा बिना किसी स्क्रीन के बिताने का हो सकता है। संकल्प भले ही छोटा हो, लेकिन उसका प्रभाव आपके पूरे जीवन को बदल सकता है।
असली विजयादशमी की शुरुआत आपके घर से होती है
मैदान में खड़ा रावण का पुतला कुछ ही मिनटों में धू-धू करके जलकर राख हो जाता है, लेकिन हमारे भीतर और हमारी जीवनशैली में बैठी बुराइयां इतनी आसानी से हार नहीं मानतीं। यही वजह है कि दशहरा हर साल कैलेंडर पर एक तारीख बनकर नहीं आता, बल्कि यह हमें आईना दिखाने आता है। यह पर्व याद दिलाता है कि अच्छाई और सच्चाई की असली जीत केवल पौराणिक कथाओं की किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे रोजमर्रा के छोटे-छोटे फैसलों और कर्मों में दिखाई देनी चाहिए।
इस दशहरा 2026 पर जब आप अपने शहर के किसी मेले या रामलीला मैदान में रावण दहन देखने जाएं, तो खुद से यह सवाल जरूर पूछें—इस बार आपके शहर में रावण भले ही कितने भी फीट ऊंचा क्यों न जला हो, लेकिन आपके अपने भीतर और आपके घर की कौन-सी ऐसी पुरानी बुरी आदत है जिसे आप आज ही हमेशा के लिए अलविदा कहने जा रहे हैं?