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चुनाव आयोग के सामने बचे हैं अब सिर्फ ये रास्ते, विवादों से बचने का क्या है फॉर्मूला

चुनाव आयोग के सामने बचे हैं अब सिर्फ ये रास्ते, विवादों से बचने का क्या है फॉर्मूला

भारतीय लोकतंत्र में चुनाव आयोग की निष्पक्षता और इसके काम करने के तरीके पर जब भी सवाल उठते हैं, तो पूरा राजनीतिक गलियारा और देश का प्रबुद्ध वर्ग सांस रोककर इसके जवाब का इंतजार करता है। मौजूदा समय में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और पूरे आयोग के सामने कई ऐसे गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं, जिनसे पार पाना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। हाल ही में आयोग की तरफ से जारी किए गए एक प्रेस नोट में यह स्पष्ट किया गया कि संस्थान के सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए जा रहे हैं। लेकिन क्या सिर्फ 'सर्वसम्मति' का यह बोर्ड लगा देने भर से तमाम असहज करने वाले सवाल गायब हो जाएंगे?

पारदर्शिता और सर्वसम्मति का पेच

जब भी नीतिगत फैसले या चुनावी तारीखों के ऐलान जैसी बड़ी घोषणाएं होती हैं, तो जनता और राजनीतिक दलों के मन में यह उत्सुकता होना स्वाभाविक है कि पर्दे के पीछे चर्चा किस दिशा में आगे बढ़ी। चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था से हमेशा यह उम्मीद की जाती है कि वह केवल पारदर्शी दिखे ही नहीं, बल्कि उसकी पारदर्शिता हर स्तर पर महसूस भी हो।

विशेषज्ञों का मानना है कि आज के दौर में जब हर फैसले पर बारीक नजर रखी जाती है, तब केवल यह कह देना कि 'सबकी सहमति थी', आलोचकों का मुंह बंद करने के लिए काफी नहीं है। असहमति के स्वरों का सम्मान करना और लोकतंत्र में विमर्श के दायरे को खुला रखना ही किसी भी संस्था की असल ताकत होती है।

सवालों के घेरे में कामकाज की शैली

आयोग के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती जनता के उस भरोसे को बनाए रखने की है, जो निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनावों की रीढ़ है। जब विभिन्न राजनीतिक दल चुनाव आयोग के फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराते हैं, तो उन आपत्तियों को किस तरह से खारिज किया गया या उन पर क्या विचार हुआ, इसे सार्वजनिक करना बेहद जरूरी हो जाता है।

  • फैसलों के पीछे के तर्कों को स्पष्ट रूप से साझा करना।
  • राजनीतिक दलों की शिकायतों पर त्वरित और निष्पक्ष प्रतिक्रिया देना।
  • मतदान की पूरी प्रक्रिया में तकनीक और प्रकियागत सुधारों को प्राथमिकता देना।
  • मीडिया और जनता के सवालों के प्रति अधिक जवाबदेह रवैया अपनाना।

अब आगे क्या रास्ता बचा है?

ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों के सामने अब केवल एक ही और सबसे मजबूत रास्ता बचता है—पूर्ण और अकाट्य पारदर्शिता (Absolute Transparency)। यदि आयोग अपने हर फैसले के पीछे के विमर्श, कारणों और तर्कों को जनता के सामने पूरी स्पष्टता के साथ रखे, तो किसी भी तरह के संदेह की गुंजाइश ही नहीं बचेगी।

लोकतंत्र में संस्थाएं व्यक्तियों से बड़ी होती हैं। चुनाव आयोग का इतिहास गौरवशाली रहा है, और इस साख को बचाए रखने के लिए यह जरूरी है कि वह हर उस सवाल का सामना करे जो आज की तारीख में उसकी कार्यप्रणाली पर उठाए जा रहे हैं। केवल प्रेस नोट में सर्वसम्मति का दावा कर देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उस सर्वसम्मति के आधार को भी जमीन पर उतरते हुए दिखाना होगा।

निष्कर्ष

साल 2026 के इस दौर में, जहां मतदाता और जागरूक नागरिक हर कदम पर पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, चुनाव आयोग के लिए अपनी साख को और अधिक मजबूत करने का यह सही समय है। सवालों से भागने या केवल तकनीकी जवाब देने के बजाय, पूरी तरह से खुलेपन की नीति अपनाना ही एकमात्र ऐसा मार्ग है जो आयोग को हर विवाद से सुरक्षित बाहर निकाल सकता है।

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निवेदिता ठाकुर

निवेदिता ठाकुर

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निवेदिता ठाकुर जमीनी पत्रकारिता के मजबूत स्तंभ हैं। वे स्थानीय स्तर की उन खबरों को सामने लाते हैं, जो अक्सर बड़े प्लेटफॉर्म पर नजर अंदाज हो जाती है...

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