फ्रांस इस समय एक ऐसे बड़े छात्र आंदोलन की चपेट में है, जिसने राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की सरकार की नींद उड़ा दी है। देश भर के हजारों छात्र सड़कों पर उतर आए हैं और हाई स्कूलों को पूरी तरह से ब्लॉक कर दिया गया है। स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि पेरिस के पुलिस प्रमुख ने इसे नियंत्रण से बाहर (out of control) करार दिया है। प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच हुई हिंसक झड़पों ने पूरे देश में हलचल मचा दी है.
हिंसा, गिरफ्तारी और सुरक्षा बलों पर हमले
अधिकारियों से मिली जानकारी के मुताबिक, पिछले हफ्ते जब से यह आंदोलन शुरू हुआ है, तब से दर्जनों लोग घायल हो चुके हैं और लगभग 5,000 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है। हैरान करने वाली बात यह है कि गिरफ्तार किए गए लोगों में अधिकांश नाबालिग छात्र शामिल हैं। फ्रांस की राष्ट्रीय पुलिस की प्रवक्ता अगाथ फूको के अनुसार, इस उग्र प्रदर्शन के दौरान 600 से अधिक पुलिसकर्मी भी घायल हुए हैं। हालात को नियंत्रित करने के लिए दंगा रोधी पुलिस (riot police) को तैनात करना पड़ा है.
शुक्रवार को पुलिस और छात्रों के बीच जमकर संघर्ष हुआ। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए देश की शिक्षक यूनियनों ने भी हड़ताल का आह्वान किया है। प्रशासन कक्षाओं की स्थिति और शिक्षा क्षेत्र में फंडिंग की कमी को लेकर भड़के इस गुस्से को शांत करने में पूरी तरह जूझता नजर आ रहा है। अनुमान लगाया जा रहा है कि इन विरोध प्रदर्शनों के दौरान सरकारी और निजी संपत्ति को दसियों मिलियन यूरो का नुकसान हुआ है.
स्कूलों पर ताले और शिक्षा मंत्री का बयान
फ्रांस के शिक्षा मंत्री एडोर्ड गेफ्रे के अनुसार, भारी विरोध प्रदर्शनों के चलते गुरुवार को देश के करीब 3,700 हाई स्कूलों में से एक-तिहाई स्कूल बंद या पूरी तरह बाधित रहे। वहीं, शुक्रवार को 400 से अधिक स्कूलों को आधिकारिक रूप से बंद रखना पड़ा। इस आंदोलन को और मजबूती देते हुए शिक्षक यूनियनों और कई प्रमुख राजनीतिक हस्तियों ने भी छात्रों का खुला समर्थन किया है.
छात्रों के हाथों में मौजूद तख्तियां इस आंदोलन की मुख्य वजहों को साफ बयां कर रही हैं। प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने ऐसी तख्तियां थाम रखी थीं जिन पर लिखा था: "बहुत अधिक असमानताएं हैं, हम त्रस्त हैं", "शिक्षा एक अधिकार है, विशेषाधिकार नहीं", "हम कम पढ़े-लिखे नहीं हैं, बस हमारी बात नहीं सुनी जाती", और "परेशान करने के लिए माफी, यह हमारे भविष्य के लिए है"।
सरकार की प्रतिक्रिया और पुलिस प्रमुख की चेतावनी
फ्रांस सरकार ने स्वीकार किया है कि छात्रों द्वारा उठाए गए कुछ मुद्दे पूरी तरह से जायज हैं, लेकिन साथ ही देश में फैल रही "शहरी हिंसा" (urban violence) की कड़ी निंदा भी की है। सरकार ने एक दूर-दराज के वामपंथी दल 'फ्रांस अनबाउंड' पर इस आंदोलन को भड़काने का आरोप लगाया है, हालांकि पार्टी ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है।
पेरिस के पुलिस प्रमुख पैट्रिस फॉरे ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक खुला पत्र जारी कर कहा कि जिन लोगों ने इस प्रदर्शन की शुरुआत की थी, अब उनका इस पर कोई नियंत्रण नहीं रह गया है। उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों से अपील की है कि वे स्कूल की नाकेबंदी और उपद्रव को तुरंत बंद करें और विरोध के शांतिपूर्ण तरीकों को अपनाएं।
माता-पिता की जिम्मेदारी पर जोर देते हुए फॉरे ने कहा, "यह समय 'पेशेवर दंगाइयों' के प्रभाव से अपने बच्चों को दूर रखने का है। अब शांतिपूर्ण तरीकों से अपनी बात रखने का समय आ गया है।" इसके बावजूद, छात्र यूनियनें पीछे हटने को तैयार नहीं हैं और आने वाले मंगलवार को देशव्यापी प्रदर्शनों की एक और बड़ी योजना बनाई जा रही है।
फ्रांस और भारत: शिक्षा को लेकर दो अलग आंदोलन
एक तरफ जहां फ्रांस के छात्र सड़कों पर उतरकर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं और कक्षाओं की बदहाली के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ दुनिया के दूसरे कोने यानी भारत में भी शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के लिए अलग रास्ते चुने जा रहे हैं। भारत में 'CJP' (कॉकटैच जनता पार्टी) जैसी संस्थाओं द्वारा सरकारी स्कूलों के ऑडिट के लिए 'स्कूल ठीक करो' अभियान चलाया जा रहा है।
भारत में चल रहे इस अभियान के तहत आम नागरिक गांवों के सरकारी स्कूलों में जाते हैं, वहां की कमियों की जांच करते हैं, चेकलिस्ट भरते हैं, समस्याओं की तस्वीरें खींचते हैं और उन findings को स्थानीय अधिकारियों तक पहुंचाते हैं। हालांकि दोनों देशों की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियां बिल्कुल अलग हैं, लेकिन दोनों का मूल उद्देश्य एक ही है—छात्रों को पढ़ने के लिए बुनियादी और बेहतर स्थितियां मुहैया कराना।
आगे क्या होगा?
फ्रांस का यह छात्र आंदोलन अब केवल शिक्षा क्षेत्र की मांगों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह देश की कानून व्यवस्था और राजनीतिक बहस का एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मैक्रों सरकार छात्रों के गुस्से को शांत करने के लिए क्या ठोस कदम उठाती है और क्या यह आंदोलन शांतिपूर्ण मोर्चे पर लौट पाता है या नहीं।