महाराष्ट्र के नक्सल प्रभावित और आदिवासी बहुल जिले गडचिरोली से इस वक्त एक बड़ी प्रशासनिक और सामाजिक हलचल सामने आ रही है। यहां के स्थानीय आदिवासियों और वनवासियों के अधिकारों की रक्षा को लेकर जिला महासभा ने प्रशासन के खिलाफ कड़ा रुख अपना लिया है। वनाधिकार दावों में आ रही तकनीकी त्रुटियों को दूर करने और छूटे हुए पात्र लाभार्थियों को नए दावे प्रस्तुत करने का अवसर देने के लिए समय सीमा (टाइमलाइन) बढ़ाने की पुरजोर मांग की जा रही है। यदि शासन और प्रशासन ने इस गंभीर मुद्दे पर जल्द ही कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया, तो एक बड़े जन आंदोलन का सामना करना पड़ सकता है, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।
वनाधिकार कानून और मैदानी हकीकत
देशभर में आदिवासियों और पारंपरिक वन निवासियों को उनकी आजीविका और जमीन का कानूनी हक देने के लिए वनाधिकार अधिनियम लागू किया गया था। इस कानून के तहत वन भूमि पर पीढ़ियों से काबिज लोगों को पट्टे (पजेशन) दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि, धरातल पर स्थिति उतनी सहज नहीं है जितनी कागजों पर दिखाई देती है। गडचिरोली जैसे दूर-दराज और भौगोलिक रूप से दुर्गम जिलों में कनेक्टिविटी की कमी, जागरूकता का अभाव और तकनीकी जटिलताओं के कारण बड़ी संख्या में आदिवासी अपने दावों को सही समय पर और सही तरीके से पोर्टल या संबंधित कार्यालयों में दर्ज नहीं करा पाए हैं।
जिला महासभा के प्रतिनिधियों का कहना है कि पूर्व में जमा किए गए कई दावों में मामूली त्रुटियों के कारण उन्हें खारिज कर दिया गया या वे पेंडिंग पड़े हैं। इसके अलावा, कई ऐसे पात्र परिवार हैं जो किन्हीं कारणों से तय समय सीमा के भीतर अपने आवेदन दाखिल करने से वंचित रह गए थे। अब जब इन त्रुटियों को सुधारने और नए आवेदन करने का दबाव बढ़ रहा है, तो मौजूदा समयावधि बेहद कम साबित हो रही है, जिससे स्थानीय स्तर पर भारी असंतोष व्याप्त है।
जिला महासभा की मुख्य मांगें और आपत्तियां
- त्रुटि सुधार के लिए अतिरिक्त समय: पहले से दर्ज दावों में दस्तावेजों की कमी या तकनीकी खामियों को ठीक करने के लिए कम से कम छह महीने का अतिरिक्त समय दिया जाए।
- नए दावों का स्वीकार किया जाना: जो पात्र परिवार किन्हीं कारणों से आवेदन करने से छूट गए हैं, उन्हें नए सिरे से अपने दावे प्रस्तुत करने का मौका मिले।
- प्रशासनिक जटिलताओं का सरलीकरण: ग्राम सभा स्तर पर आने वाली अड़चनों को दूर करने के लिए विशेष शिविरों का आयोजन किया जाए।
- पारदर्शिता की गारंटी: खारिज किए गए दावों के कारणों को स्पष्ट रूप से संबंधित ग्राम सभा और आवेदक को लिखित में सूचित किया जाए।
आंदोलन की चेतावनी और संभावित प्रभाव
जिला महासभा ने स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि जिला प्रशासन और राज्य सरकार ने इस दिशा में तुरंत कोई ठोस निर्णय नहीं लिया, तो आने वाले दिनों में उग्र आंदोलन का रास्ता अपनाया जाएगा। इस आंदोलन के तहत सरकारी कार्यालयों के घेराव से लेकर चक्का जाम जैसी रणनीतियों पर विचार किया जा रहा है। गडचिरोली जैसे संवेदनशील क्षेत्र में इस तरह का सामाजिक असंतोष प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि वनाधिकार जैसे संवेदनशील विषयों पर प्रशासन को संवेदनशीलता के साथ काम करना चाहिए। आदिवासियों का जमीन से जुड़ाव उनकी आस्मिता और अस्तित्व का सवाल है। ऐसे में यदि समय सीमा न बढ़ाई गई, तो यह न केवल प्रशासनिक विफलता साबित होगी, बल्कि इससे सामाजिक ताने-बाने पर भी असर पड़ सकता है।
आगे की राह और प्रशासन की जिम्मेदारी
अब गेंद पूरी तरह से स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के पाले में है। स्थानीय नागरिकों और जन प्रतिनिधियों की उम्मीदें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार जनभावनाओं को समझते हुए बिना किसी देरी के वनाधिकार दावों की समयावधि विस्तार का आधिकारिक आदेश जारी करेगी। यदि समय रहते उचित कदम उठाए जाते हैं, तो न केवल एक संभावित बड़े टकराव को टाला जा सकता है, बल्कि सैकड़ों-हजारों गरीब आदिवासियों को उनका न्यायसंगत हक भी मिल सकेगा।