हावड़ा से मुंबई आ रही गीतांजलि एक्सप्रेस के पार्सल डिब्बे से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने इंसानियत को झकझोर कर रख दिया है। क्रूरता की सारी हदें पार करते हुए लगभग 2,100 बेकसूर पक्षियों को महज सात छोटे पिंजरों में ठूंसकर 32 घंटे से अधिक लंबी यात्रा पर लाया जा रहा था। इस सनसनीखेज मामले में अब अदालत ने बड़ा और सराहनीय कदम उठाते हुए आरोपियों की उस मांग को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें वे इन बेजुबान जीवों को वापस पाने की जिद कर रहे थे। इसके साथ ही, कोर्ट ने जीवित बचे 282 पक्षियों को रायगढ़ स्थित 'कालोटे एनिमल ट्रस्ट' की सुरक्षित हिरासत में सौंपने का आदेश दिया है।
क्रूरता की इंतहा: 32 घंटे का दमघोंटू सफर
घटना की शुरुआत तब हुई जब 8 सितंबर की आधी रात के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT) पर गीतांजलि एक्सप्रेस की सघन तलाशी ली गई। रेलवे पुलिस और सुरक्षा बलों को पार्सल डिब्बे में जो नजारा दिखा, वह बेहद विचलित करने वाला था। सात छोटे-छोटे पिंजरों में कुल मिलाकर करीब 2,100 पक्षियों को इस तरह भरा गया था कि उन्हें हिलने-डुलने तक की जगह नहीं मिल पा रही थी। इन पक्षियों में मुख्य रूप से बडगेरिगार, फिंच और कॉकटेल जैसी प्रजातियां शामिल थीं।
पशु अधिकार संगठन 'पेटा इंडिया' के मुताबिक, हावड़ा से मुंबई तक की इस 32 घंटे से अधिक लंबी यात्रा के दौरान इन पक्षियों को न तो पर्याप्त हवा (वेंटिलेशन) मिल रही थी और न ही खाने-पीने की कोई उचित व्यवस्था थी। अत्यधिक भीड़भाड़ और घुटन भरे माहौल के कारण इन मासूम जीवों की स्थिति बेहद दयनीय हो चुकी थी।
लापरवाही और 55 बेजुबानों की दर्दनाक मौत
शुरुआती दौर में जब इन पक्षियों को बरामद किया गया था, तो प्रशासनिक स्तर पर कुछचूक देखने को मिली थी। इन्हें कुर्ला में पेट्स शॉप (पालतू जानवरों की दुकान) चलाने वाले कुछ लोगों को सौंप दिया गया था। हालांकि, जब वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों तक यह बात पहुंची और उनके कड़े हस्तक्षेप के बाद इस मामले में आधिकारिक तौर पर एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, तब जाकर स्थिति की गंभीरता समझी गई।
पुलिस ने संबंधित दुकान पर छापेमारी कर वहां से 337 पक्षी और बरामद किए। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। लंबे समय तक चले क्रूर परिवहन और शुरुआती कुप्रबंधन के चलते देखभाल के दौरान ही 55 पक्षियों की मौत हो गई। इन मृत पक्षियों का पोस्टमार्टम भी कराया गया ताकि मौत के सटीक कारणों का कानूनी दस्तावेज तैयार किया जा सके, जो आरोपियों के खिलाफ पुख्ता सबूत बनेगा।
अदालत में आरोपियों को झटका, पेटा इंडिया की पहल रंग लाई
जांच आगे बढ़ने के साथ ही इस अवैध तस्करी में शामिल आरोपियों ने अपनी हरकतों से बाज न आते हुए अदालत में याचिका दाखिल कर दी। उन्होंने मांग की कि जब्त किए गए जीवित पक्षियों को उन्हें वापस लौटा दिया जाए। लेकिन अदालत ने उनकी इस दलील और मांग को पूरी तरह से खारिज कर दिया।
आरोपियों की मांग ठुकराए जाने के बाद, पेटा इंडिया ने तुरंत हस्तक्षेप किया और अदालत में एक नई याचिका दायर की। संगठन ने इन बेजुबान और आहत पक्षियों के समुचित पुनर्वास और मेडिकल देखभाल की मांग की। अदालत ने पेटा की दलीलों और मामले की गंभीरता को समझते हुए आदेश दिया कि फिलहाल जीवित बचे 282 पक्षियों को रायगढ़ स्थित 'कालोटे एनिमल ट्रस्ट' की देखरेख में रखा जाए, जहां इन्हें एक सुरक्षित और अनुकूल वातावरण मिल सके।
किन धाराओं के तहत दर्ज हुआ मामला?
कानून की नजर में इस प्रकार की क्रूरता को कतई बर्दाश्त नहीं किया जाता। पुलिस ने इस पूरे प्रकरण में बेहद सख्त रुख अपनाया है। मामले में निम्नलिखित कानूनी धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है:
- भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023: धारा 62 और 325 के तहत गंभीर अपराध दर्ज किए गए हैं।
- पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960: बेजुबान जानवरों के साथ अमानवीय व्यवहार और तस्करी के खिलाफ इस विशेष अधिनियम की सुसंगत धाराओं को जोड़ा गया है।
आगे की जांच और तस्करों पर शिकंजा
सुरक्षा एजेंसियां और रेलवे पुलिस अब इस बात की गहराई से छानबीन कर रही हैं कि इस अवैध पक्षी तस्करी के पीछे कौन सा बड़ा सिंडिकेट काम कर रहा था। हावड़ा से लेकर मुंबई तक फैले इस नेटवर्क के अन्य मोहरों की तलाश जारी है। क्या यह सिर्फ एक स्थानीय दुकान की हरकत थी या इसके पीछे वन्यजीवों और पक्षियों की अवैध खरीद-फरोख्त का कोई अंतरराज्यीय गिरोह सक्रिय है? इन सभी पहलुओं पर तेजी से जांच चल रही है।
फिलहाल, 282 जीवित पक्षियों का कालोटे एनिमल ट्रस्ट पहुंचना इन बेजुबानों के लिए एक बड़ी राहत की सांस है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में कोर्ट की सख्ती और पशु अधिकार संगठनों की सक्रियता से अवैध तस्करी करने वालों के मन में खौफ पैदा होगा, जिससे भविष्य में ऐसे जघन्य अपराधों पर लगाम लगाने में मदद मिलेगी।