सनातन संस्कृति में व्रतों और त्योहारों की एक बेहद समृद्ध श्रृंखला है, जिसमें महिलाओं के लिए हरतालिका तीज का विशेष स्थान है। साल 2026 में 14 सितंबर को सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं इस कठिन व्रत को पूरे विधि-विधान के साथ रखेंगी। भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आने वाला यह पर्व अखंड सौभाग्य और मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए रखा जाता है। इस दिन जहां एक ओर अन्न और जल का त्याग कर 24 घंटे का निर्जला उपवास रखा जाता है, वहीं दूसरी ओर पूजा की चौकी पर कई प्रकार की पारंपरिक रस्में भी निभाई जाती हैं।
इन्हीं रस्मों में से एक बेहद महत्वपूर्ण और अनिवार्य परंपरा है शिवलिंग के ऊपर 'फुलेरा' या 'फुलहरा' बांधना। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, फुलेरा के बिना हरतालिका तीज की पूजा का विधान अधूरा माना जाता है। लेकिन क्या आपने कभी गहराई से सोचा है कि आखिर पूजा के दौरान भगवान शिव के ऊपर ही फुलेरा क्यों बांधा जाता है और इसके पीछे की पौराणिक तथा ज्योतिषीय पृष्ठभूमि क्या है? आइए इस लेख में विस्तार से जानते हैं इस अनोखी परंपरा के हर एक पहलू को।
आखिर क्या होता है फुलेरा और इसका स्वरूप?
फुलेरा असल में विभिन्न प्रकार के ताजे फूलों, सुंदर लताओं, हरियाली से भरपूर पत्तियों और प्राकृतिक सामग्रियों से तैयार किया गया एक बेहद कलात्मक और आकर्षक छत्र या छोटा मंडप होता है। इसे बालू या शुद्ध मिट्टी से बनाए गए पार्थिव शिवलिंग के ठीक ऊपर हवा में लटकाया जाता है या बांधा जाता है।
सनातन परंपरा में इसे केवल सजावट की वस्तु नहीं, बल्कि देवों के देव महादेव और आदिशक्ति मां पार्वती के पावन विवाह मंडप तथा उनकी दिव्य छत्रछाया का प्रतीक माना जाता है। जब सुहागिन महिलाएं रात के समय चार प्रहर की पूजा करती हैं, तो यह फुलेरा उनकी पूजा की वेदी को एक अलौकिक और पवित्र ऊर्जा से भर देता है।
महादेव की पांच पुत्रियों और फुलेरा का रहस्य
ज्योतिष शास्त्र और लोक मान्यताओं के अनुसार, हरतालिका तीज के दिन भगवान शिव के ऊपर सीधे जलधारा प्रवाहित करने की बजाय फुलेरा बांधने की परंपरा पर विशेष जोर दिया जाता है। इस फुलेरा की बनावट में भी एक गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा हुआ है।
फुलेरा को मुख्य रूप से पांच अलग-अलग प्रकार के फूलों से तैयार किया जाता है। इसमें बांधी जाने वाली पांच फूलों की मालाएं किसी सामान्य सजावट का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि ये भगवान शंकर की पांच मानस पुत्रियों—जया, विषहरा, शामिलबारी, देव और दोतली—का प्रतीक मानी जाती हैं।
- जया: शिव पुत्री जया को विजय और सफलता का प्रतीक माना जाता है।
- विषहरा: यह पुत्री जीवन के विष और संकटों को हरने वाली मानी गई है।
- शामिलबारी: हरियाली और प्रकृति के संतुलन से जुड़ी शक्ति।
- देव: दिव्यता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाली शक्ति।
- दोतली: पारिवारिक सुख और संतुलन बनाए रखने वाली देवी।
इन पांचों पुत्रियों के नाम की पांच मालाओं से जब फुलेरा तैयार किया जाता है, तो ऐसा माना जाता है कि साक्षात शिव परिवार का आशीर्वाद उस पूजा स्थल पर बरस रहा है।
माता पार्वती ने सबसे पहले क्यों रखा था यह कठिन व्रत?
पौराणिक कथाओं के अनुसार, हरतालिका तीज के इस पावन व्रत की शुरुआत सबसे पहले खुद माता पार्वती ने की थी। अपने पूर्व जन्म में माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए हिमालय पर अत्यंत कठोर तपस्या की थी। इस कठिन साधना के दौरान उन्होंने लंबे समय तक अन्न और जल का पूर्णतः त्याग कर दिया था।
मां पार्वती के इस निष्कलंक और अटूट प्रेम तथा कठोर तप से प्रसन्न होकर अंततः भगवान भोलेनाथ ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। तभी से यह परंपरा चली आ रही है कि जो भी स्त्री या कन्या इस व्रत को पूरी निष्ठा के साथ रखती है, उसे महादेव और माता पार्वती की कृपा से अखंड सौभाग्य और मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है।
कैसा होता है हरतालिका तीज व्रत का स्वरूप और नियम?
हरतालिका तीज के व्रत को हिंदू धर्म के सबसे कठिन व्रतों में गिना जाता है। इसके नियम बेहद कड़े और अनुशासन से भरे होते हैं:
- यह व्रत पूरी तरह से निर्जला होता है, यानी पूरे 24 घंटे के दौरान जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है।
- व्रत की शुरुआत सूर्योदय से पहले शुरू होती है और अगले दिन सूर्योदय के बाद ही इसका पारण (व्रत खोलना) किया जाता है।
- रात्रि के समय सोने की मनाही होती है। सुहागिनें और कन्याएं जागरण करती हैं और रात के चारों प्रहर में विधि-विधान से गौरी-शंकर की पूजा करती हैं।
- इस दिन महिलाएं नए वस्त्र पहनती हैं, सोलह श्रृंगार करती हैं और अपने सुहाग की लंबी उम्र तथा सुखद वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
भक्ति और समर्पण का पर्व
आज के आधुनिक दौर में भी हमारी प्राचीन परंपराएं और उनसे जुड़े वैज्ञानिक व आध्यात्मिक कारण उतने ही प्रासंगिक हैं। हरतालिका तीज पर बांधा जाने वाला फुलेरा सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति प्रेम, फूलों की सकारात्मक ऊर्जा और शिव-पार्वती के अमर प्रेम के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है। जब महिलाएं इन पांच फूलों की मालाओं से सजे फुलेरे के नीचे बैठकर आराधना करती हैं, तो उनका मन अलौकिक शांति और ऊर्जा से भर जाता है। यही कारण है कि यह पर्व आज भी भारतीय जनमानस के दिलों में विशेष स्थान रखता है और हर साल उत्साह के साथ मनाया जाता है।
