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चीनी पर मंडराया संकट! 10 साल बाद क्यों मंगानी पड़ रही विदेश से मिठास?

चीनी पर मंडराया संकट! 10 साल बाद क्यों मंगानी पड़ रही विदेश से मिठास?

त्योहारों का सीजन नजदीक आते ही आम आदमी की रसोई का बजट डगमगाने लगा है। क्या आपने कभी सोचा था कि दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों में शुमार भारत को एक दिन अपनी घरेलू जरूरतें पूरी करने के लिए विदेश से चीनी मंगानी पड़ेगी? जी हां, पिछले दो महीनों में चीनी की कीमतों में लगभग 40 फीसदी तक का बड़ा उछाल आया है, जिसके बाद केंद्र सरकार को एक कड़ा और बड़ा फैसला लेना पड़ा है। सरकार ने आगामी त्योहारी सीजन को ध्यान में रखते हुए 31 अक्टूबर तक 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात को हरी झंडी दे दी है।

एक दशक बाद क्यों पड़ी आयात की जरूरत?

भारत सामान्य परिस्थितियों में चीनी के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर है और दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी उत्पादक देश है। उद्योग के आंकड़ों पर अगर नजर डालें, तो भारत ने आखिरी बार बड़े पैमाने पर चीनी का आयात साल 2017-18 में किया था। यानी करीब एक दशक का लंबा अंतराल बीत जाने के बाद अब एक बार फिर सरकार को विदेशी चीनी का सहारा लेना पड़ रहा है।

इस अचानक आए बदलाव के पीछे घरेलू स्तर पर उत्पादन और आपूर्ति पर बन रहा भारी दबाव है। सरकार का मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि गणेश चतुर्थी, दशहरा और दिवाली जैसे बड़े त्योहारों के दौरान बाजार में चीनी की कोई कमी न हो और इसकी बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाई जा सके।

त्योहारी सीजन और आसमान छूती मांग

भारत में अगस्त से नवंबर के बीच का समय उत्सवों का होता है। इस दौरान देश के कोने-कोने में मिठाइयों, पेय पदार्थों और प्रोसेस्ड फूड की खपत कई गुना बढ़ जाती है। इसके साथ ही, बिस्किट और कन्फेक्शनरी बनाने वाली बड़ी कंपनियां भी त्योहारी सीजन की बंपर मांग को पूरा करने के लिए महीनों पहले से चीनी का भारी स्टॉक जमा करना शुरू कर देती हैं।

मांग में इस अचानक तेजी के कारण खुदरा बाजारों में कीमतों ने पिछले कुछ हफ्तों में सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। महज 15 दिन पहले तक जो चीनी रिटेल बाजार में 48 रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास बिक रही थी, वह अब बढ़कर 62 से 65 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी है। यानी सीधे तौर पर 17 से 20 रुपये प्रति किलो का उछाल देखा गया है। इसका सीधा असर सुबह की चाय से लेकर दूध, चॉकलेट, खीर और बाजार की हर उस चीज पर पड़ा है जिसमें मिठास का इस्तेमाल होता है।

गन्ने की फसल पर मौसम और नीतियों की दोहरी मार

चीनी संकट के पीछे केवल त्योहारी मांग ही नहीं, बल्कि कृषि मोर्चे पर खड़ी कई अन्य चुनौतियां भी हैं। गन्ना एक ऐसी फसल है जिसे अत्यधिक पानी की जरूरत होती है और इसकी पैदावार पूरी तरह से मानसून तथा समय पर मिलने वाली सिंचाई पर टिकी होती है।

  • कम मानसूनी बारिश: इस साल भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आंकड़ों के मुताबिक मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 13 फीसदी कम दर्ज की गई है, जबकि जून के शुरुआती दौर में यह कमी 40 फीसदी से भी अधिक थी।
  • घटा रकबा: कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, गन्ने का कुल रकबा पिछले साल की तुलना में थोड़ा कम रहा है, जिससे कुल उत्पादन प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।
  • E20 ईंधन और इथेनॉल का असर: पर्यावरण और ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सरकार गन्ने के रस और शीरे का इस्तेमाल इथेनॉल (E20) बनाने में कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इथेनॉल उत्पादन की तरफ गन्ने का रुझान बढ़ने से चीनी मिलों के पास मिलिंग के लिए गन्ने की मात्रा कम बची है, जिससे बाजार में इसकी किल्लत पैदा हो गई है।

सरकार का कड़ा कदम: बड़े खरीदारों के लिए स्टॉक लिमिट तय

केवल आयात की अनुमति देने से ही बात नहीं बनने वाली थी, इसलिए सरकार ने जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकने के लिए भी सख्त कदम उठाए हैं। सरकार ने बड़े और थोक खरीदारों के लिए स्टॉक रखने की सीमा तय कर दी है।

नियमों के मुताबिक, 1 सितंबर से 30 नवंबर के बीच हर महीने 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी का उपयोग करने वाले डीलर्स और थोक व्यापारी अब अधिकतम केवल 15 दिनों की खपत के बराबर ही स्टॉक अपने पास रख सकेंगे। इससे पहले जुलाई में यह सीमा 30 दिनों की थी, जिसे घटाकर अब आधा कर दिया गया है ताकि बाजार में कृत्रिम कमी न पैदा की जा सके।

आगे क्या होगी स्थिति?

विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के इन त्वरित कदमों से आने वाले दिनों में बाजार को कुछ हद तक राहत मिल सकती है। शुल्क-मुक्त आयात से जहां एक तरफ देश में चीनी की कुल उपलब्धता बढ़ेगी, वहीं दूसरी तरफ स्टॉक लिमिट लगाने से जमाखोरों पर नकेल कसेगी। हालांकि, असली चुनौती यह देखना होगी कि क्या विदेशी चीनी समय पर भारतीय बंदरगाहों और बाजारों तक पहुंच पाती है या नहीं, ताकि आम जनता को त्योहारी सीजन में राहत की मिठास मिल सके।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

1. सरकार ने अचानक चीनी के आयात का फैसला क्यों लिया?

देश में पिछले दो महीनों में चीनी की कीमतों में करीब 40 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है और आगामी त्योहारी सीजन (दशहरा-दिवाली) में मांग बढ़ने की आशंका है। घरेलू आपूर्ति को बनाए रखने और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने 31 अक्टूबर तक 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की अनुमति दी है।

2. खुदरा बाजार में चीनी कितनी महंगी हुई है?

पिछले 15 दिनों में चीनी के दामों में 17 से 20 रुपये तक की तेजी आई है। जो चीनी पहले 48 रुपये प्रति किलो मिलती थी, वह अब बढ़कर 62 से 65 रुपये प्रति किलो तक बिक रही है।

3. क्या E20 और इथेनॉल नीति का भी चीनी की कीमतों पर असर पड़ा है?

हाँ, गन्ने का एक बड़ा हिस्सा इथेनॉल उत्पादन में उपयोग किए जाने के कारण चीनी मिलों के पास गन्ने की उपलब्धता कम हुई है, जिससे चीनी उत्पादन पर असर पड़ा है और कीमतें बढ़ी हैं।

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अनुराधा दुबे

अनुराधा दुबे

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अनुराधा दुबे एक समर्पित और अनुभवी कंटेंट राइटर हैं, जो भारत से जुड़ी राजनीतिक, सामाजिक और नीतिगत खबरों को गहराई से समझकर पाठकों तक पहुंचाती हैं। उन...

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