बांग्लादेश की राजनीति में एक नए अध्याय की शुरुआत हो चुकी है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के वरिष्ठ नेता और पूर्व महासचिव मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर ने देश के 23वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ ली है। संसद यानी जातीय संसद में हुए इस चुनाव में राजनीतिक सरगर्मी अपने चरम पर थी, क्योंकि पिछले साढ़े तीन दशकों यानी 35 साल के इतिहास में यह पहला मौका था जब राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवार आमने-सामने थे।
संसद भवन में हुए मतदान में मिर्जा फखरुल को कुल 255 वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी और लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी के अध्यक्ष कर्नल (रिटायर्ड) ओली अहमद को 88 वोटों से संतोष करना पड़ा। इस चुनाव में कुल 349 सांसद मतदान के पात्र थे, जिनमें से 343 सांसदों ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। बीएनपी और उसके सहयोगियों के पास संसद में पहले से ही मजबूत दो-तिहाई बहुमत था, जिसके चलते फखरुल की जीत की पटकथा पहले ही लिखी जा चुकी थी।
कौन हैं मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर?
78 वर्षीय मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का राजनीतिक सफर बेहद संघर्षपूर्ण और लंबा रहा है। साल 1971 में जब बांग्लादेश की आजादी के लिए मुक्ति संग्राम लड़ा जा रहा था, तब उन्होंने वामपंथी स्वतंत्रता सेनानियों के संगठन के साथ मिलकर सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह लंबे समय से बीएनपी के सबसे भरोसेमंद और प्रमुख चेहरों में गिने जाते रहे हैं।
वर्ष 2011 से 2016 तक उन्होंने बीएनपी के कार्यवाहक महासचिव की जिम्मेदारी संभाली और मार्च 2016 में उन्हें पार्टी का स्थायी महासचिव बना दिया गया। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के लंबे और कड़े शासनकाल के दौरान मिर्जा फखरुल पार्टी के सबसे बड़े जमीनी नेताओं में से एक रहे, जिन्होंने तमाम मुश्किलों के बावजूद संगठन को जोड़े रखा। हाल ही में जब बीएनपी सत्ता में लौटी, तो पार्टी अध्यक्ष और प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 13 अगस्त को उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया। इस घोषणा के बाद उन्होंने बीएनपी महासचिव और स्टैंडिंग कमेटी के सदस्य पद से इस्तीफा दे दिया था।
35 साल बाद क्यों ऐतिहासिक रहा यह चुनाव?
यह राष्ट्रपति चुनाव इसलिए भी बेहद खास माना जा रहा है क्योंकि 1991 के बाद से बांग्लादेश के राष्ट्रपति चुनावों का इतिहास या तो निर्विरोध जीत का रहा है या फिर विपक्ष द्वारा चुनाव के बहिष्कार का। 35 साल के लंबे अंतराल के बाद यह पहला मौका था जब देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए दो मजबूत उम्मीदवार चुनावी मैदान में उतरे थे।
ओली अहमद, जो कि लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी (एलडीपी) के अध्यक्ष हैं, उन्हें जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाले 11-दलीय विपक्षी गठबंधन ने अपना साझा उम्मीदवार बनाया था। हालांकि आंकड़ों का गणित बीएनपी के पक्ष में था, लेकिन इस चुनाव ने बांग्लादेश की बदलती राजनीतिक संस्कृति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की एक नई झलक जरूर पेश की है।
भारत के साथ रिश्तों को लेकर क्या है मिर्जा फखरुल का रुख?
भारत और बांग्लादेश के बीच के कूटनीतिक संबंधों के लिहाज से मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर का राष्ट्रपति बनना एक बेहद अहम घटनाक्रम है। दक्षिण एशिया की भू-राजनीति में इस बदलाव पर नई दिल्ली की भी पैनी नजर है। फखरुल के अब तक के बयानों और राजनीतिक रुख को देखें तो वह भारत के साथ संबंधों में टकराव या आक्रामकता के बजाय बातचीत, संवाद और कूटनीति पर अधिक जोर देते आए हैं।
उन्होंने कई मौकों पर भारत-बांग्लादेश के रिश्तों को जटिल बताते हुए यह भी स्पष्ट किया है कि दोनों पड़ोसी देशों के बीच चाहे जितने भी मतभेद क्यों न हों, आपसी सहयोग का रास्ता कभी बंद नहीं होना चाहिए। फखरुल का सार्वजनिक स्टैंड यह रहा है कि द्विपक्षीय विवादों को संघर्ष या तनाव में बदलने के बजाय टेबल पर बैठकर कूटनीतिक माध्यमों से सुलझाया जाना चाहिए। चूंकि वर्तमान में नई बीएनपी सरकार के साथ नई दिल्ली के कई संवेदनशील और रणनीतिक मुद्दे जुड़े हुए हैं, ऐसे में एक परिपक्व और शांत स्वभाव के राजनेता का राष्ट्रपति बनना दोनों देशों के रिश्तों में स्थिरता लाने का काम कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
प्रश्न 1: बांग्लादेश के नए राष्ट्रपति कौन बने हैं?
उत्तर: बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के वरिष्ठ नेता मिर्जा फखरुल इस्लाम आलमगीर बांग्लादेश के 23वें राष्ट्रपति बने हैं।
प्रश्न 2: यह राष्ट्रपति चुनाव पिछले चुनावों से अलग क्यों था?
उत्तर: यह चुनाव इसलिए ऐतिहासिक था क्योंकि 35 साल बाद पहली बार बांग्लादेश के राष्ट्रपति चुनाव में दो उम्मीदवार (मिर्जा फखरुल और कर्नल ओली अहमद) आमने-सामने थे।
प्रश्न 3: भारत के साथ मिर्जा फखरुल के संबंधों का दृष्टिकोण कैसा है?
उत्तर: मिर्जा फखरुल भारत के साथ संबंधों में टकराव के बजाय बातचीत, कूटनीति और आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के पक्षधर रहे हैं।