अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के पटल पर इन दिनों भारत का कद और उसकी बेबाक बयानी दुनिया भर के तमाम देशों का ध्यान खींच रही है। इसी कड़ी में देश के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक बार फिर अमेरिकी धरती से साफ शब्दों में यह बता दिया है कि अब भारत किसी के दबाव में काम करने वाला देश नहीं है। वाशिंगटन डीसी या अमेरिका के किसी भी मंच से जब भारत अपनी बात रखता है, तो उसका अंदाज़ बिल्कुल जुदा होता है। इस बार भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जब विदेश मंत्री ने दो टूक अंदाज में उन पुरानी धारणाओं पर करारा प्रहार किया जो कभी पश्चिमी देशों की कूटनीति का मुख्य हिस्सा हुआ करती थीं।
बदल चुका है कूटनीति का दौर: एस जयशंकर
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक कार्यक्रम के दौरान भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों पर खुलकर बात की। उन्होंने अपने चिर-परिचित बेबाक अंदाज में इतिहास के पन्नों को पलटते हुए यह बताया कि किस तरह दशकों तक वाशिंगटन के नीति-निर्माताओं के मन में भारत को लेकर एक खास किस्म की मानसिकता बनी हुई थी। जयशंकर ने स्पष्ट किया कि एक वक्त ऐसा भी था जब अमेरिका के रणनीतिक हलकों में यह सोच बहुत गहराई तक बैठी हुई थी कि भारत के पास अपने सामरिक और आर्थिक हितों को साधने के लिए बहुत ज्यादा विकल्प मौजूद नहीं हैं।
यही वजह थी कि पहले के दौर में रिश्तों की शर्तें एकतरफा तय होने की उम्मीद की जाती थी। लेकिन आज इक्कीसवीं सदी के इस दौर में परिस्थितियां पूरी तरह से पलट चुकी हैं। विदेश मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि अब वह जमाना पूरी तरह से लद चुका है जब भारत को विकल्पों की कमी से जूझना पड़ता था। आज का नया भारत अपने फैसले खुद लेने में पूरी तरह सक्षम है और ग्लोबल साउथ की आवाज बनकर उभर रहा है।
'दिखावा खत्म' – जयशंकर के इस बयान के क्या हैं मायने?
अमेरिकी जमीन पर खड़े होकर 'दिखावा खत्म' होने की बात कहना कूटनीतिक लिहाज से बहुत बड़ा संकेत माना जा रहा है। इसका सीधा अर्थ यह है कि अब भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक रिश्तों में किसी भी तरह के पर्दे के पीछे की बातें या औपचारिकताएं नहीं, बल्कि साफ-सुथरे और बराबरी के हक वाले रिश्ते चलेंगे। जब दो देश रणनीतिक साझेदार बनते हैं, तो वहां हितों का टकराव होना स्वाभाविक है, लेकिन उन टकरावों को किस तरह से सुलझाया जाता है, यही परिपक्व कूटनीति की पहचान होती है।
- बराबरी का रिश्ता: भारत अब किसी कनिष्ठ साझेदार की भूमिका में नहीं रहना चाहता।
- रणनीतिक स्वायत्तता: भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति और रूस या अन्य देशों के साथ अपने पारंपरिक संबंधों पर कोई समझौता नहीं करेगा।
- आर्थिक ताकत: दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के नाते आज भारत वैश्विक बाजार का एक अनिवार्य केंद्र बन चुका है।
अमेरिका की पुरानी सोच पर तंज
विशेषज्ञों का मानना है कि एस जयशंकर का यह बयान अमेरिकी थिंक टैंक और प्रशासन के उन अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो अभी भी शीत युद्ध के दौर की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाए हैं। अमेरिका के कई पुराने रणनीतिकार यह मानते थे कि भारत को अपने पाले में रखने के लिए उसे पश्चिमी देशों के इशारों पर चलना होगा। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह से भारत ने अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय दिया है, उसने पश्चिमी देशों को भी अपनी नीतियां बदलने पर मजबूर कर दिया है।
रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान पश्चिमी देशों के भारी दबाव के बावजूद भारत ने जिस तरह से अपनी ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा, उसने पूरी दुनिया को यह दिखा दिया कि भारत अपने फैसले किसी के दबाव में नहीं लेता। जयशंकर का यह बयान उसी दृढ़ संकल्प का एक और मजबूत प्रमाण है।
भविष्य में भारत-अमेरिका संबंधों की दिशा
इन बयानों का यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि भारत और अमेरिका के संबंध बिगड़ रहे हैं। बल्कि इसके विपरीत, यह एक परिपक्व रिश्ते की निशानी है जहां दोनों देश आंख में आंख डालकर अपने हितों पर बात कर रहे हैं। रक्षा तकनीक के क्षेत्र में हो आईसेट (initiative on Critical and Emerging Technology - iCET) जैसी पहलों के माध्यम से दोनों देश एक साथ आगे बढ़ रहे हैं। सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में दोनों के बीच सहयोग लगातार गहरा हो रहा है।
लेकिन साथ ही, भारत ने यह भी साफ कर दिया है कि रणनीतिक साझेदारी का मतलब अपनी संप्रभुता का समर्पण नहीं होता। जब तक अमेरिका और अन्य पश्चिमी देश इस नए यथार्थ को स्वीकार करेंगे, तब तक दोनों देशों के संबंध और अधिक मजबूत और भरोसेमंद होते चले जाएंगे।
निष्कर्ष
एस जयशंकर का यह बयान केवल एक कूटनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह उभरते हुए नए भारत की वह तस्वीर है जो अपनी शर्तों पर दुनिया से बात करना जानती है। अमेरिकी धरती पर बैठकर इस प्रकार की दो टूक बातें कहना यह साबित करता है कि आज का भारत वैश्विक मंच पर एक मजबूत और निर्णायक शक्ति बन चुका है, जिसे नजरअंदाज करना अब किसी भी महाशक्ति के लिए संभव नहीं है।