बिहार की राजनीति में एक बार फिर से गंगा नदी और जल बंटवारे को लेकर सियासत गरमा गई है। जनता दल यूनाइटेड (JDU) के राष्ट्रीय महासचिव और वरिष्ठ नेता संजय झा ने फरक्का संधि (Farakka Treaty) को लेकर एक ऐसा बयान दिया है, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर बहस छिड़ गई है। संजय झा ने न सिर्फ इस संधि को बिहार के हितों के खिलाफ बताया है, बल्कि इसे पूरी तरह से खत्म करने की मांग भी कर दी है।
उनके इस बयान के बाद राज्य में राजनीतिक सरगर्मी काफी बढ़ गई है। आइए जानते हैं कि आखिर फरक्का संधि क्या है, बिहार को इससे क्या नुकसान हो रहा है और JDU नेता के इस तीखे बयान के पीछे की पूरी सियासी और भौगोलिक कहानी क्या है।

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फरक्का संधि पर क्यों भड़के JDU नेता संजय झा?
संजय झा ने विपक्ष पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि जिन लोगों ने अतीत में बिहार के अधिकारों और हितों का सौदा किया था, वे आज इस मुद्दे पर भाषण दे रहे हैं। उनका इशारा साफ तौर पर उन दलों की ओर था जो केंद्र और राज्य में पहले सत्ता में रहे हैं, लेकिन उन्होंने बिहार के आर्थिक और पर्यावरणीय नुकसान पर कभी खुलकर बात नहीं की।
संजय झा ने जोर देकर कहा कि फरक्का बराज (Farakka Barrage) के निर्माण और उसके बाद हुई संधियों ने बिहार की भौगोलिक और आर्थिक स्थिति को बहुत अधिक प्रभावित किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य के लोगों को इसका खामियाजा हर साल बाढ़ और सूखे के रूप में भुगतना पड़ता है।
क्या है फरक्का संधि और इसका इतिहास?
फरक्का बराज पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले में गंगा नदी पर बनाया गया एक बांध है। इसका मुख्य उद्देश्य कोलकाता बंदरगाह को सिल्ट (गाद) से बचाना था, ताकि हुगली नदी में नौवहन (navigation) सुचारू रूप से चल सके। इसके लिए भारत और बांग्लादेश के बीच साल 1996 में एक महत्वपूर्ण गंगा जल संधि (Ganga Water Treaty) पर हस्ताक्षर किए गए थे, जो 30 वर्षों के लिए है।
हालांकि, इस संधि और बराज के निर्माण से सबसे बड़ा नुकसान किसी को हुआ है, तो वह बिहार राज्य है। जानकारों का मानना है कि इस बराज की वजह से गंगा के प्रवाह में भारी बदलाव आया है और नदी की तलहटी में गाद (silt) जमा होने की समस्या विकराल रूप ले चुकी है।
बिहार के लिए क्यों नासूर बन गया है फरक्का बराज?
JDU और राज्य के अन्य जानकारों का तर्क है कि फरक्का बराज की वजह से बिहार में कई गंभीर समस्याएं पैदा हो गई हैं:
- गाद का जमाव (Siltation): बराज के कारण नदी का प्राकृतिक प्रवाह रुक जाता है, जिससे भारी मात्रा में सिल्ट बिहार की सीमा में ही जमने लगती है। इससे नदी की गहराई कम हो जाती है।
- भीषण बाढ़ का खतरा: कम गहराई और जल प्रवाह बाधित होने के कारण जरा सी बारिश में ही गंगा और उसकी सहायक नदियां उफान पर आ जाती हैं, जिससे हर साल उत्तर बिहार के साथ-साथ दक्षिण बिहार के कई जिले बाढ़ की चपेट में आ जाते हैं।
- जलस्तर में गिरावट: गर्मियों के दिनों में राज्य के कई हिस्सों में भूजल स्तर तेजी से नीचे चला जाता है, जिसका असर कृषि और पेयजल पर पड़ता है।
- अर्थव्यवस्था को झटका: बार-बार आने वाली बाढ़ और मिट्टी के कटाव (Erosion) से बिहार के किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ता है।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और आगे की राह
संजय झा के इस बयान के बाद बिहार की राजनीति में पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गए हैं। जहां JDU इसे राज्य के अस्तित्व और विकास से जुड़ा मुद्दा बता रही है, वहीं विपक्षी दल इस पर अपनी अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्र सरकार और नीति आयोग को इस मामले पर एक उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक बुलानी चाहिए, क्योंकि यह सिर्फ एक राज्य का नहीं बल्कि पूरे पूर्वी भारत के पर्यावरण और जल सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला है।
फरक्का संधि के खत्म करने की मांग अब केवल एक राजनीतिक बयान नहीं रह गई है, बल्कि यह बिहार के लाखों किसानों और आम जनता के दर्द की अभिव्यक्ति बन चुकी है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद से लेकर सड़क तक और अधिक तूल पकड़ सकता है।