झारखंड की राजनीति में इन दिनों परिसीमन (Delimitation) के मुद्दे पर सरगर्मी काफी बढ़ गई है। राज्य में संभावित परिसीमन प्रक्रिया को लेकर आदिवासी समाजों और संगठनों की चिंताएं लगातार सामने आ रही हैं। इसी कड़ी में पूर्व मंत्री बंधु तिर्की के नेतृत्व में आदिवासी संगठनों के एक प्रमुख प्रतिनिधिमंडल ने झारखंड के राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार से राजभवन में मुलाकात की। इस मुलाकात के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा, जिसमें मांग की गई है कि राज्य में आदिवासियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को हर हाल में सुरक्षित रखा जाए।
मुलाकात के बाद से ही इस बात पर चर्चा तेज हो गई है कि यदि परिसीमन के नियमों में स्थानीय और सामाजिक परिस्थितियों को नहीं जोड़ा गया, तो इसके दूरगामी और नकारात्मक परिणाम आदिवासी समाज को भुगतने पड़ सकते हैं। प्रतिनिधिमंडल ने साफ शब्दों में अपनी बात रखते हुए कहा कि केवल मौजूदा जनसंख्या के आंकड़ों को आधार बनाकर परिसीमन करना आदिवासी हितों के खिलाफ साबित हो सकता है।
जनसंख्या के साथ भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को आधार बनाने की मांग
प्रतिनिधिमंडल ने राज्यपाल के सामने तर्क रखा कि झारखंड जैसे राज्य में परिसीमन की प्रक्रिया केवल कागजी या हालिया जनगणना के आंकड़ों के आधार पर तय नहीं होनी चाहिए। राज्य की पांचवीं अनुसूची (5th Schedule) के तहत आने वाले क्षेत्रों की अपनी विशेष और संवेदनशील स्थितियां हैं। इन इलाकों की भौगोलिक बनावट, सामाजिक ताना-बाना, विस्थापन की ऐतिहासिक विभीषिका, रोजगार के लिए होने वाला पलायन और पिछले कई दशकों में हुए जनसांख्यिकी बदलाव (Demographic Changes) को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आदिवासी नेताओं ने आशंका जताई कि यदि केवल पारंपارिक फॉर्मूले के तहत परिसीमन किया गया, तो राज्य में विधानसभा और लोकसभा सीटों के समीकरण पूरी तरह बदल जाएंगे। इसका सीधा और घातक असर आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ेगा, जिससे लोकतांत्रिक व्यवस्था में उनकी आवाज कमजोर हो सकती है।
आरक्षित सीटों के अनुपात में बढ़ोतरी की उठी मांग
ज्ञापन के जरिए यह स्पष्ट रूप से मांग की गई है कि यदि परिसीमन के बाद लोकसभा या विधानसभा की कुल सीटों में इजाफा होता है, तो अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ाई जानी चाहिए। प्रतिनिधिमंडल का यह भी कहना था कि किसी भी परिस्थिति में वर्तमान राजनीतिक हिस्सेदारी कम नहीं होनी चाहिए।
- परिसीमन प्रक्रिया में पांचवीं अनुसूची के प्रावधानों को पूरी तरह से शामिल किया जाए।
- विस्थापित और पलायन करने वाले आदिवासी परिवारों के डेटा का सही आकलन हो।
- आरक्षित सीटों के अनुपात में कोई कमी न आए, बल्कि बढ़ोतरी हो।
- स्थानीय संस्कृति और क्षेत्रीय संतुलन को प्राथमिकता दी जाए।
राज्यपाल ने दिया विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने का सुझाव
राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को बेहद गंभीरता से सुना। इस संवेदनशील मामले पर चर्चा करते हुए राज्यपाल ने सुझाव दिया कि आदिवासी संगठनों को इन तमाम मांगों को राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के समक्ष भी रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को इस विषय पर गंभीर मंथन करना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर झारखंड विधानसभा का एक विशेष सत्र (Special Session) बुलाया जाना चाहिए।
विशेष सत्र के माध्यम से परिसीमन को लेकर एक स्पष्ट प्रस्ताव पारित किया जा सकता है। इसके बाद इस प्रस्ताव को राज्यपाल के माध्यम से केंद्र सरकार के पास भेजने की दिशा में विधिवत पहल की जा सकती है, ताकि राज्य की भावनाओं से केंद्र को अवगत कराया जा सके।
संविधान की पांचवीं अनुसूची के पैरा-3 का हवाला
बैठक के दौरान प्रतिनिधिमंडल ने संविधान की पांचवीं अनुसूची के पैरा-3 का विशेष रूप से हवाला दिया। उन्होंने राज्यपाल से आग्रह किया कि वे इस मामले में अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति को एक विस्तृत रिपोर्ट भेजें। इस रिपोर्ट में मुख्य रूप से पांचवीं अनुसूची क्षेत्रों में हुए जनसंख्या बदलाव, बड़े पैमाने पर हुए विस्थापन, पलायन और परिसीमन के संभावित दुष्प्रभावों का वैज्ञानिक और विस्तृत आकलन शामिल करने की मांग की गई।
प्रभावों के अध्ययन के लिए उच्चस्तरीय समिति के गठन की मांग
आदिवासी संगठनों ने मांग की है कि परिसीमन के राज्य पर पड़ने वाले प्रभावों का गहराई से अध्ययन करने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति (High-Level Committee) का गठन किया जाना चाहिए। इस सिलसिले में 8 मार्च 2019 को अनुसूचित क्षेत्रों से जुड़े विषयों के लिए गठित की गई पुरानी उच्चस्तरीय समिति की तर्ज पर ही एक नई समिति बनाने का सुझाव दिया गया है।
संगठनों की यह भी मांग है कि इस प्रस्तावित समिति की रिपोर्ट को राज्यपाल की वार्षिक रिपोर्ट का हिस्सा बनाया जाए और उसे आगे की कार्रवाई के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाए ताकि इस पर राष्ट्रीय स्तर पर भी संज्ञान लिया जा सके।
विकास कार्यों के नाम पर विस्थापन का दर्द
प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व कर रहे पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने मीडिया और राज्यपाल के सामने झारखंड के कड़वे सच को रखा। उन्होंने कहा कि झारखंड में पिछले कई दशकों से खनन (Mining), बड़े बांध (Dams), औद्योगिक परियोजनाएं, बिजली संयंत्रों, और सड़क तथा रेल नेटवर्क के विस्तार जैसे विकास कार्यों के कारण अनगिनत आदिवासी परिवार अपनी जमीनों से उजड़ चुके हैं।
इसके अलावा, रोजी-रोटी की तलाश में बड़ी संख्या में आदिवासी युवाओं और परिवारों को अन्य राज्यों का रुख करना पड़ा है। ऐसे में इन परिस्थितियों और जटिलताओं को दरकिनार करके केवल कागजी आंकड़ों के बूते परिसीमन करना आदिवासी समाज के साथ अन्याय होगा।
जमीन की सुरक्षा और सीएनटी-एसपीटी एक्ट का मुद्दा
इस मुलाकात के दौरान केवल परिसीमन तक की बात सीमित नहीं रही, बल्कि आदिवासियों के मूल अधिकारों से जुड़े अन्य गंभीर मुद्दों को भी उठाया गया। प्रतिनिधिमंडल ने राज्य में आदिवासी भूमि की पुख्ता सुरक्षा, छोटनागपुर काश्तकारी अधिनियम (CNT Act) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (SPT Act) के प्रावधानों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करने और भूमि वापसी से जुड़ी कानूनी प्रक्रियाओं को प्रभावी ढंग से लागू करने की पुरजोर मांग की।
प्रतिनिधिमंडल में शामिल प्रमुख चेहरे
राज्यपाल से मिलने पहुंचे इस प्रतिनिधिमंडल में झारखंड के कई जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और नेता शामिल रहे। प्रतिनिधिमंडल में मुख्य रूप से बंधु तिर्की, डॉ. बासवी किड़ो, शशि पन्ना, रमा खलखो, लक्ष्मी नारायण मुंडा, दयामनी बारला, डॉ. रामचंद्र उरांव, अजय तिर्की, शिवा कच्छप और अनिल उरांव ने हिस्सा लिया।
यह मुलाकात ऐसे समय में हुई है जब देश और राज्य स्तर पर परिसीमन की चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। झारखंड के आदिवासी संगठनों का यह प्रतिनिधिमंडल यह सुनिश्चित करना चाहता है कि विकास और आधुनिकीकरण की आंधी में मूल निवासियों के अधिकार और उनका राजनीतिक वजूद किसी भी कीमत पर कम न होने पाए। अब देखना यह होगा कि राज्य सरकार और केंद्र इस गंभीर विषय पर क्या रुख अपनाते हैं।